संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १८९
शरीरको भी सन्ताप होता है। अतः शीघ्र ही औषध आदिके द्वारा उचित प्रतीकार करनेसे व्याधि अर्थात् शारीरिक दुःखका और सर्वदा परित्याग करनेसे आधि अर्थात् मानसिक दुःखका शमन होता है। इन दो क्रियायोगोंसे व्याधि और आधिकी शान्ति बतायी गयी है। इसलिये जैसे जलसे आगको बुझाया जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे मानसिक दुःखको शान्त करे। मानसिक दुःखके शान्त होनेपर मनुष्यका शारीरिक दुःख भी शान्त हो जाता है। मनके दुःखकी जड़ है स्नेह। स्नेहसे ही प्राणी आसक्त होता है और दुःख पाता है। स्नेहसे दुःख और स्नेहसे ही भय उत्पन्न होते हैं। शोक, हर्ष तथा आयास—सब कुछ स्नेहसे ही होता है। स्नेहसे इन्द्रियराग तथा विषयरागका जन्म हुआ है, ये दोनों ही श्रेयके विरोधी हैं। इनमें पहला अर्थात् इन्द्रियराग भारी माना गया है। इसलिये जो स्नेह या आसक्तिका त्यागी, निर्वैर तथा निष्परिग्रह होता है, वह कभी दुःखी नहीं होता। जो त्यागी नहीं है, वह इस संसारमें बार-बार जन्म-मृत्युको प्राप्त होता है। इस कारण मित्रोंसे तथा धनसंग्रहसे होनेवाले स्नेहमें कभी लिप्त न हो और अपने शरीरके प्रति होनेवाले स्नेहका ज्ञानद्वारा निवारण करे। ज्ञानी, सिद्ध, शास्त्रज्ञ और जितात्मा—इनमें स्नेहजनित आसक्ति नहीं होती। ठीक वैसे ही, जैसे कमलके पत्तोंमें पानी नहीं सटता। रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर खींचता है, फिर उसके मनमें भोगकी इच्छा उत्पन्न होती है, उस इच्छासे ही तृष्णा या लोभकी उत्पत्ति होती है। तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ और सदा उद्वेगमें डालनेवाली मानी गयी है। इसके द्वारा बहुत-से अधर्म होते हैं। तृष्णाका रूप भी बड़ा भयंकर है। वह सबके मनको बाँधनेवाली है। खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे जिसका त्याग हो पाता है, जो इस शरीरके वृद्ध होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है।* तृष्णाका आदि और अन्त नहीं है। जैसे लोहेकी मैल लोहेका नाश करती है, उसी प्रकार तृष्णा मनुष्योंके शरीरके भीतर रहकर उनका विनाश करती है।
नन्दभद्र बोले—शुद्ध बुद्धिवाले बालक! यह क्या बात है कि पापी मनुष्य भी निरापद होकर स्त्री और धनके साथ आनन्दमग्न देखे जाते हैं?
बालकने कहा—यह तो बहुत स्पष्ट है। जिन्होंने पूर्वजन्मोंमें तामसिक भावसे दान दिया है, उन्होंने इस जन्ममें उसी दानका फल प्राप्त किया है। परंतु तामसभावसे जो कर्म किया गया है, उसके प्रभावसे उन लोगोंका धर्ममें कभी अनुराग नहीं होता। ऐसे मनुष्य पुण्य-फलको भोगकर अपने तामसिक भावके कारण नरकमें ही जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। इस संशयके विषयमें मार्कण्डेयजीने पूर्वकालमें जो बात कही है, वह इस प्रकार सुनी जाती है—एक मनुष्य ऐसा है, जिसके लिये इस लोकमें तो सुखका भोग सुलभ है, परंतु परलोकमें नहीं। दूसरा ऐसा है, जिसके लिये परलोकमें सुखका भोग सुलभ है, किंतु इस लोकमें नहीं। तीसरा ऐसा है, जिसके लिये इस लोकमें और परलोकमें भी सुखभोग प्राप्त होता है और एक चौथे प्रकारका मनुष्य ऐसा है, जिसके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें ही। जिसका पूर्वजन्ममें किया हुआ पुण्य शेष है, उसीको वह भोगता है
* तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी मता। अधर्मबहुला चैव घोररूपानुबन्धिनी ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। यासौ प्राणान्तको रोगस्तां तृष्णां त्यजतस्सुखम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४१। ४०-४१)