भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 215

१८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ऊपर क्रोध भी करते हैं। यह सब व्यर्थ ही तो है। दूसरी बात जो आप यह कहते हैं कि इस संसारका कारण कोई महान् ईश्वर नहीं है, यह भी बच्चोंकी-सी बात है। क्या प्रजा बिना राजाके रह सकती है? इसके सिवा जो आप यह कहते हैं कि तुम झूठे ही पत्थरके लिंगकी पूजा करते हो, इसके उत्तरमें मुझे इतना ही निवेदन करना है कि आप शिवलिंगकी महिमाको नहीं जानते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे अन्धा सूर्यके स्वरूपको नहीं जानता। ब्रह्मा आदि समस्त देवता, बड़े-बड़े समृद्धिशाली राजा, साधारण मनुष्य तथा मुनि भी शिवलिंगकी पूजा करते हैं। उनके द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिंग उन्हींके नामसे अंकित एवं प्रसिद्ध हैं, क्या ये सब-के-सब मूर्ख ही थे और अकेले आप सत्यव्रतजी ही बुद्धिमानीका ठेका लिये बैठे हैं? भगवान् विष्णु (राम) ने युद्धमें रावणको मारकर समुद्रके किनारे रामेश्वरलिंगकी स्थापना की है, क्या वह झूठा ही है? प्राचीन कालमें इन्द्रने वृत्रासुरका वध करके महेन्द्रपर्वतपर शिवलिंगको स्थापित किया, जिससे वृत्रवधके पापसे मुक्त होकर इन्द्र आज भी स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं! चन्द्रमाने पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभासक्षेत्रमें भगवान् सोमनाथकी स्थापना करके आरोग्यलाभ किया था। यमराज और कुबेरने काशीमें, गरुड़ और कश्यपने सह्यपर्वतपर तथा वायु और वरुणने नैमिषारण्यक्षेत्रमें शिवलिंगको स्थापित किया है, जिससे वे सदा आनन्दमग्न रहते हैं। इसी स्तम्भतीर्थमें भगवान् स्कन्दने कुमारेश्वर-लिंगकी स्थापना की है, क्या वह समस्त पापोंका नाशक नहीं है? इसी प्रकार अन्य देवताओं, राजाओं और मुनियोंने जो-जो शिवलिंग स्थापित किये हैं, उनकी गणना करनेमें मैं असमर्थ हूँ। भूलोकवासी, स्वर्गलोकवासी तथा पातालनिवासी भी शिवलिंगके पूजनसे तृप्त होते हैं। आप जो यह कहते हैं कि देवता नहीं हैं और यदि हैं तो कहीं भी दिखायी क्यों नहीं देते? आपके इस प्रश्नसे मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। जैसे दरिद्रलोग द्वार-द्वार जाकर कुलथी माँगते हैं, उसी प्रकार क्या देवता भी आपके पास आकर याचना करें? भैया! आप बड़े बुद्धिमान् हैं, आप जो चाहते हैं उसकी सिद्धि तो आपके गुरु ही कर सकते हैं। यदि आपके मतमें सब पदार्थ स्वभावसे ही सिद्ध होते हैं, तो बताइये, कर्ताके बिना भोजन क्यों नहीं तैयार हो जाता? इसलिये जो भी निर्माण-कार्य है, वह अवश्य किसी-न-किसी कर्ताका ही है। जिस पदार्थमें जितनी निर्माणशक्ति विधाताने भर दी है, वह वैसा ही है। और आपने जो यह कहा है कि ये पशु आदि प्राणी ही सुखी तथा धन्य हैं, यह बात आपके सिवा और किसीने न तो कही है और न सुनी ही है। तमोगुणी और अनेक इन्द्रियोंसे रहित जो पशु-पक्षी आदि प्राणी हैं तथा उनके जो कष्ट हैं, वे भी यदि स्पृहणीय और धन्य हैं तो सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे युक्त मनुष्य श्रेष्ठ और धन्य क्यों नहीं? मैं तो समझता हूँ कि आपका जो यह अद्भुत सत्यव्रत है, इसे आपने नरक जानेके लिये ही संग्रह किया है। आपने पहले ही जो आडम्बरपूर्ण भूमिका बाँधकर अपने ज्ञानका परिचय देना आरम्भ किया है, उसीमें आपके इन वचनोंकी सारहीनता व्यक्त हो गयी है। क्योंकि मायावी लोग जब बोलने लगते हैं, तब उनकी बातें आडम्बरसे आच्छादित होती हैं। आपने प्रतिज्ञा तो की थी कुछ और कहनेके लिये, परंतु कह डाला कुछ और ही। इसमें आपका कोई दोष नहीं है, सब दोष मेरा ही है, जो मैं आपकी बात सुनता हूँ। नास्तिक, सर्प और विष इनका तो यह गुण ही है कि ये दूसरेको मोहित करते हैं। प्रतिदिन साधुपुरुषोंका संग करना धर्मका कारण है। इसलिये विद्वान्,