संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९५
तब ये दोनों प्रभासतीर्थमें शिवजीके स्थानको चले गये। वे ही ये दो सोमनाथ सिद्धेश्वरके समीप विद्यमान हैं। पश्चिममें ऊर्जयन्त और पूर्वमें प्रालेयेश्वर हैं। जो सोमकुण्डके जलमें तथा महीसागरसंगममें धीरेसे स्नान करके युगल सोमनाथका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पापोंसे छूट जाता है। ब्रह्माजीने यहाँ हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी स्तुति की थी। अर्जुन! उस स्तुतिको सुनो। 'भगवान् रुद्र! सूर्यके समान अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्ति करनेवाले भव, दुःखोंको दूर भगानेवाले रुद्र तथा जलमय रस हैं; आपको नमस्कार है। आप संहारकारी शर्व हैं। पृथ्वी आपका रूप है। आप नित्य सुन्दर गन्ध धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप सबके ईश्वर तथा वायुरूप हैं। आपने ही कामदेवका नाश किया है। आपको नमस्कार है। आप पशुओं (जीवों) के अधिपति, पालक तथा अत्यन्त तेजस्वी हैं। आपका स्वरूप भयंकर है। यह आकाश आपका ही एक रूप है। आप शब्दमात्र परमेश्वरको नमस्कार है। आप महादेव हैं। सोम (चन्द्रमारूप अथवा उमासहित) हैं तथा अमृतस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप उग्ररूप, यजमानमूर्ति तथा कर्मयोगी हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार दिव्य नामोंके साथ उच्चारित इस हाटकेश्वर स्तोत्रको जिसका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है, जो पढ़ता और सुनता है, वह भगवान् शिवके सायुज्यको प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। महीसागरसंगममें इस प्रकारके बहुत-से पवित्र तीर्थ हैं, जिनका मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है।
अर्जुन बोले—मुने! आपके द्वारा स्थापित महीसागर स्थानमें जो-जो प्रधान तीर्थ हैं, उनका मुझसे वर्णन कीजिये।
नारदजीने कहा—अर्जुन! महीसागरमें जो-जो मुख्य तीर्थ हैं, उन्हें बतलाता हूँ। उस तीर्थमें जयादित्य नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। उनके प्रादुर्भावकी कथा सुनो। मैं इस महीसागर-संगमस्थानकी स्थापना करके कुछ कालके अनन्तर भगवान् सूर्यका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया। वहाँ प्रणाम करके आसनपर बैठ जानेके बाद सूर्यदेवने अर्घ्यसे मेरा पूजन किया और हँसकर मधुर वाणीमें कहा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जायँगे।' मैंने उत्तर दिया—'प्रभो! मैं भारतवर्षके महीनगरसे आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ।'
सूर्यदेव बोले—आपने जो वहाँ स्थान स्थापित किया है, उसमें जो ब्राह्मण निवास करते हैं, उनके गुण मुझसे बतलाइये। वे ब्राह्मण कैसे गुणोंसे युक्त हैं?
भगवान् सूर्यके ऐसा पूछनेपर मैंने फिर उत्तर दिया—भगवान्! यदि मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ, तो मुझपर यह दोष लगाया जा सकता है कि यह अपने आत्मीय जनोंकी स्तुति करता है, और निन्दाके तो वे पात्र ही नहीं हैं; फिर निन्दा कैसे कर सकता हूँ? दोनों ही ओर संकट है। अथवा उन महात्मा ब्राह्मणोंकी महिमा तो अपार है। यदि मैंने उसे बहुत घटा करके कहा तब तो मुझे महान् दोष ही लगेगा। अतः मेरी यह सम्मति है कि यदि आप मेरे द्वारा पूजित द्विजेन्द्रोंकी महिमा श्रवण करना चाहते हों तो स्वयं वहाँ चलकर उन्हें देखें।
मेरी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यको बड़ा विस्मय हुआ। वे बार-बार कहने लगे, मैं स्वयं ही चलकर उनका दर्शन करूँगा। यों कहकर भगवान् भास्करने मुझे तो विदा कर दिया और अपनी योगशक्तिके प्रभावसे आकाशमें तपते हुए भी दूसरे स्वरूपसे समुद्रके तटको चल दिये। उन्होंने महातेजस्वी वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया था। त्रिकाल-स्नानसे जैसी पिंगल वर्णकी जटा हो जाती है वैसी पिंगल वर्णकी जटा धारण किये हुए उन महात्माको मेरे ब्राह्मणोंने देखा। फिर तो वे हारीत आदि द्विज अपनी ब्रह्मशालासे उठकर उन
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ब्राह्मण देवताकी ओर दौड़ पड़े। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। नये आये हुए उन श्रेष्ठ द्विजको नमस्कार करके वे सब-के-सब प्रसन्नतापूर्वक बोले—'विप्रवर! आज हमारा दिन बड़ा ही पुण्यजनक है, आज यह स्थान परम उत्तम है; क्योंकि आपने स्वयं कृपा करके यहाँ पदार्पण किया है। इसमें सन्देह नहीं कि उत्तम ब्राह्मण कृपा करके ही किसी धन्य गृहस्थको पवित्र करनेके लिये उसके घर अतिथिके रूपमें पधारते हैं। अतः आप इन पैरोंसे चल-फिरकर आज हमारे गृहोंको पवित्र कीजिये। साथ ही दर्शन, भोजन और विश्राम आदिके द्वारा हमारेसहित इस स्थानको भी पावन बनाइये।'
अतिथि बोले—ब्राह्मणो! भोजन दो प्रकारका होता है—एक प्राकृत और दूसरा परम। अतः मैं आपलोगोंका दिया हुआ उत्तम परम भोजन प्राप्त करना चाहता हूँ।
अतिथिकी यह बात सुनकर हारीतने अपने आठ वर्षके बालकसे कहा—'बेटा कमठ! क्या तुम ब्राह्मणके बताये हुए भोजनको जानते हो?'
कमठने कहा—पिताजी! मैं आपको प्रणाम करके वैसे परम भोजनका परिचय दूँगा तथा ब्राह्मणदेवताको वह भोजन देकर तृप्त करूँगा। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्वोंके समुदायको जो तृप्त करता है, वही प्राकृत भोजन कहलाता है। वह छः^१ रसों और पाँच^२ भेदोंवाला बताया गया है। उसके भोजन करनेसे शरीररूपी क्षेत्रकी तृप्ति होती है। दूसरा जो परम भोजन कहा गया है, उसकी व्याख्या इस प्रकार है—परम कहते हैं आत्माको, उसका जो भोजन है वही परम भोजन है। अतः नाना प्रकारके धर्मका जो श्रवण है, उसे अन्न कहा गया है। क्षेत्रज्ञ आत्मा उस अन्नका भोक्ता है और दोनों कान उस अन्नको ग्रहण करनेके लिये मुख हैं। पिताजी! वही परम भोजन आज मैं इन ब्राह्मणदेवताको दूँगा। 'विप्रवर! आपकी जो इच्छा हो पूछिये, विद्वान् ब्राह्मणोंकी इस सभामें अपनी शक्तिके अनुसार मैं आपको सन्तुष्ट करूँगा।'
कमठकी यह महत्त्वपूर्ण बात सुनकर अतिथि ब्राह्मणने मन-ही-मन उसकी सराहना की और यह प्रश्न उपस्थित किया—'जीव कैसे उत्पन्न होता है?'
