संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बड़ा अद्भुत है। इससे मेरे हृदयमें पुनः धर्मके लिये सौगुनी दृढ़ता आ गयी है। परंतु आपने जो मुझे धर्मका उपदेश किया है, उसके बदलेमें मैं आपकी कोई सेवा करना चाहता हूँ। अतः आप धर्मका स्मरण कीजिये और मुझे कोई निश्चित आदेश दीजिये।
बालकने कहा—नन्दभद्रजी ! मैं इस तीर्थमें एक सप्ताहतक निराहार रहकर भगवान् सूर्यके मन्त्रोंका जप करूँगा। तत्पश्चात् शरीर त्याग दूँगा। उसके बाद आप बर्करिका तीर्थमें ले जाकर मेरे शरीरका दाह कर दीजियेगा और मेरी सब हड्डियाँ इसी तीर्थमें डाल दीजियेगा। इस बहूदक तीर्थमें जहाँ मैं प्राणत्याग करूँगा, वहाँ मेरे नामसे भगवान् सूर्यकी स्थापना भी कर दीजियेगा। भगवान् सविता सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, द्विजोंके तो वे सर्वस्व ही हैं। सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंने भगवान् सूर्यकी महिमाका गान किया है। आप भी सदा इन सूर्यभगवान्का भजन और इस बहूदक कुण्डका सेवन करते रहें। व्यासजीके बताये अनुसार इस तीर्थका संक्षिप्त माहात्म्य भी मैं आपको बता रहा हूँ। जो मनुष्य माघमासकी सप्तमी तिथिको बहूदक तीर्थमें स्नान करके पितरोंको पिण्डदान देता है, उनके वे पितर अक्षय तृप्तिको प्राप्त होते हैं। बहूदक तीर्थके किनारे पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ भी दिया जाता है, वह अक्षय होकर उनके समीप पहुँच जाता है। बहूदक कुण्डमें किया हुआ स्नान, दान, जप; होम, स्वाध्याय और पितृ-तर्पण सब महान् फल देनेवाले होते हैं।
नारदजी कहते हैं—यों कहकर वह बालक मौन हो गया और बहूदक कुण्डमें स्नान करके पवित्र हो तटवर्ती वृक्षके नीचे बैठकर स्वयं सूर्य-मन्त्रोंका जप करने लगा। सातवीं रात्रि व्यतीत होनेपर बालकने प्राण त्याग दिये। फिर नन्दभद्रने बालकके कथनानुसार ब्राह्मणोंद्वारा उसके शवका विधिपूर्वक दाहसंस्कार करवाया। सूर्यमन्त्रके जपमें लगे हुए उस बालकने जहाँ प्राणत्याग किये थे, वहाँ नन्दभद्रने बालादित्यके नामसे विख्यात भगवान् सूर्यकी प्रतिमा स्थापित की। जो बहूदकमें स्नान करके बालादित्यका पूजन करता है, उसपर भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं और वह मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है।
तदनन्तर नन्दभद्रने भी दूसरी स्त्रीसे विवाह करके उसके गर्भसे अपने ही समान अनेक पुत्र उत्पन्न किये। वे सदा भगवान् शिव तथा सूर्यकी उपासनामें लगे रहे। अन्तमें उन्होंने भगवान् शिवका सारूप्य प्राप्त किया, जिससे फिर इस संसारमें लौटना नहीं होता। इस प्रकार यह महाकुण्ड बहूदकके नामसे विख्यात हुआ है। जो श्रद्धापूर्वक इस तीर्थके माहात्म्यको सुनता है, उसपर भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं तथा वह अपने हृदयमें मोक्षका चिन्तन करते हुए भवसागरसे मुक्त हो जाता है।
महीसागरसंगमतीर्थकी रक्षा करनेवाली देवियोंका परिचय
नारदजी कहते हैं—अर्जुन ! तदनन्तर मैंने इस तीर्थकी रक्षाके लिये देवियोंकी आराधना करके जिस प्रकार उन्हें यहाँ स्थापित किया वह प्रसंग सुनो। जैसे सबके आत्मा परमेश्वर सब भूतोंमें व्यापक हैं, उसी प्रकार उनकी शक्ति परमेश्वरी प्रकृति भी नित्य एवं व्यापक है। शक्तिके प्रसादसे मनुष्य सुख और समस्त सम्पदाओंको प्राप्त करता है। अर्जुन! भगवती ईश्वरी सम्पूर्ण भूतोंमें इस प्रकार स्थित है—बुद्धि, ह्री, पुष्टि, लज्जा, तुष्टि, शान्ति, क्षमा, स्पृहा, श्रद्धा, चेतना, मन्त्रशक्ति, उत्साहशक्ति तथा प्रभुशक्ति—इन सब रूपोंमें परमेश्वरी शक्ति ही सर्वव्यापक है। यही अविद्यारूपसे बन्धनका और विद्यारूपसे मोक्षका कारण होती है। सदा इसीकी