संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
'अहो! इस बातसे मुझे बड़ा भयंकर कष्ट हो रहा है कि विद्वान् पुरुष भी अपने कर्तव्यको नहीं समझ पाते हैं। जिसका शरीर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे युक्त और स्वस्थ है, वह भी व्यर्थ मरनेकी इच्छा रखता है। जहाँ राजा खट्वांगने दो ही घड़ीमें मोक्षका मार्ग प्राप्त कर लिया, उसी भारतवर्षको आयु रहते कौन त्याग सकता है। मैं तो अपनेको ही दृढ़ मानता हूँ; क्योंकि मेरे माता-पिता कोई नहीं हैं, मुझमें चलनेकी भी शक्ति नहीं है, तथापि मैं मरना नहीं चाहता हूँ। धैर्यवान्को सभी लाभ प्राप्त होते हैं, यह श्रुतिका वचन सत्य हैं। आपको तो श्रुतिके इस कथनसे सन्तोष धारण करना ही उचित है; क्योंकि आपका यह शरीर अभी दृढ़ है। यदि मेरा भी शरीर किसी प्रकार नीरोग हो जाय, तो मैं एक-एक क्षणमें वह सत्कर्म करूँ, जिसको एक-एक युगमें भोगा जा सकता है। इन्द्रियाँ जिसके वशमें हों और शरीर जिसका दृढ़ हो, वह भी यदि साधनके सिवा और किसी वस्तुकी इच्छा करे, तो उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है? मूर्ख मनुष्यको ही प्रतिदिन शोकके सहस्रों और हर्षके सैकड़ों स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान् पुरुषको नहीं।* जो ज्ञानके विरुद्ध हों, जिनमें नाना प्रकारके विनाशकारी विघ्न प्राप्त हों तथा जो मूलका ही उच्छेद कर डालनेवाले हों, ऐसे कर्मोंमें आप-जैसे बुद्धिमान् पुरुषोंकी आसक्ति नहीं होती। आठ अंगोंवाली जिस बुद्धिको सम्पूर्ण श्रेयकी सिद्धि करनेवाली बताया गया है, वह वेदों और स्मृतियोंके अनुकूल चलनेवाली निर्मल बुद्धि आपके भीतर मौजूद है। इसलिये आप-जैसे लोग दुर्गम संकटोंमें तथा स्वजनोंकी विपत्तियोंमें भी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीड़ित नहीं होते। पण्डितोंकी-सी बुद्धिवाले विवेकी मनुष्य प्राप्त होने योग्य वस्तुकी भी अभिलाषा नहीं करते, नष्ट हुई वस्तुके लिये शोक करना नहीं चाहते तथा आपत्तियोंमें मोहित नहीं होते हैं। सम्पूर्ण जगत् मानसिक और शारीरिक दुःखोंसे पीड़ित है। उन दोनों प्रकारके दुःखोंकी शान्तिका उपाय विस्तारपूर्वक और संक्षेपसे भी सुनिये। रोग, अनिष्ट वस्तुकी प्राप्ति, परिश्रम तथा अभीष्ट वस्तुके वियोग—इन चार कारणोंसे शारीरिक और मानसिक दुःख उत्पन्न होते हैं। अप्रियका संयोग और प्रियका वियोग—यह दो प्रकारका मानसिक महाकष्ट बताया गया है। इस प्रकार यहाँ शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकारका दुःख बताया गया। जैसे लोहपिण्डके तप जानेसे उसपर रखा हुआ घड़ेका जल भी गरम हो जाता है, उसी प्रकार मानसिक दुःखसे
* शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४१। २३)