कमठने कहा—ब्रह्मन्! पहले गुरुको, उसके बाद धर्मको नमस्कार करके मैं इस वेदवर्णित प्रश्नका यथाशक्ति समाधान करूँगा! जीवके जन्म लेनेमें तीन प्रकारका कर्म कारण होता है—पुण्य, पाप और उभय मिश्रित। अर्थात् कर्म तीन प्रकारके हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। इन कर्मोंके अनुसार जो सात्त्विक पुरुष है, वह स्वर्गमें जाता है। फिर समयानुसार जब स्वर्गसे नीचे गिरता है, तब संसारमें धनी, धर्मी और सुखी होता है। जो तमोगुणी पुरुष है, वह नरकमें पड़ता है और वहाँ नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगनेके पश्चात् यहाँ आकर स्थावरयोनिमें जन्म लेता है। तदनन्तर
१- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त—ये छः रस हैं।
२- भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य तथा चोष्य—ये भोजनके पाँच भेद हैं।
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दीर्घकालतक उस योनिमें रहते हुए महात्मा पुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, उपभोग और समीप बैठने आदिसे स्थावर शरीरसे मुक्त होकर वह मनुष्य होता है। मनुष्य होनेपर भी वह दुःखी, दरिद्रता आदिसे घिरा हुआ तथा विकलेन्द्रिय (अन्धा, बहरा, काना, कुबड़ा, लँगड़ा, लूला आदि) होता है। यह सब लोगोंके प्रत्यक्ष है। यह सब पापका ही लक्षण है। जो पाप और पुण्य दोनोंसे मिश्रित कर्मवाला पुरुष है, वह पशु-पक्षी आदिकी योनिको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह इस संसारमें मनुष्य होता है। जिसका पुण्य अधिक और पाप थोड़ा होता है, वह पहले दुःखी होकर पीछे सुखी होता है। जिसका पाप बहुत अधिक और पुण्य बहुत कम हो, वह पहले सुखी और पीछे दुःखी होता है; यह मिश्रित कर्मका लक्षण है। इनमेंसे पहले मनुष्यकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनिये।
पुरुष और स्त्रीके वीर्य तथा रजका संगम होनेपर सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा शुभाशुभ कर्मसंस्कारके साथ जीव गर्भमें प्रवेश करके रजोवीर्यमय कललमें स्थित होता है। उस समय वह मूर्च्छित अवस्थामें रहकर एक मासतक कललमें ही पड़ा रहता है। दूसरा महीना आनेपर वह कललाकार जीव घनीभावको प्राप्त हो जाता है। तीसरे महीनेमें उसके अवयवोंका निर्माण होने लगता है। (इस प्रकार होते हुए) सातवें महीनेमें वह माताके खाये-पीये हुए अन्न और जलका सार अंश ग्रहण करने लगता है। आठवें और नवें महीनेमें उस बालकको गर्भमें बड़ा उद्वेग प्राप्त होता है। उसके सब अंग झिल्लीमें लपेटे हुए होते हैं और हाथोंकी अंगुलियाँ मुखसे बँधी होती हैं। यदि गर्भका बालक अधिकतर उदरके मध्यभागमें रहता है तब वह नपुंसक है, यदि वाम भागमें ठहरता है तो कन्या है, और यदि दक्षिण भागमें रहा करता है तो पुरुष है। इस प्रकार वह उदरके किसी एक भागमें स्थित होता है। जिन योनियोंमें वह जन्म लेता है उनका ज्ञान उस समय उसे होता है। इतना ही नहीं, उसे पहलेके अनेक जन्मोंकी बातोंका भी स्मरण हो आता है। वह गाढ़ अन्धकारमें अदृश्य होकर पड़ा रहता है। वहाँकी दुर्गन्धसे वह अत्यन्त मोहको प्राप्त होता है। यदि माता ठंडा जल पीती है तो उसे सर्दी मालूम होती है। यदि गरम जल पीती है तो उसे गरमीका अनुभव होता है। माताके मैथुन या परिश्रम करनेपर उसको क्लेश होता है। यदि माताको कोई रोग है तो उससे गर्भके बालकको भी पीड़ा होती है। इसके सिवा इस बालकको स्वयं भी ऐसे रोग होते हैं, जिन्हें पिता-माता नहीं देख पाते। अधिक सुकुमारता होनेसे वे रोग गर्भस्थ शिशुके अंगोंमें तीव्र वेदना उत्पन्न करते हैं। उस अवस्थामें थोड़े-से समयको भी वह सौ वर्षोंके समान दुःसह मानता है। अपने प्राचीन कर्मोंसे भी गर्भमें बालकको बड़ा सन्ताप होता है। वहाँ वह बार-बार पुण्य करनेके मनसूबे बाँधता है। 'यदि मैं मनुष्य-शरीरमें जन्म और जीवन पा जाऊँ तो ऐसा कार्य करूँगा, जिससे निश्चय ही मेरा मोक्ष हो जाय।' सीमन्तोन्नयन-संस्कारके बाद उपर्युक्त चिन्तामें पड़े हुए बालकके शेष दो मास अधिक पीड़ाके कारण तीन युगोंके समान बीतते हैं। तत्पश्चात् जन्मका समय आनेपर प्रसूति वायुसे प्रेरित होकर नीचे मुखवाला वह बालक बड़ी पीड़ाका अनुभव करता है तथा योनिके संकीर्ण द्वारसे कष्टपूर्वक निकलने लगता है। उस समय उसे ऐसी पीड़ा होती है, मानो कोई उसकी चमड़ी नोंच रहा हो। किसीके हाथका स्पर्श आदि भी उसे आरेकी धारके स्पर्श-सा जान पड़ता है। जन्म लेनेके पश्चात् वह अचेत बालक केवल माताके स्तनमात्रको जानता है। पूर्वकर्मोंके अधीन होनेके कारण उसका गर्भगत ज्ञान नष्ट हो जाता है। फिर तो वह पूर्ववत् काले, लाल और सफेद
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(तामस, राजस और सात्त्विक) कर्म करने लगता है। मनुष्यका शरीर एक घरके समान है। इसमें हड्डियाँ ही प्रधान स्तम्भ हैं, नस-नाड़ियोंके बन्धनसे ही यह बँधा हुआ है, रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे यह लिपा हुआ है, विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्यका पात्र है। सात धातुरूपी सात दीवारोंसे यह अत्यन्त दृढ़ बना हुआ है, केश और रोमरूपी घास-फूससे इसे छाया गया है, मुख ही इस घरका प्रधान दरवाजा है। शेष दो आँख, दो कान, दो नाक, लिंग और गुदा—ये आठ खिड़कियाँ इस घरकी शोभा बढ़ा रही हैं। दोनों ओठ मुखरूपी द्वारके किवाड़ हैं, दाँतोंकी अर्गलासे इस द्वारको बंद किया गया है। नाड़ी ही इसकी नाली और पसीने आदि ही इसके गंदे जलके प्रवाह हैं। यह देह-गेह कफ और पित्तमें डूबा हुआ है। जरावस्था और शोकसे व्याप्त है, कालकी मुखाग्निमें इसकी स्थिति है, राग और द्वेष आदिसे यह सदा ग्रस्त रहता है तथा यह नाना प्रकारके शोककी उत्पत्तिका स्थान है। इस प्रकार मनुष्योंका यह देहरूपी गेह उत्पन्न होता है, जिसमें क्षेत्रज्ञ आत्मा गृहस्थके रूपमें निवास करता है और बुद्धि उसकी गृहिणी है। इस शरीरमें रहकर जीव नाना प्रकारके साधनोंमें संलग्न हो नरक, स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त करता है।
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कमठद्वारा शरीरकी उत्पत्ति, विनाश तथा जीवके परलोकवासका वर्णन
