भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223

१९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हैं। उन्हें मैंने बड़ी भक्तिके साथ प्रार्थना करके रसातलसे यहाँ बुलाया है। उसी दिशामें त्रैलोक्य-विजया नामसे प्रसिद्ध तीसरी महादुर्गाका भी निवास है, जिनकी आराधना करके रोहिणीवल्लभ चन्द्रमाने त्रिभुवनमें विजय प्राप्त की थी। उनको मैं सोमलोकसे लाया हूँ। वे पूजित होनेपर सदा विजय देनेवाली हैं।

अब उत्तर दिशामें निवास करनेवाली देवियोंका परिचय सुनो। उत्तरमें भी एकवीरा आदि तीन देवियाँ स्थित हैं। एकवीरा देवी पूजन तथा आराधन करनेपर मनुष्योंको उनकी समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करती हैं। अर्जुन! उन्हें मैं बड़ी आराधनाके बाद ब्रह्मलोकसे लाया हूँ। उनका नामकीर्तन भी दुष्टोंका विनाश करनेवाला है। दूसरी हरसिद्धि नामवाली दुर्गादेवी हैं, जो बड़ी बलवती हैं। उन्हें मैं शाकोत्तर नामक स्थानसे आराधना करके लाया हूँ। जो लोग हरसिद्धिकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले हैं, उनके पास डाकिनी आदि नहीं जातीं। तीसरी दुर्गा चण्डिका देवी ईशान कोणमें स्थित हैं। वे ही नवीं दुर्गा हैं। उन्होंने पार्वतीके शरीरसे निकलकर रोषपूर्वक चण्ड-मुण्ड नामक महान् असुरोंका संहार किया था। जो थोड़ी या बहुत सामग्रीके द्वारा कात्यायनी देवीका पूजन करते हैं, उन्हें करोड़ों देवियोंसे घिरी हुई वे दुर्गादेवी ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। जो मनुष्य देवीको प्रणाम करता है, वह सब प्रकारके अरिष्टोंसे छुटकारा पा जाता है।


## उभय सोमनाथके प्रादुर्भावकी कथा और कमठके द्वारा गर्भवास तथा मानव-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन

नारदजी कहते हैं—अब मैं सोमनाथकी महिमाका स्पष्ट रूपसे वर्णन करूँगा। जो इसका श्रवण और कीर्तन करता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। अर्जुन! पहलेकी बात है। त्रेतायुगमें गौड़ देशके भीतर दो महातेजस्वी ब्राह्मण थे। एकका नाम था 'ऊर्जयन्त' और दूसरेका 'प्रालेय'। उन दोनोंने एक दिन पुराणमें एक श्लोक देखा। वे शास्त्रोंके ज्ञाता थे। वह श्लोक देखकर उनके शरीरमें रोमांच हो आया। श्लोक इस प्रकार था—

> प्रभासाद्यानि तीर्थानि पुलस्त्यायाह पद्मभूः।  
> न यैस्तत्राप्लुतञ्चैव न तैस्तीर्थमुपासितम् ॥  

'ब्रह्माजीने पुलस्त्य मुनिसे प्रभास आदि तीर्थोंका वर्णन किया है। जिन्होंने इनमें डुबकी नहीं लगायी, उन्होंने तीर्थोंका सेवन नहीं किया।'

यह श्लोक पढ़कर वे बार-बार इसे दुहराने लगे। तदनन्तर वे दोनों ब्राह्मण प्रभासस्नानके लिये घरसे निकले और वनों एवं नदियोंको धीरे-धीरे पार करते हुए महर्षियोंसे सेवित कल्याणमयी नर्मदा नदीके पारतक चले गये। मार्गमें गुप्तक्षेत्र महीसागरसंगमकी महिमा सुनकर वहाँ स्नान करके पुनः वे प्रभासके ही पथपर चल दिये। वह मार्ग सर्वथा जनशून्य था। वे दोनों यात्री भूख और प्याससे बहुत पीड़ित हुए और सिद्धलिंगके समीप पहुँचकर मूर्छित हो गये। फिर दो ही घड़ीके बाद कुछ चेतमें आनेपर प्रालेयने ऊर्जयन्तसे धैर्यपूर्वक कहा—'सखे! मुझे यहाँ कुछ सुनायी पड़ा है। वह बतलाता हूँ, सुनो। 'तीर्थयात्रासे थककर मनुष्य ज्यों-ज्यों शिथिल एवं कान्तिहीन होता जाता है, त्यों-त्यों उसके किये हुए दानसे भगवान् सोमनाथ प्रसन्न होते हैं।' यह बात एक-दूसरेसे कह-सुनकर मूर्छा दूर होनेके बाद ऊर्जयन्त और प्रालेय लोटते हुए प्रभासक्षेत्रकी ओर चले। उनकी यह निष्ठा देखकर भगवान् शंकरने दोनोंको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और उन दोनोंके शरीरको अपनी कृपादृष्टिसे देखकर सुदृढ़ एवं सबल बना दिया।