भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 220
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *१९१

हुए भगवान् वेदव्यास उधर आ निकले। मुनिवर व्यासने वहाँ उस अवस्थामें पड़े हुए मुझे कृपापूर्वक देखा। ब्राह्मणजन्ममें मैंने सब लोगोंको जो नाना प्रकारके धर्मोंका उपदेश किया था, उसीके प्रभावसे उस कीट जन्ममें मुझे व्यासजीका संग प्राप्त हुआ। वे सब जीवोंकी भाषा जानते हैं, उन्होंने कीड़ेकी भाषामें मुझसे कहा—'ओ कीट! क्यों इस प्रकार भागा जा रहा है? किसलिये मृत्युसे इतना डरता है? अहो!

मनुष्यको यदि मृत्युसे भय हो तो उचित हो सकता है, तू तो कीट है। तुझे इस शरीरके छूटनेका इतना भय क्यों है?'

व्यासजीके ऐसा कहनेपर पूर्वपुण्यके प्रभावसे मेरी भी बुद्धि जाग्रत् हुई। तब मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'विश्ववन्द्य मुनीश्वर! मुझे इस मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं, मेरे मनमें यही भय है कि मैं इससे भी नीच योनिमें न चला जाऊँ। इस कुत्सित कीटयोनिसे भी अधम दूसरी करोड़ों योनियाँ हैं। उनमें गर्भ आदि धारणके क्लेशसे मुझे डर लगता है और किसी कारणसे मैं भयभीत नहीं हूँ।'

व्यासजी बोले—कीट! तू भय न कर, जबतक तुझे ब्राह्मणशरीरमें न पहुँचा दूँगा, तबतक सभी योनियोंसे शीघ्र ही छुटकारा दिलाता रहूँगा।

व्यासजीके ऐसा कहनेपर उन जगद्गुरुको प्रणाम करके मैं पुनः मार्गमें लौट आया और रथके पहियेसे दबकर मृत्युको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् कौवे और सियार आदि योनियोंमें मैं जब-जब उत्पन्न हुआ, तब-तब व्यासजीने आकर मुझे पूर्वजन्मका स्मरण करा दिया। तदनन्तर बहुत-सी योनियोंमें भ्रमण करके अत्यन्त क्लेश भोगता हुआ मैं अब अन्तमें ब्राह्मणके घरमें आकर इस मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। इसमें जन्म लेकर भी अत्यन्त दुःखी हूँ। जन्मसे ही पिता-माताने मुझे अकेला छोड़ दिया। मेरे शरीरमें गलित कोढ़का रोग हो गया है। इसके कारण मैं बड़ी भारी पीड़ाका अनुभव करता हूँ। जब मैं पाँच वर्षका हुआ, तभी व्यासजीने आकर मेरे कानमें सारस्वत-मन्त्रका उपदेश कर दिया। उसके प्रभावसे मुझे बिना पढ़े ही वेदों, शास्त्रों तथा सम्पूर्ण धर्मोंका स्मरण हो आया। फिर व्यासजीने ही मुझे यह आज्ञा दी कि तुम भगवान् कार्तिकेयके क्षेत्रमें जाओ और वहाँ महामति नन्दभद्रको आश्वासन दो। इसके बाद बहूदक तीर्थमें प्राणत्याग करके महीसागरसंगमके जलमें अपनी हड्डियाँ डलवा दो। उसके बाद तुम भावी जन्ममें 'मैत्रेय' नामक श्रेष्ठ मुनि होओगे। मुनि होनेके पश्चात् तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।

स्वयं व्यासजीने इस प्रकार मुझसे कहा है, इसलिये मैं भारवाहकोंकी सहायतासे अत्यन्त क्लेश उठाकर इस तीर्थमें आया हूँ। इस प्रकार आपसे मैंने अपना सब चरित्र कह सुनाया। नन्दभद्रजी! पाप इस प्रकार कष्टदायक होता है, अतः आप सदा ही उसका त्याग करें।

नन्दभद्र बोले—अहो! आपका यह चरित्र

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