अतिथि बोले—वत्स कमठ! तुम्हारी बुद्धि तो वृद्धोंकी-सी है। तुम बहुत अच्छा प्रतिपादन कर रहे हो। अब मैं तुमसे शरीरका लक्षण सुनना चाहता हूँ; उसे बताओ।
कमठने कहा—विप्रवर! जैसा यह ब्रह्माण्ड है, वैसा ही यह शरीर भी बताया जाता है। पैरोंका मूल (तलवा) पाताल है, पैरोंका ऊपरी भाग रसातल है, दोनों गुल्फ तलातल हैं, दोनों पिण्डलियोंको महातल कहा गया है, दोनों घुटने सुतल, दोनों ऊरु (जाँघ) तथा कटिभाग अतललोक हैं। नाभिको भूलोक, उदरको भुवर्लोक, वक्षःस्थलको स्वर्गलोक, ग्रीवाको महर्लोक और मुखको जनलोक कहते हैं। दोनों नेत्र तपोलोक हैं तथा मस्तकको सत्यलोक कहा गया है। जैसे पृथ्वीपर सात द्वीप स्थित हैं, उसी प्रकार इस शरीरमें सात धातुएँ हैं, उनके नाम सुनिये। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा और वीर्य—ये सात धातुएँ हैं। शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ हैं तथा तीस लाख छप्पन हज़ार नौ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जैसे नदियाँ इस पृथ्वीपर जल बहाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ शरीरमें रसका संचार करती हैं। यह शरीर साढ़े तीन करोड़ स्थूल एवं सूक्ष्म रोएँसे आच्छादित है। स्थूल रोएँ तो दिखायी देते हैं और सूक्ष्म नहीं दिखायी देते। शरीरमें छः अंग प्रधान बताये जाते हैं—दो बाँह, दो जाँघें, मस्तक और उदर। देहके भीतर साढ़े तीन-तीन व्याम* पुरुषकी तीन आँतें हैं। स्त्रियोंकी आँतें तीन-तीन व्यामकी ही होती हैं; वेदवेत्ता द्विज ऐसा ही कहते हैं। हृदयमें एक कमल बताया जाता है, जिसकी नाल तो है ऊपरकी ओर और मुख है नीचेकी ओर। उस हृदय-कमलके वामभागमें प्लीहा है और दक्षिण-भागमें यकृत्। शरीरमें मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, कफ, विष्ठा, रक्त तथा रसके गड्ढे हैं; इनका माप दो-दो अंजलि माना गया है। उन्हीं
* यह लम्बाईकी एक माप है। दोनों हाथोंको जहाँतक हो सके, दोनों बगलमें फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेपर जितनी दूरी होती है, वह व्याम कहलाती है।
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९९
गड्ढोंसे प्रवृत्त होकर वे मज्जा, मेदा आदि धातु इस शरीरको धारण करते हैं। इन गड्ढोंके सिवा शरीरमें सात सीवनी (विशेष नाड़ी) हैं। इनमेंसे पाँच तो मस्तककी ओर गयी हैं, एक नाड़ी लिंगतक तथा एक जिह्वातक गयी है। सब नाड़ियाँ नाभि-कमलसे ही सब ओर गयी हैं। इन सबमें मस्तककी ओर गयी हुई तीन नाड़ियाँ प्रधान हैं—सुषुम्ना, इडा और पिंगला। इडा और पिंगला नाड़ी नासिकाके द्वारतक पहुँची हुई है। ये ही दोनों शरीरकी वृद्धि एवं पुष्टि करनेवाली हैं। शरीरमें वायु, अग्नि तथा चन्द्रमा—ये पाँच-पाँच भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—ये वायुके पाँच भेद माने गये हैं। उच्छ्वास (ऊपरकी ओर श्वास खींचना), निःश्वास (श्वासको बाहर निकालना) तथा अन्न और जलको शरीरके भीतर पहुँचाना—ये तीन प्राणवायुके कर्म हैं। कण्ठसे लेकर मस्तकतक इसका निवासस्थान है। मल, मूत्र तथा वीर्यका त्याग और गर्भको योनिसे बाहर निकालना यह अपान वायुका कर्म बताया गया है। इसका स्थान गुदाके ऊपर है। समान वायु खाये हुए अन्नको धारण करती, उसके विभिन्न अंशोंको बिलगाती तथा सम्पूर्ण शरीरमें रस-संचार करती हुई बेरोक-टोक विचरती है। वाक्य बोलना, उद्गार (कण्ठके भीतरसे कुछ निकालना) तथा कर्मोंके लिये सब प्रकारके प्रयत्न करना—ये उदान वायुके कार्य हैं। इसका स्थान कण्ठसे लेकर मुखतक है। व्यान वायु सदा हृदयमें स्थित रहती है और सम्पूर्ण देहका भरण-पोषण करती है। धातुको बढ़ाना, पसीना, लार आदिको निकालना तथा आँखके खोलने-मीचनेकी क्रिया करना—ये सब व्यान वायुके कार्य हैं।
पाचक, रंजक, साधक, आलोचक तथा भ्राजक—इन पाँच रूपोंमें अग्नि इस शरीरके भीतर स्थित है। पाचक अग्नि सदा पक्वाशयमें स्थित होकर खाये हुए अन्नको पचाती है। रंजक अग्नि आमाशयमें स्थित होकर अन्नके रसको रँगकर रक्तके रूपमें परिणत कर देती है। साधक अग्नि हृदयमें रहकर बुद्धि और उत्साह आदिको बढ़ाती है। आलोचक अग्नि नेत्रोंमें निवास करके रूप देखनेकी शक्ति बढ़ाती है तथा भ्राजक अग्नि त्वचामें स्थित हो शरीरको निर्मल एवं कान्तिमान् बनाती है। क्लेदक, बोधक, तर्पण, श्लेषण तथा आलम्बक—इन पाँच रूपोंमें चन्द्रमाका शरीरके भीतर निवास है। क्लेदक चन्द्रमा पक्वाशयमें स्थित होकर प्रतिदिन खाये हुए अन्नको गलाता है। बोधक रसनेन्द्रियमें रहकर मधुर आदि रसोंका अनुभव कराता है। तर्पण चन्द्रमा मस्तकमें स्थित होकर नेत्र आदि इन्द्रियोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करता है। इसीलिये उसका नाम तर्पण है। श्लेषण सब सन्धियोंमें व्याप्त होकर उन्हें परस्पर मिलाये रखता है तथा आलम्बक चन्द्रमा हृदयमें स्थित हो शरीरके सब अंगोंको परस्पर अवलम्बित रखता है। इस प्रकार वायु, अग्नि तथा चन्द्रमाने इस शरीरको धारण कर रखा है। इन्द्रियोंके छिद्र, रोमकूप तथा उदरका अवकाश-भाग—ये सब आकाशजनित हैं। नासिका, केश, नख, हड्डी, धीरता, भारीपन, त्वचा, मांस, हृदय, गुदा, नाभि, मेदा, यकृत्, मज्जा, आँत, आमाशय, शिरा, स्नायु तथा पक्वाशय—इन सबको वेदवेत्ता विद्वानोंने पृथ्वीका अंश बताया है। नेत्रोंमें जो श्वेत भाग है, वह कफसे उत्पन्न होता है और काला भाग वायुसे पैदा होता है। श्वेत भाग पिताका तथा काला भाग माताका अंश है। नेत्रमें पाँच मण्डल होते हैं। पहला पक्ष्म-मण्डल, दूसरा चर्म-मण्डल, तीसरा शुक्ल-मण्डल, चौथा कृष्ण-मण्डल तथा पाँचवाँ दृङ्-मण्डल है। नेत्रके दो भाग और हैं—उपांग और अपांग। नेत्रोंका जो अन्तिम किनारा है, उसे उपांग कहते हैं और नासिकाके मूल भागसे मिला हुआ जो नेत्रका अंश है, उसका नाम अपांग है। दोनों अण्डकोष मेदा, रक्त, कफ
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और मांस—इन चार धातुओंसे युक्त बताये गये हैं। समस्त प्राणियोंकी जिह्वा रक्त-मांसमयी ही होती है। दोनों हाथ, दोनों ओठ, लिंग और गला—इन छः स्थानोंमें चर्मप्रधान मांस और रक्त होते हैं। इस प्रकार इन सात धातुओंके बने हुए पचीस तत्त्वयुक्त शरीरमें जीव निवास करता है। त्वचा, रक्त और मांस—ये तीनों माताके अंशसे तथा मेदा, मज्जा और अस्थि—ये पिताके अंशसे उत्पन्न बताये गये हैं। इन्हीं छः कोषोंसे इस शरीरका संगठन हुआ है।
