संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९५
तब ये दोनों प्रभासतीर्थमें शिवजीके स्थानको चले गये। वे ही ये दो सोमनाथ सिद्धेश्वरके समीप विद्यमान हैं। पश्चिममें ऊर्जयन्त और पूर्वमें प्रालेयेश्वर हैं। जो सोमकुण्डके जलमें तथा महीसागरसंगममें धीरेसे स्नान करके युगल सोमनाथका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पापोंसे छूट जाता है। ब्रह्माजीने यहाँ हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी स्तुति की थी। अर्जुन! उस स्तुतिको सुनो। 'भगवान् रुद्र! सूर्यके समान अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्ति करनेवाले भव, दुःखोंको दूर भगानेवाले रुद्र तथा जलमय रस हैं; आपको नमस्कार है। आप संहारकारी शर्व हैं। पृथ्वी आपका रूप है। आप नित्य सुन्दर गन्ध धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप सबके ईश्वर तथा वायुरूप हैं। आपने ही कामदेवका नाश किया है। आपको नमस्कार है। आप पशुओं (जीवों) के अधिपति, पालक तथा अत्यन्त तेजस्वी हैं। आपका स्वरूप भयंकर है। यह आकाश आपका ही एक रूप है। आप शब्दमात्र परमेश्वरको नमस्कार है। आप महादेव हैं। सोम (चन्द्रमारूप अथवा उमासहित) हैं तथा अमृतस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप उग्ररूप, यजमानमूर्ति तथा कर्मयोगी हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार दिव्य नामोंके साथ उच्चारित इस हाटकेश्वर स्तोत्रको जिसका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है, जो पढ़ता और सुनता है, वह भगवान् शिवके सायुज्यको प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। महीसागरसंगममें इस प्रकारके बहुत-से पवित्र तीर्थ हैं, जिनका मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है।
अर्जुन बोले—मुने! आपके द्वारा स्थापित महीसागर स्थानमें जो-जो प्रधान तीर्थ हैं, उनका मुझसे वर्णन कीजिये।
नारदजीने कहा—अर्जुन! महीसागरमें जो-जो मुख्य तीर्थ हैं, उन्हें बतलाता हूँ। उस तीर्थमें जयादित्य नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। उनके प्रादुर्भावकी कथा सुनो। मैं इस महीसागर-संगमस्थानकी स्थापना करके कुछ कालके अनन्तर भगवान् सूर्यका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया। वहाँ प्रणाम करके आसनपर बैठ जानेके बाद सूर्यदेवने अर्घ्यसे मेरा पूजन किया और हँसकर मधुर वाणीमें कहा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जायँगे।' मैंने उत्तर दिया—'प्रभो! मैं भारतवर्षके महीनगरसे आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ।'
सूर्यदेव बोले—आपने जो वहाँ स्थान स्थापित किया है, उसमें जो ब्राह्मण निवास करते हैं, उनके गुण मुझसे बतलाइये। वे ब्राह्मण कैसे गुणोंसे युक्त हैं?
भगवान् सूर्यके ऐसा पूछनेपर मैंने फिर उत्तर दिया—भगवान्! यदि मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ, तो मुझपर यह दोष लगाया जा सकता है कि यह अपने आत्मीय जनोंकी स्तुति करता है, और निन्दाके तो वे पात्र ही नहीं हैं; फिर निन्दा कैसे कर सकता हूँ? दोनों ही ओर संकट है। अथवा उन महात्मा ब्राह्मणोंकी महिमा तो अपार है। यदि मैंने उसे बहुत घटा करके कहा तब तो मुझे महान् दोष ही लगेगा। अतः मेरी यह सम्मति है कि यदि आप मेरे द्वारा पूजित द्विजेन्द्रोंकी महिमा श्रवण करना चाहते हों तो स्वयं वहाँ चलकर उन्हें देखें।
मेरी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यको बड़ा विस्मय हुआ। वे बार-बार कहने लगे, मैं स्वयं ही चलकर उनका दर्शन करूँगा। यों कहकर भगवान् भास्करने मुझे तो विदा कर दिया और अपनी योगशक्तिके प्रभावसे आकाशमें तपते हुए भी दूसरे स्वरूपसे समुद्रके तटको चल दिये। उन्होंने महातेजस्वी वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया था। त्रिकाल-स्नानसे जैसी पिंगल वर्णकी जटा हो जाती है वैसी पिंगल वर्णकी जटा धारण किये हुए उन महात्माको मेरे ब्राह्मणोंने देखा। फिर तो वे हारीत आदि द्विज अपनी ब्रह्मशालासे उठकर उन