भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 216
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १८७

वृद्ध, शुद्ध भाववाले तपस्वी तथा शान्तिपरायण संत-महात्माओंके साथ सम्पर्क स्थापित करना चाहिये। नीच, अज्ञानी तथा आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंका संग नहीं करना चाहिये। जिनके कुल, विद्या और कर्म तीनों शुद्ध हों और जिन्हें शास्त्रका ज्ञान हो, ऐसे पुरुषोंका विशेषरूपसे सेवन करना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, एक आसनपर बैठने तथा एक साथ भोजन करनेसे धार्मिक आचार नष्ट होते हैं और मनुष्योंको सिद्धि नहीं प्राप्त होती। नीचोंके संगसे पुरुषोंकी बुद्धि नष्ट होती है, मध्यमश्रेणीके लोगोंके साथ उठने-बैठनेसे बुद्धि मध्यम स्थितिको प्राप्त होती है और श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ समागम होनेसे बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है।* इस धर्मका स्मरण करके मैं पुनः आपसे मिलनेकी इच्छा नहीं रखता, क्योंकि आप सदा ब्राह्मणोंकी ही निन्दा करते हैं। वेद प्रमाण हैं, स्मृतियाँ प्रमाण हैं तथा धर्म और अर्थसे युक्त वचन प्रमाण हैं, परंतु जिसकी दृष्टिमें ये तीनों ही प्रमाण नहीं हैं, उसकी बातको कौन प्रमाण मानेगा?

महात्मा नन्दभद्र सत्यव्रतसे ऐसा कहकर उसी समय सहसा घरसे निकल पड़े और भगवान् भट्टादित्यके परम पावन बहूदक तीर्थमें जा पहुँचे।


## नन्दभद्र और बालकका संवाद, बालादित्यकी स्थापना और नन्दभद्रकी मुक्ति

नारदजी कहते हैं—तदनन्तर परम बुद्धिमान् नन्दभद्र बहूदक कुण्डके तटपर वर्तमान कपिलेश्वर-लिंगकी पूजा करके प्रणामपूर्वक हाथ जोड़कर भगवान्‌के आगे खड़े हुए। संसारके चरित्रोंसे उनके मनमें कुछ दुःख हो गया था। इसलिये उन्होंने दुःखी होकर यह गाथा गायी—यदि इस संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान् सदाशिवको मैं देख पाऊँ, तो अनेक प्रश्नोंके साथ उनसे तुरंत यह प्रश्न करूँगा कि भगवन्! क्या आपके उत्पन्न किये बिना ही यह अनेक रूपोंमें उपलब्ध होनेवाला निरीह संसार भरता चला जा रहा है? आप चेतन हैं, शुद्ध हैं और राग आदि दोषोंसे रहित हैं, तो भी आपने जो अखिल विश्वकी सृष्टि की है, उसे अपने समान ही चेतन, विशुद्ध एवं राग आदि दोषोंसे रहित क्यों नहीं बनाया? क्यों जड़ बना दिया? आप तो निर्वैर और समदर्शी हैं; फिर आपका बनाया हुआ यह जगत् सुख-दुःख और जन्म-मरण आदिसे क्लेश क्यों पा रहा है? संसारके ऐसे चरित्रसे मैं मोहित हो गया हूँ। अतः अब किसी दूसरे स्थानपर नहीं जाऊँगा, भोजन नहीं करूँगा और पानी भी नहीं पीऊँगा। उपर्युक्त बातोंका चिन्तन करता हुआ मृत्युपर्यन्त यहीं खड़ा रहूँगा। इस प्रकार विचार करते हुए नन्दभद्र वहीं खड़े रहे। तत्पश्चात् उसके चौथे दिन कोई सात वर्षका बालक पीड़ासे पीड़ित होकर बहूदकके सुन्दर तटपर आया। वह बहुत ही दुर्बल तथा गलित कुष्ठका रोगी था। उसे पग-पगपर पीड़ाके मारे मूर्च्छा आ जाती थी। उस बालकने बड़े क्लेशसे अपनेको सँभालकर नन्दभद्रसे कहा—‘अहो! आपके तो सभी अंग सुन्दर और स्वस्थ हैं, फिर भी आप दुःखी क्यों हैं?’ उसके पूछनेपर नन्दभद्रने अपने दुःखका सब कारण कह सुनाया। वह सब सुनकर बालकने दुःखी होकर कहा—

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\* बुद्धिश् च हीयते पुंसां नीचैस्सह समागमात् । मध्यस्थैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः ॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४०।२८)