यह पांचभौतिक शरीर पाँच भूतोंसे उत्पन्न होनेवाले अन्नद्वारा जिस प्रकार पुष्टिको प्राप्त होता है, उसका वर्णन करता हूँ। देहधारी जीव पिण्ड, कौर तथा ग्रासके रूपमें जो अन्न खाते हैं, उसे प्राणवायु पहले स्थूलाशयमें एकत्र करती है; फिर उस अन्नमें प्रवेश करके अन्न और जलको पृथक्-पृथक् कर देती है। जलको अग्निके ऊपर रखकर अन्नको उसके ऊपर रखती है और स्वयं जलके नीचे स्थित हो धीरे-धीरे अग्निको उद्दीप्त करती है। वायुसे उद्दीप्त हुई अग्नि जलको अत्यन्त गरम कर देती है; फिर उस उष्ण जलसे वह अन्न सब ओरसे पकने लगता है। पकनेपर उसके दो भाग हो जाते हैं; मैल अलग छँट जाती है और रस पृथक् हो जाता है। मल निकलनेके बारह मार्गोंसे वह छँटी हुई मैल शरीरसे बाहर हो जाती है। दो कान, दो आँख, दो नाक, जिह्वा, दाँत, लिंग, गुदा, नख और रोमकूप—ये बारह मलके आश्रय हैं। शरीरकी सब नाड़ियाँ सब ओरसे हृदय-कमलमें बँधी हुई हैं। व्यान वायु पूर्वोक्त अन्न-रसको उन नाड़ियोंके मुखमें रख देती है; तब समान वायु सभी नाड़ियोंको उस रससे परिपूर्ण करती है। तत्पश्चात् वे रसपूर्ण नाड़ियाँ देहमें सब ओर उस रसको पहुँचा देती हैं। नाड़ियोंमें स्थित हुआ वह रस रंजक अग्निकी उष्णतासे पकने लगता है और पकते-पकते रुधिररूपमें परिणत हो जाता है। तदनन्तर त्वचा, रोम, केश, मांस, स्नायु, शिरा, अस्थि, नख, मज्जा, इन्द्रियोंकी शुद्धि तथा वीर्यकी वृद्धि—ये कार्य क्रमशः होते हैं। इस प्रकार अन्नका बारह रूपोंमें परिणाम बताया जाता है। इन सबसे बना हुआ यह शरीर पुण्यके लिये प्राप्त हुआ है, जैसे सुन्दर रथ भार ढोनेके लिये ही होता है। यदि वह भार न ढो सके तो, केवल तेल लगाने आदि नाना प्रकारके यत्नोंद्वारा रथकी रक्षा करनेसे क्या कार्य सिद्ध हो सकता है? इसी प्रकार उत्तम-उत्तम भोजनोंसे पुष्ट किये हुए इस शरीरके द्वारा पुण्य-सम्पादनके सिवा और क्या लाभ है? यदि यह पुण्य नहीं करता, तो पशुके तुल्य है। इस विषयमें ये श्लोक स्मरण रखने योग्य हैं—
यस्मिन्काले च देशे च वयसा यादृशेन च।
कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते॥
तस्मात् सदा शुभं कार्यमविच्छिन्नसुखार्थिभिः।
विच्छिद्यन्तेऽन्यथा भोगा ग्रीष्मे कुसरितो यथा॥
यस्मात्पापेन दुःखानि तीव्रानि सुबहून्यपि।
तस्मात्पापं न कर्तव्यमात्मपीडाकरं हि तत्॥
'जिस समय जिस देशमें और जिस आयुसे शुभ तथा अशुभ कर्म किये जाते हैं उसी देश, काल और आयुमें कर्ताको उनका फल भोगना पड़ता है। इसलिये अक्षय सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। अन्यथा गरमीमें सूख जानेवाली छोटी-छोटी नदियोंकी भाँति समस्त सुख-भोग छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। क्योंकि पापसे बहुत तीव्र दुःख प्राप्त होते हैं, अतः पाप-कर्मका आचरण कदापि नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह अपनेको पीड़ा देनेवाला है।'
महात्मन्! इस प्रकार मैंने आपके प्रश्नका यथाशक्ति उत्तर दिया है। प्राणी किस प्रकार
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उत्पन्न होता है, यह बात बता दी गयी। अब किस प्रकार उसकी मृत्यु होती है, यह सुनिये। कर्मके अनुसार आयु क्षीण होनेपर जब मनुष्योंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय अपने कर्मोंके अधीन रहनेवाले जीवको यमराजके दूत शरीरसे बाहर खींचते हैं। तब पुण्य और पापके बन्धनमें बँधा हुआ जीव पंचतन्मात्राओंको तथा मन, बुद्धि और अहंकारको साथ लेकर शरीरको त्याग देता है। पुण्यात्मा पुरुषोंके प्राण मुखमण्डलमें स्थित सात छिद्रोंके द्वारा बाहर निकलते हैं। पापियोंके प्राण गुदा-मार्गसे बाहर होते हैं और योगी पुरुषोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर ऊर्ध्वलोकमें गमन करते हैं।
मृत्यु होनेपर जीव उसी क्षणमें आतिवाहिक शरीर धारण करता है; वह अँगूठेकी पोरके बराबर होता है। उस शरीरका निर्माण अपने ही प्राणोंसे किया जाता है। उस आतिवाहिक शरीरमें जब जीव स्थित हो जाता है, तब यमराजके दूत उस देहको बाँधकर बलपूर्वक यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं। वह मार्ग तपे हुए भाड़के समान, गरम किये हुए लोहेके गोलेके सदृश, तपी हुई बालूवाले स्थानकी भाँति तथा जलते हुए ताम्रपत्रके समान होता है। पृथ्वीसे छियासी हजार योजन दूर यमराजकी पुरी है, जहाँ यमदूत पापी जीवको घसीटकर ले जाते हैं। मार्गमें कहीं अत्यन्त सर्दी पड़ती है, कहीं अत्यन्त दुर्गम स्थान लाँघना पड़ता है, कहीं भारी अन्धकार छाया रहता है तथा कहीं अग्निके समान मुखवाले काक, कंक, जम्बुक, मक्खी, डाँस, मच्छर तथा साँप और बिच्छू आदि जीव काट खाते हैं। उनके काटनेपर जीव चीखता और चिल्लाता है, परंतु मरता नहीं है। कहीं-कहीं भयंकर राक्षस उसे खाते, घसीटते और इधर-उधर फेंकते हैं। कहीं तपी हुई बालूवाले अत्यन्त भयंकर मार्गसे जलता हुआ पापी जीव ले जाया जाता है। यमपुरीके उस अत्यन्त दुस्तर मार्गको वह केवल दस मुहूर्त (चार घंटे)-में पार करता है; परंतु उतना ही समय वह एक वर्षके बराबर बड़ा भारी समझता है। उस मार्गमें पापी जीवको पीब और रक्तकी धारा बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है, जिसमें बाल ही शैवालका काम देते हैं।
यमलोकमें पहुँचनेपर यमदूत पापी मनुष्यको ले जाकर यमराजके सामने खड़ा कर देते हैं। पापात्मा जीव काल और अन्तक आदिसे घिरे हुए यमराजको बड़े भयंकर रूपमें देखता है तथा पुण्यात्मा पुरुष यमराजका परम शान्त सौम्य रूपमें दर्शन पाता है। मनुष्य ही यमलोकमें जाते हैं, दूसरे प्राणी नहीं। अन्य प्राणियोंकी मृत्यु होनेपर शीघ्र ही किसी-न-किसी योनिमें उनका जन्म हो जाता है। इस प्रकार उनकी योनिपूर्ति मात्र की जाती है। केवल मनुष्य ही प्रेत होते सुने जाते हैं, अन्य प्राणी नहीं। धर्मात्मा पुरुष यमलोकमें जानेपर वहाँ पूजित होता है और पापी जीव बन्धनमें डाला जाता है।
