भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 219

१९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


और नूतन पुण्यका उपार्जन नहीं करता, उस मन्दबुद्धि एवं भाग्यहीन मानवको प्राप्त हुआ वह सुखभोग केवल इसी लोकके लिये बताया गया है। जिसका पूर्वजन्मोपार्जित पुण्य नहीं है, किंतु वह तपस्या करके नूतन पुण्यका उपार्जन करता है, उस बुद्धिमान्‌को परलोकमें सदा ही सुखका भोग प्राप्त होता है। जिसका पहलेका किया हुआ पुण्य भी वर्तमान है और तपस्यासे नूतन पुण्यका भी उपार्जन हो रहा है, ऐसा बुद्धिमान् कोई-ही-कोई होता है, जिसे इहलोकमें और परलोकमें भी सुख-भोग प्राप्त होता है। जिसका पहलेका भी पुण्य नहीं है और इस लोकमें भी जो पुण्यका उपार्जन नहीं करता, ऐसे मनुष्यको न इहलोकमें सुख मिलता है न परलोकमें ही। उस नराधमको धिक्कार है। हे महाभाग! ऐसा जानकर सब कार्योंका त्याग करके भगवान् सदाशिवका भजन और वर्णधर्मका पालन कीजिये। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्म नहीं है। जो अपने मनोरथोंके नष्ट होने तथा प्राप्त होनेपर भी शोक करता है, अथवा जो भोगोंसे तृप्त नहीं होता, वह निश्चय ही दूसरे जन्ममें बन्धनमें पड़ता है।

नन्दभद्र बोले—हे बालक! आप बालरूपमें उपस्थित होनेपर भी वास्तवमें बालक नहीं हैं, बड़े बुद्धिमान् हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मैं बड़े विस्मयमें पड़ा हूँ और आप कौन हैं, यह यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। मैंने बहुत-से वृद्ध पुरुषोंका दर्शन और सत्संग लाभ किया है, किंतु उन सबकी ऐसी बुद्धि न तो मैंने देखी है और न सुनी ही है। आपने तो मेरे जन्मभरके सन्देह खेल-खेलमें ही नष्ट कर दिये। अतः आप कोई साधारण बालक नहीं हैं, यह मेरा निश्चित मत है।

बालकने कहा—यह बड़ी लम्बी कथा है। एकाग्रचित्त होकर सुनिये। इससे पहले आठवें जन्ममें मैं विदिशा नगरके भीतर ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरा नाम धर्मजालिक था। मैं वेद-वेदान्तोंका तत्त्वज्ञ, धर्मशास्त्रोंके अर्थ जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ तथा साक्षात् बृहस्पतिके समान धर्मशास्त्रोंका व्याख्याता था। लोगोंके लिये तो मैं नाना प्रकारके धर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करता था, परंतु स्वयं अत्यन्त दुराचारी तथा पापियोंमें भी सबसे बड़ा पापिराज था। मांस खाता, मदिरा पीता और परायी स्त्रियोंके साथ सदा रमण किया करता था। झूठा, दम्भी, पाखण्डी, दुष्ट, लोभी, दुरात्मा और शठ—इन सभी विशेषणोंसे मैं विभूषित था। कभी और कहीं भी कोई सत्कर्म नहीं करता था। जाली पुरुषोंकी भाँति लोगोंको केवल जाल सिखाता था। इसलिये मेरे यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले लोग मुझे धर्मजालिक कहते थे। इस प्रकार मैंने बहुत-से पातक बटोरे। फिर अन्तकाल आनेपर मृत्युके पश्चात् मैं यमलोकमें गया और वहाँ मुझे कूटशाल्मलि नामक नरकमें गिराया गया। पुनः यमदूत मुझे अपने कुकृत्योंका स्मरण दिलाते हुए इधर-उधर घसीटने लगे। मैं कभी तलवारोंसे काटा जाता और कभी कुत्तोंसे नुचवाया जाता था। इस दशामें वहाँ प्रतिक्षण जीता और मरता रहा अर्थात् बार-बार मूर्च्छित होता था। उस समय अनेक प्रकारसे अपनी निन्दा करता हुआ मैं बहुत वर्षोंतक पड़ा रहा। धर्मराजके दूतोंद्वारा पीड़ित होनेपर नरकमें जैसी बुद्धि होती है, वही यदि यहाँ दो घड़ी भी रह जाय, तो मनुष्य धन्य-धन्य हो जाय। तदनन्तर अत्यन्त यातना भोगनेके पश्चात् यमदूतोंने मुझे किसी प्रकार छोड़ा। फिर स्थावर-योनिमें जाकर अनेक प्रकारके क्लेशोंका उपभोग करके मैं सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर एक कीड़ा हुआ। कीड़ेकी योनिमें रहते समय एक दिन मैं मार्गमें सुखपूर्वक सो रहा था। इतनेहीमें वहाँ अकस्मात् आते हुए रथकी घरघराहट मुझे बड़े जोरसे सुनायी पड़ी। उस आवाजको सुनकर मैं डर गया और सहसा मार्ग छोड़कर बड़े वेगसे दूर भागने लगा। उसी बीचमें इच्छानुसार घूमते