संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९३
आराधना करके इन्द्र आदि देवताओंने ऐश्वर्य प्राप्त किया है। भगवती शक्ति ही परा प्रकृति है। वही अनेक भेदों (भिन्न-भिन्न अनेक रूपों)-में स्थित है। इसलिये मैंने जिन महादेवियोंको जहाँ स्थापित किया है, वह सुनो। चारों दिशाओंमें चार महाशक्तियोंकी स्थापना की गयी है। पूर्व दिशामें स्कन्दस्वामीके द्वारा सिद्धाम्बिकाकी स्थापना हुई है, उन्हींको सृष्टिकी आदिमें प्रकट हुई मूलप्रकृति कहते हैं। सिद्धोंने उनकी आराधना की है, इसलिये उनका नाम सिद्धाम्बिका है। दक्षिण दिशामें तारादेवी विराजमान हैं, उनकी स्थापना मैंने ही की है। ये वही तारा हैं जिन्होंने देवताओंको तारनेके लिये भगवान् कच्छपका आश्रय लिया है। उन्हींके आवेशसे युक्त होनेके कारण जगद्गुरु भगवान् कूर्मने देवताओंका उद्धार किया। ये गिरिराजनन्दिनी तारा बड़ी आराधनाके बाद मेरे द्वारा यहाँ लायी गयी हैं। ये करोड़ों देवियोंसे घिरी हुई बड़ी उग्र देवी हैं। मेरे प्रति आदरका भाव होनेके कारण मेरी प्रार्थनासे दक्षिण दिशामें आकर रहती हैं। इसी प्रकार पश्चिम दिशामें शुभस्वरूपा भास्वरादेवी स्थित हैं, जिनसे व्याप्त होकर सूर्य आदि मण्डल प्रकाशित होते हैं। जिनकी शक्तिसे सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल सब ओर आते-जाते हैं, वे भास्वरादेवी ही हैं। वे बड़ी प्रबल शक्ति हैं। मैं आराधना करके ब्रह्माण्डकटाहसे उन्हें यहाँ लाया हूँ। वे कोटि देवियोंसे आवृत होकर यहाँ रहती हैं और सदा पश्चिम दिशाकी रक्षा करती हैं। उत्तर दिशामें योगनन्दिनीदेवीका निवास है, जो पूर्वकालमें भगवती पराप्रकृतिके शरीरसे प्रकट हुईं तथा जिनकी निर्मल दृष्टिसे देखे जानेपर चारों सनकादिकोंने योग प्राप्त कर लिया। इसीलिये सनकादि महात्माओंने उन्हें 'योगेश्वरी' कहा है। उन्हें भी मैं आराधना करके अण्डकटाहसे ही लाया हूँ। वे योगिनियोंसे घिरी हुई यहाँ उत्तर दिशामें निवास करती हैं। इस प्रकार ये चार महाशक्तियाँ इस तीर्थमें सदा स्थित रहती हैं।
तदनन्तर मैं नौ दुर्गाओंको भी यहाँ ले आया, उनका परिचय सुनो। त्रिपुरा नामसे प्रसिद्ध एक उच्चकोटिकी देवी हैं, जिनसे आविष्ट होकर जगदीश्वर भगवान् शिवने त्रिपुरासुरको भस्म किया था। इसीलिये भगवान् हरने त्रिपुरा कहकर स्वयं देवी दुर्गाका स्तवन किया। अतः वे सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं, मैं उनकी आराधना करके उन्हें अमरेश पर्वतसे यहाँ लाया हूँ। भक्तोंकी मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण करनेवाली वे त्रिपुरादेवी भट्टादित्यके समीप विराजमान हैं। इनके सिवा दूसरी कोलम्बा नामकी देवी हैं, जो सनातन महाशक्ति हैं। उन्हींके आवेशसे युक्त होकर वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुने इस पृथ्वीको जलसे ऊपर उठाया था। इसीलिये भगवान् विष्णुने कोलम्बा नामसे उनकी स्तुति और पूजा की है। अर्जुन! मैंने शक्तियोगसे कोलम्बादेवीको प्रसन्न किया है। वे वाराह गिरिपर निवास करती हैं, वहींसे मैं उनको यहाँ लाया हूँ। तीसरी दुर्गा भी इस पूर्व दिशामें ही स्थित हैं, उनका नाम कपालेशा है। मैंने और कार्तिकेयजीने उनकी स्थापना की है। उनके प्रभावका वर्णन पहले किया जा चुका है। वे नरश्रेष्ठ धन्य हैं जो कपालेश्वरकी पूजा करके उन कपालेशा देवीका नित्य दर्शन करते हैं। वे सम्पूर्ण विश्वकी शक्ति हैं, इस प्रकार तीन दुर्गाएँ पूर्व दिशामें विराज रही हैं। अब पश्चिम दिशामें जो परम उत्तम तीन दुर्गाएँ सुशोभित हैं, उनका वर्णन करूँगा। पश्चिममें जो सुवर्णाक्षीदेवी हैं, वे समस्त ब्रह्माण्डका भलीभाँति पालन करनेवाली हैं। मैंने बड़ी आराधना करके इस तीर्थमें उन्हें विराजमान किया है। जो उन्हें प्रणाम तथा भक्तिपूर्वक उनका पूजन करते हैं, वे तैंतीस करोड़ देवियोंके समादरके पात्र होते हैं। पश्चिममें दूसरी महादुर्गा चर्चिता भी निवास करती