विप्रवर! धर्मात्मा पुरुष जिस प्रकार परलोकमें जाते हैं, उस मार्गका वर्णन करता हूँ। जो इस लोकमें बगीचा और वृक्षका दान करते हैं, वे फल और फूलवाले वृक्षोंकी छायासे होकर सुखपूर्वक यात्रा करते हैं। इसी प्रकार जो छत्र दान करनेवाले मनुष्य हैं, वे भी छायामें ही सुखसे जाते हैं। उपानह (जूता आदि) दान करनेवाले सवारीसे यात्रा करते हैं। कुआँ और पोखरा खुदानेवाले प्यासकी पीड़ासे रहित होकर जाते हैं। सवारी, शय्या और आसन देनेवाले लोग विमानोंपर बैठकर जाते हैं। जो लोग भोजन-दान करनेवाले हैं, वे लोग भक्ष्य-भोज्यसे भलीभाँति तृप्त होकर यात्रा करते हैं। दीप-दान करनेवाले उजालेमें जाते हैं, गोदान करनेवाले वैतरणी नदीको सुखसे पार करते हैं। जो जन्मसे ही लेकर जीवनभर भगवान् सूर्य, भगवान् शिव अथवा भगवान् विष्णुकी पूजा करते हैं, वे यमदूतोंसे पूजित होकर भगवान्के धाममें जाते हैं। भूमि, गौ, सोना, लोहा, तेल,
२०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रूई, नमक और सप्तधान्य दान करके मनुष्य सुखपूर्वक परलोककी यात्रा करते हैं।
चित्रगुप्त यमलोकमें गये हुए पापी और पुण्यात्मा पुरुषोंकी सूचना यमराजको देते हैं। फिर वह एक वर्षतक प्रेतलोकमें निवास करता है। उसी वर्षमें उसे भोगदेहकी प्राप्ति होती है। भाई-बन्धु जो जलयुक्त कुम्भदान और अन्न आदि दान करते हैं, उसे ही वह प्रतिदिन खाकर पुष्ट होता है। उसने पहले भी जो अन्न आदिका दान कर रखा है, वह भी यमलोकमें उसके पास स्वयं उपस्थित हो जाता है। जिसने स्वयं कुछ दान नहीं किया तथा जिसके लिये दूसरा कोई अन्नदाता और जलदाता नहीं है, वह यमलोकमें भूख और प्याससे पीड़ित होता है। भाई-बन्धुओंद्वारा किया हुआ जलदान उसके पास नदी होकर पहुँचता है। जिसके लिये यहाँ षोडश श्राद्धपूर्वक प्रतिमास मासिक श्राद्ध नहीं किया जाता, वह प्रेतयोनिसे मुक्त नहीं होता है। प्रेतलोकमें मनुष्यके दिनके बराबर ही दिन होता है। इसलिये प्रेतको प्रतिदिन एक वर्षतक अन्न देना चाहिये। यमलोकमें सर्दी, आँधी और धूपके कष्टसे युक्त पापात्मा पुरुषकी रक्षा श्माशानिक नामवाले भयंकर यमदूत करते हैं। जैसे इस लोकमें भी कठोर पुरुष बन्धनमें पड़े हुए किसी कैदीकी रक्षा करते हैं। जिसके लिये षोडश श्राद्धपूर्वक प्रेतपिण्ड नहीं दिये जाते, उसका कई युगोंके बाद भी प्रेतयोनिसे उद्धार नहीं होता। प्रेतपिण्ड देनेके पश्चात् जब भाई-बन्धु एक वर्ष पूरा होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्धका अनुष्ठान भलीभाँति कर देते हैं, तब जीवका भोगशरीर पूर्णताको प्राप्त हो जाता है। पापात्मा जीव भयंकर शरीर प्राप्त करता है और धार्मिक पुरुषको परम उत्तम दिव्य रूपकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर जीव अपने कर्मके अनुसार स्वर्ग या नरकमें जाता है। रौरव आदि नरक पातालतलमें स्थित हैं, देवता आदि पुण्यात्मा स्वर्गलोकके ऊपर सत्यलोकतक निवास करते हैं। इतिहास, पुराण, वेद तथा स्मृतियोंमें जो पुण्यकर्म विहित है, उससे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। उसके विपरीत पाप करनेसे नरक होता है। स्वर्ग हो या नरक, वहाँ भी मनुष्य अपने कर्मोंके अनुरूप नियत समयतक ही निवास करता है। वर्षके पहले ही जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध कर दिया जाता है, उसका भी प्रेतत्व एक वर्षतक अवश्य रहता है। जिन्होंने अश्वमेध आदि तीन यज्ञोंद्वारा यजन किया हो अथवा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवताओंकी पूजा की हो, या जो सम्मुख युद्धमें मारे गये हों, वे कभी प्रेतलोकमें नहीं जाते। केवल पुण्यसे एकमात्र स्वर्गकी प्राप्ति होती है और केवल पापसे एकमात्र अन्धकारपूर्ण नरकमें जाना पड़ता है। पाप और पुण्य दोनोंके अनुष्ठानसे मानव स्वर्ग और नरक दोनोंमें जाता है और उसीके अनुसार उसको शरीर भी प्राप्त हो जाता है। विप्रवर! जन्म, मृत्यु और परलोकवास आपके इन तीन प्रश्नोंको लेकर, जैसी कि मेरे पिताने मुझे शिक्षा दी है, आपसे निवेदन किया। अब और आप क्या सुनना चाहते हैं? उसे भी कहूँगा।
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पापकर्मोंके फल, जयादित्यकी स्तुति और महिमा
**अतिथि बोले—**कमठ! तुमने शास्त्रीय मतका आश्रय लेकर परलोकका जो यह स्वरूप बतलाया है, वह वैसा ही है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है; तथापि इस विषयमें नास्तिक, पापाचारी तथा मन्दबुद्धि मनुष्य सन्देह करते हैं। उनका सन्देह दूर करनेके लिये तुम कर्मोंके फलका निरूपण करो। किस-किस पापकर्मका कौन-सा फल यहीं प्राप्त हो जाता है तथा किस पापके प्रभावसे
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०३
मनुष्य किस रूपमें जन्म लेता है? इन सब बातोंको यदि तुम जानते हो तो बताओ।
कमठने कहा—विप्रवर! इस विषयमें मेरे पिताने जो उपदेश दिया है और मेरे चित्तमें जो विचार स्थित है, वह सब आपको बताऊँगा। आप स्थिर होकर सुनिये। ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले मनुष्यको क्षयका रोग होता है, शराबीके दाँत काले होते हैं, सोनेकी चोरी करनेवालेका नख खराब होता है, गुरुपत्नीगामीके शरीरका चमड़ा खराब हो जाता है, इन सबके साथ संसर्ग रखनेवाले पुरुषको वे सभी रोग होते हैं। ये पाँच प्रकारके लोग महापातकी कहलाते हैं। जो साधु पुरुषोंकी निन्दा सुनता है, वह बहरा होता है; आप ही अपनी कीर्तिका बखान करनेवाला पापी गूँगा होता है; गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला मनुष्य मिरगीके रोगसे पीड़ित होता है। जो गुरुजनोंका अपमान करता है, वह कीड़ा होता है। पूजनीय पुरुषोंके कार्यकी उपेक्षा करनेवाले पुरुषकी बुद्धि दूषित होती है। साधुजनोंके द्रव्यकी चोरी करनेको जो जितने पग आगे बढ़ाता है, वह नराधम उतने ही वर्षोंतक पंगु होता है। जो दान देकर फिर छीन लेता है, वह गिरगिटकी योनिमें उत्पन्न होता है। जो क्रोधमें भरे हुए पूजनीय पुरुषोंको प्रसन्न नहीं करता उसे सिरदर्दका रोग होता है। रजस्वला स्त्रीसे समागम करनेवाला मनुष्य चाण्डाल होता है। कपड़ा चुरानेवाला सफेद कोढ़से लांछित होता है। आग लगानेवाला काली कोढ़के रोगसे पीड़ित होता है। चाँदी चुरानेवाला मेढक तथा झूठी गवाही देनेवाला मुखका रोगी होता है। परायी स्त्रियोंको काम-भावसे देखनेवाला नेत्ररोगसे कष्ट पाता है। कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके जो नहीं देता है वह अल्पायु होता है। ब्राह्मणकी वृत्तिका अपहरण करनेवाला सदा अजीर्णरोगका रोगी और अधम होता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारीको भोजन करानेसे मुँह मोड़नेवाला गृहस्थ सदा रोगी होता है। बहुत-सी पत्नियोंके होनेपर किसी एकहीमें अनुराग रखनेवाला पुरुष मेदाके क्षयरोगसे युक्त होता है। स्वामीने जिसे किसी धर्मके कार्यमें लगा दिया हो, वह यदि अन्यायपूर्वक आचरण करता है, अथवा मालिकके धनको स्वयं ही खा जाता है, तो उसे जलोदर रोग होता है। जो बलवान् होकर भी किसीके द्वारा सताये जाते हुए दुर्बलकी उपेक्षा करता है—उसे बचानेकी चेष्टा नहीं करता, वह अंगहीन होता है। अन्न चुरानेवाला भूखसे पीड़ित रहता है। व्यवहारमें पक्षपात करनेवाला मनुष्य जिह्वाके रोगसे युक्त होता है। जो धर्मके कार्यमें लगे हुए मनुष्यको उससे मना कर देता है, वह पत्नीवियोगी होता है। जो अपनी ही बनायी हुई रसोईमें सबसे पहले स्वयं भोजन करता है, उसके गलेमें रोग होता है। पंचयज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना ही भोजन करनेवाला मनुष्य गाँवका सूअर होता है। पर्वोंके दिन मैथुन करनेवालेको प्रमेहका रोग होता है। अर्थसंकटमें पड़े हुए मित्र, बन्धु, स्वामी तथा प्रिय सेवकोंका परित्याग करके उनकी ओरसे मनको हटा लेनेवाला निर्दय मनुष्य सदा जीविकाके लिये कष्ट पाता रहता है। जो माता-पिता, गुरु और स्वामीकी छलसे सेवा करता है, वह बड़े कष्टसे धन पाकर भी उससे वंचित हो जाता है। जो विश्वास करनेवाले पुरुषके धनको हड़प लेता है, वह सदा दुःखोंका भागी होता है। जो धार्मिक पुरुषके प्रति क्षुद्रतापूर्ण बर्ताव करता है, वह बौना होता है। जो दुबले बैलको हल या गाड़ीमें जोतता है, उसकी कमरमें लूता (मकरी)- का रोग होता है। गायकी हत्या करनेवाला जन्मसे ही अन्धा होता है। गौओंको दुःख देनेवाला मनुष्य पशुसे रहित होता है। जो मारने आदिके द्वारा गौओंके प्रति निर्दयताका परिचय देता है, वह
२०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मार्गमें कष्ट भोगता है। सभामें पक्षपात करनेवालेको गलगण्डका रोग होता है। सदा क्रोध करनेवाला चाण्डाल होता है। चुगली खानेवाले मनुष्यके मुँहसे सदा दुर्गन्ध आती है। बकरी बेचनेवाला मनुष्य बहेलिया होता है। कुण्ड (पतिके जीते-जी जार पुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-का अन्न भोजन करनेवाला मनुष्य सेवक होता है। नास्तिक पुरुष तेली होता है और श्रद्धाहीन मनुष्य मुर्दाके समान बना रहता है। अभक्ष्य भक्षण करनेवाले मनुष्यको गण्डमालाका रोग होता है। सबको दुःख देनेवाला मनुष्य सदा शोकमें डूबा रहता है। अन्यायसे ज्ञान ग्रहण करनेवाला मनुष्य मूर्ख होता है। शास्त्र चुरानेवाला राक्षस होता है। जो पवित्र कथासे द्वेष करता है, वह कीटमुख होता है। नरकसे लौटे हुए पुरुषकी बुद्धि अत्यन्त खोटी होती है। तालाब और बगीचेको नष्ट करनेवाला पुरुष बिना हाथका होता है। व्यवहारमें छलका सहारा लेनेवाला मनुष्य अपने सेवकोंसे मारा जाता है। परायी स्त्रीसे रति करनेवाला पुरुष सदा प्रमेहरोगसे पीड़ित रहता है। खोटा वैद्य वातका रोगी होता है। गुरुपत्नीगामी मनुष्य कोढ़ी होता है। पशुओंसे मैथुन करनेवाला भी प्रमेही होता है। अपने गोत्रकी स्त्रीसे मैथुन करनेवाला सन्तानहीन होता है। माता, बहिन और पतोहूसे सम्भोग करनेवाला मनुष्य नपुंसक होता है। कृतघ्न मनुष्यको समस्त कार्योंमें असफलता प्राप्त होती है।
ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे पापियोंका लक्षण संक्षेपसे बताया है। सम्पूर्ण लक्षणोंका वर्णन करनेमें तो चित्रगुप्त भी मोहित हो सकते हैं। ये नरकोंसे भ्रष्ट हुए पापात्मा सहस्रों योनियोंकी यातनाएँ भोगकर अन्तमें उपर्युक्त चिह्नोंसे युक्त मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं। जो धर्मको नहीं मानते हैं तथा जो दुर्व्यसनोंसे पराजित हैं, उन शेष पापियोंको अनुमानसे ही जानना चाहिये। जिनका पाप नष्ट हो गया है अथवा जो स्वर्गसे लौटे हैं, वे समस्त दुर्व्यसनोंसे मुक्त होकर एकमात्र धर्मका आश्रय लेते हैं। इस विषयमें ये श्लोक स्मरणीय हैं—
धर्मदानकृतं सौख्यमधर्माद् दुःखसम्भवम्।
तस्माद्धर्मं सुखार्थाय कुर्यात् पापं विवर्जयेत्॥
लोकद्वयेऽपि यत्सौख्यं तद्धर्मात्प्रोच्यते यतः।
धर्म एव मतिं कुर्यात् सर्वकार्यार्थसिद्धये॥
मुहूर्तंमपि जीवेद्धि नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि जीवेच्च लोकद्वयविरोधिना॥
'धर्म और दानसे सुख प्राप्त होता है और अधर्मसे दुःखकी उत्पत्ति होती है, अतः सुखके लिये धर्मका आचरण करे और पापको सर्वथा त्याग दे। इस लोक और परलोक दोनों लोकोंमें जो सुख है, उसकी प्राप्ति धर्मसे ही बतायी जाती है; अतः समस्त कार्यों और मनोरथोंकी सिद्धिके लिये धर्ममें ही मन लगावे। मनुष्य दो घड़ी भी पुण्यकर्म करते हुए ही जीवे। उभयलोकविरोधी कर्मके साथ कल्पभर भी जीनेकी इच्छा न रखे।'
विप्रवर! आपने जो कुछ पूछा है उसका मैंने अपनी शक्तिके अनुसार वर्णन किया है। यह अच्छा कहा गया हो या नहीं, उसके लिये आप क्षमा करें। अब और क्या कहूँ।
नारदजी कहते हैं—आठ वर्षके बालक कर्मठका यह भाषण सुनकर भगवान् सूर्य अत्यन्त विस्मित एवं बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस समय हारीत आदि ब्राह्मणोंकी इस प्रकार प्रशंसा की—'अहो! ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंसे यह पृथ्वी धन्य है। भगवान् प्रजापति भी धन्य हैं, जिनकी मर्यादाका इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा पालन हो रहा है। इस समय इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे चारों वेद भी धन्य हो गये हैं। जिन ब्राह्मणोंमेंसे एक बालककी बुद्धि इतनी तीव्र और स्पष्ट है, उन हारीत आदि ब्राह्मणोंकी बुद्धि कैसी होगी? निश्चय ही त्रिलोकीमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो इन ब्राह्मणोंको विदित न हो। नारदने इनके
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०५
विषयमें जितना कहा है, उससे भी ये बहुत बढ़कर हैं।' इस प्रकार उन विप्रोंकी प्रशंसा करके हर्षमें भरे हुए सूर्यदेवने कहा—'श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं सूर्य हूँ, आपका दर्शन करनेके लिये सूर्यलोकसे यहाँ आया हूँ। आज मेरे नेत्र सफल हो गये। आप-जैसे उत्तम ब्राह्मणोंके साथ वार्तालाप करने और बैठनेसे चाण्डाल भी पवित्र होते हैं। देवर्षि नारद भी सर्वथा धन्य हैं, जो त्रिलोकीके तत्त्वको जानते हैं। जिनका श्रेय आपके द्वारा उसी प्रकार बढ़ रहा है, जैसे वैधृति योगमें किये हुए दानका पुण्य बढ़ता है। मैं अपने मन और बुद्धिको एकाग्र करके आप सब लोगोंको प्रणाम करता हूँ; क्योंकि तप, विद्या और सदाचार ही बड़प्पनका प्रधान कारण है। देवताओंका संसर्ग निष्फल नहीं होता, इसलिये मुझसे कोई वर माँगिये; मैं उसे आपलोगोंको दूँगा।'
भगवान् सूर्यकी यह बात सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, स्तुति और चन्दनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका पूजन किया और मण्डलब्राह्मण आदि जपनीय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उनकी इस प्रकार स्तुति की—'आदित्य! आपकी जय हो। स्वामिन्! आपकी जय हो। भानो! आपकी जय हो। निर्मल प्रकाशस्वरूप! आपकी जय हो। वेदोंके पालक! दिवानाथ! सूर्यदेव! आपकी जय हो। आप हमारा उद्धार करें। ब्राह्मणोंके सबसे प्रधान देवता आप ही हैं। ब्राह्मण-सृष्टि सूर्यमयी ही है। आपकी कृपादृष्टि पड़नेसे हमारा यह स्थान अत्यन्त पवित्र हो गया। आज हमारे वेदाध्ययन सफल हो गये। आज हमें अपने समस्त पुण्यकर्मोंका फल मिल गया। गोपते! आपका संग पाकर आज हमारा यह गृह सफल हो गया। यदि आप हमें वर देना चाहते हैं, तो हम यही माँगते हैं कि आप हमारे इस स्थानका कभी परित्याग न करें।'
भगवान् सूर्य बोले—क्योंकि आपलोगोंने पहले 'जयादित्य' कहकर मेरा स्तवन किया है, इसलिये मैं 'जयादित्य' नामसे विख्यात होकर सदा इस स्थानमें निवास करूँगा। हे विप्रगण! जबतक पृथ्वी, समुद्र, पर्वत और नगर विद्यमान हैं, तबतक मैं इस स्थानमें अवश्य रहूँगा; कभी इसका त्याग नहीं करूँगा। यहाँ रहकर मैं अपने भक्तोंके दारिद्र्य, रोगसमूह, दाद-खुजली, कोढ़, चकता तथा अन्य प्रकारकी कोढ़ आदिका नाश करता रहूँगा। जो मानव यहाँ प्रतिष्ठित हुए मेरे श्रीविग्रहका पूजन करेगा, उसकी उस पूजाको मैं ग्रहण करूँगा।
भगवान् सूर्यके ऐसा कहनेपर हारीत आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने वेदोक्त विधिसे उनकी मूर्ति स्थापित की। तत्पश्चात् सब द्विजोंने कहा—'कमठ! तुम्हारे कारण ही भगवान् सूर्य यहाँ विराजमान हुए हैं, अतः पहले तुम्हीं इनका गुणगान करो।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ कमठने जयादित्यको प्रणाम करके इस महास्तोत्रका गान किया—'आदिदेव! आपके यथार्थरूपका साक्षात्कार नहीं, केवल यजुर्वेदके
२०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मन्त्रमें श्रवण हुआ है। ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—यह चार प्रकारकी वाणी सदा आपसे दूर-ही-दूर रहती है—आपतक पहुँच नहीं पाती। तथापि मैं इतना धृष्ट हूँ कि स्वार्थकी कामना लेकर आपका स्तवन करता हूँ। प्रभो! मेरे इस अपराधको क्षमा करें। देव! मार्तण्ड, सूर्य, अंशु, रवि, इन्द्र, भानु, भग, अर्यमा, स्वर्णरेता, दिवाकर, मित्र तथा विष्णु—इन बारह नामोंसे आप विख्यात हैं। द्वादशात्मन्! आपको नमस्कार है। त्रिलोकी आपका गर्भ-गृह है, सम्पूर्ण आकाश जलाधार (अर्घ्य) है, नक्षत्रसमूह पुष्पमाला हैं तथा आप आकाशमें स्थापित ज्योतिर्मय लिंग हैं; आपको नमस्कार है। आप देवताओंके देवता, अनाथोंके नाथ, पालनीय जनोंके पालक तथा दीनोंपर दया करनेवाले हैं। नेत्रोंके भी नेत्र (दृष्टिशक्ति-प्रदाता), मनुष्योंकी बुद्धिकी भी बुद्धि, बुद्धिसे परे तथा जीवके भी जीवन हैं। आपकी जय हो। आप दरिद्रताकी दरिद्रता, निधिकी निधि, रोगके रोग पृथ्वीमें प्रसिद्ध हैं। अप्रमेय जयादित्य! आपकी दीर्घकालतक जय हो। जो नाना प्रकारकी व्याधियोंसे ग्रस्त है, कोढ़के रोगसे पीड़ित है, जिसकी नाक गल गयी है, शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो गया है तथा जो अपनी चेतना भी खो बैठा है, ऐसे मनुष्यको उसके बन्धु-बान्धव, माता-पिता भी छोड़ देते हैं, परंतु सबके ठुकराये हुए उस अनाथ जीवका भी आप पालन करते हैं। हे देव! हे विवस्वान्! आपके सिवा दूसरा कौन इतना दयालु श्रेष्ठ देवता है? आप मेरे पिता हैं, आप ही मेरी माता हैं, आप ही गुरु तथा आप ही बन्धु-बान्धव हैं। आप ही मेरे धर्म तथा आप ही मोक्षके मार्ग हैं। देव! मैं आपका दास हूँ। त्यागिये या उबारिये। मैं पापी हूँ, मूढ़ हूँ, अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाला एवं भयानक हूँ। इतना ही नहीं, मैं पापोंकी निधि हूँ। तथापि प्रतिदिन आपके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करके आपका भजन करता हूँ। हे श्रीजयादित्य! आप अपने भक्तोंका पालन कीजिये।'*
**नारदजी कहते हैं—**महात्मा कमठके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् जयादित्यने हँसते हुए स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें उनसे कहा—'कमठ! तुमने जो यह जयादित्याष्टक सुनाया है, इससे जो
* त्वं नैव दृष्टः केवलसंश्रुतश्च यजुष्येवं व्याहरन्त्यादिदेव।
चतुर्विधा भारती दूरदूरं धृष्टः स्तौमि स्वार्थकामः क्षमैतत्॥
मार्त्तण्डसूर्यांrequestवस्तथेन्द्रो भानुर्भगश्चार्यमा स्वर्णरेताः।
दिवाकरो मित्रविष्णुश्च देव ख्यातस्त्वं वै द्वादशात्मा नमस्ते॥
लोकत्रयं वै तव गर्भगेहं जलाधारः प्रोच्यते खं समग्रम्।
नक्षत्रमाला कुसुमाभिमाला तस्मै नमो व्योमलिंगाय तुभ्यम्॥
त्वं देवदेवस्त्वमनाथनाथस्त्वं पाल्यपालः कृपणे कृपालुः।
त्वं नेत्रनेत्रं जनबुद्धिबुद्धिर्बुद्धेः परस्त्वं जय जीवजीव॥
दारिद्र्यदारिद्र्य निधे निधीनां रोगप्ररोगः प्रथितः पृथिव्याम्।
चिरञ्जयादित्य जयाप्रमेय व्याधिग्रस्तं कुष्ठरोगाभिभूतम्॥
भग्नघ्राणं शीर्णदेहं विसंज्ञं माता पिता बान्धवाः सन्त्यजन्ति।
सर्वैस्त्यक्तं पासि देव विवस्वंस्त्वत्तो देवः कोऽस्ति श्रेष्ठस्त्वदन्यः॥
त्वं मे पिता त्वं जननी त्वमेव त्वं मे गुरुर्बान्धवाश्च त्वमेव।
त्वं मे धर्मस्त्वं च मे मोक्षमार्गो दासस्तुभ्यं त्यज वा रक्ष देव॥
पापोऽस्मि मूढोऽस्मि महोग्रकर्मा रौद्रोऽस्मि पापस्य निधानमस्मि।
तथापि नित्यं प्रणिपत्य पादयोर्भजामि भक्तान् पालय श्रीजयार्क॥
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०७
मेरी स्तुति करेगा, उसके लिये इस पृथ्वीपर कुछ भी दुर्लभ न होगा। विशेषतः रविवारको मेरी पूजा करके जो इसका पाठ करेगा, उसके रोग और दरिद्रताका नाश होगा। वत्स! तुमने मुझे बहुत सन्तुष्ट किया है, अतः तुम्हें यह वर देता हूँ कि इस पृथ्वीपर सर्वज्ञ होकर तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे। तुम्हारे पिता कभी स्मृतिकार होंगे। वत्स! मैं इस स्थानका कभी त्याग नहीं करूँगा।'
भगवान् सूर्यने जब ऐसा कहा, तब ब्राह्मणोंने पुनः उनका पूजन और स्तवन किया। तत्पश्चात् उन द्विजेन्द्रसे आज्ञा लेकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। कुन्तीनन्दन! इस प्रकार इस भूतलपर आश्विनमासमें जयादित्यका प्रादुर्भाव हुआ, इसलिये वह मास वहाँ अति विशेष पर्व माना जाता है। आश्विनमासमें रविवारको कोटितीर्थमें नहाकर जो जयादित्यका पूजन करता है, वह बड़े भारी पुण्यफलको प्राप्त होता है। जयादित्यको लाल फूलमाला चढ़ाने, लाल चन्दन और रोलीका लेप करने, गन्ध-धूप आदि देने तथा घृतपक्व नैवेद्य समर्पण करनेसे ब्रह्मघाती, शराबी, सुवर्णचोर तथा गुरुपत्नीगामी भी अपने समस्त पातकोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको जाता है। इस लोकमें पुत्र, स्त्री, धन और आयु आदि संसारी सुखको पाकर अभीष्ट भोगोंसे सम्पन्न हो सूर्यलोकमें चिरकालतक निवास करता है। प्रत्येक रविवारको जयादित्यका दर्शन, कीर्तन और स्मरण भी सब रोगोंकी शान्ति करनेवाला है। जो अनादि, अनन्त, तेजोनिधि एवं अव्यक्तदेव भगवान् सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, वे रोग-शोकसे रहित सूर्यधाममें लीन होते हैं। अर्जुन ! जो लोग सूर्यग्रहण प्राप्त होनेपर एकाग्रचित्त हो सूर्यकूपमें स्नान करते, प्रयत्नपूर्वक आहुति देते तथा जयादित्यके आगे यथाशक्ति दान देते हैं, उनके पुण्यकी कैसी महिमा है, यह एकाग्रचित्त होकर सुनो। कुरुक्षेत्र, प्रभास, पुष्कर, काशी, प्रयाग अथवा नैमिषारण्यमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य जयादित्यके प्रसादसे वे लोग वहाँ भी पा लेते हैं।
नारदजीके गुणोंका वर्णन तथा गौतमेश्वरकी महिमाके प्रसंगमें योगका निरूपण
अर्जुन बोले— देवर्षे! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखनेवाले, जितेन्द्रिय तथा राग-द्वेषरहित हैं। तथापि आपमें जो कलह करानेकी प्रवृत्ति है, उसके कारण कई हजार देवता, गन्धर्व, राक्षस, दैत्य तथा मुनि नष्ट हो गये। विप्रवर! आपकी ऐसी चेष्टा क्यों होती है? मेरे इस सन्देहका निवारण कीजिये।
सूतजी कहते हैं— शौनक! अर्जुनके मुखसे यह बात सुनकर नारदमुनि हँसते हुए-से बाभ्रव्य मुनिके मुखकी ओर देखने लगे। बाभ्रव्यका जन्म हारीतके कुलमें हुआ था। वे उस समय नारदजीके पास ही उपस्थित थे। बाभ्रव्य बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने नारदजीका मनोभाव समझ लिया और हँसते हुए स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें अर्जुनसे इस प्रकार कहा।
बाभ्रव्य बोले— पाण्डुनन्दन! आपने नारदजीसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है। प्रत्येक मनुष्यके मनमें ऐसा सन्देह हो जाता है। इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे जो बात सुनी है, वही मैं आपको बताऊँगा। आजसे कुछ काल पहलेकी बात है, सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण महीसागरसंगमकी यात्रामें इधर आये थे। उनके साथ उग्रसेन, वसुदेव तथा बभ्रु, प्रद्युम्न आदि भी थे। भगवान्ने कुटुम्बिजनोंके साथ महीसागरसंगममें स्नान करके बहुत दान किये। पिण्डदान आदि करके देवपूजनके
२०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पश्चात् नारदजीकी भी पूजा की। तदनन्तर यादवोंकी सभामें महाराज उग्रसेन इस प्रकार बोले— 'जगदीश्वर श्रीकृष्ण ! मैं एक सन्देह पूछता हूँ, आप उसका समाधान करें। ये जो महाबुद्धिमान् नारदजी हैं, समस्त संसारमें इनकी ख्याति है। मैं जानना चाहता हूँ, ये अत्यन्त चपल क्यों हैं? क्यों वायुकी भाँति समस्त जगत्में चक्कर लगाया करते हैं? इन्हें कलह कराना इतना प्रिय क्यों है? तथा आपमें इनका अत्यन्त प्रेम कैसे है?'
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन् ! आपने जो पूछा है, वह सत्य है। मैं इसका कारण बतलाता हूँ। पूर्वकालमें प्रजापति दक्षने मुनिश्रेष्ठ नारदको शाप दिया था। ऐसा इसलिये हुआ कि सृष्टि-मार्गमें लगे हुए दक्षके कुछ पुत्रोंको नारदजीने अपने वैराग्यपूर्ण उपदेशोंसे विरक्त बनाकर वहाँसे अन्यत्र भेज दिया। यह घटना एक ही बार नहीं, दो बार हुई। यह सब देखकर दूसरे पुत्रोंके भी विचलित होनेसे रुष्ट होकर दक्षने शाप दिया— 'नारद ! तुम सदा संसारमें भ्रमण करते रहोगे, कहीं भी तुम्हारे ठहरनेके लिये स्थान न मिलेगा तथा तुम इधर-उधरकी चुगली खानेवाले होओगे।'
ये दो शाप प्राप्त करके उन्हें दूर करनेमें समर्थ होकर भी नारद मुनिने ज्यों-के-त्यों स्वीकार कर लिये। यही साधुता है कि स्वयं समर्थ होकर भी दूसरोंके अपराध क्षमा कर दे। नारदजी पहले यह देख लेते हैं कि अमुक दैत्य या राक्षस आदिका विनाशकाल आ पहुँचा है, तब वे उसकी कलह-भावना बढ़ाते हैं और चुगलीके लिये झूठ न बोलकर सच्ची बात बताया करते हैं, इसलिये वे पापसे लिप्त नहीं होते। सर्वत्र भ्रमण करते रहनेपर भी इनका मन ध्येयसे विचलित नहीं होता, अतः भ्रमदोषसे ये भ्रान्त नहीं होते तथा मुझमें जो इनका अधिक प्रेम है, उसका भी कारण सुनिये। मैं देवराज इन्द्रद्वारा किये गये स्तोत्रसे दिव्यदृष्टिसम्पन्न श्रीनारदजीकी सदा स्तुति करता हूँ। वह स्तोत्र श्रवण कीजिये—
'जो ब्रह्माजीकी गोदसे प्रकट हुए हैं, जिनके मनमें अहंकार नहीं है, जिनका विश्वविख्यात चरित्र किसीसे छिपा नहीं है, उन देवर्षि नारदको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनमें अरति (उद्वेग), क्रोध, चपलता और भयका सर्वथा अभाव है, जो धीर होते हुए भी दीर्घसूत्री (किसी कार्यमें अधिक विलम्ब करनेवाले) नहीं हैं, उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो कामना अथवा लोभवश झूठी बात मुँहसे नहीं निकालते और समस्त प्राणी जिनकी उपासना करते हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अध्यात्मगतिके तत्त्वको जाननेवाले, ज्ञानशक्तिसम्पन्न तथा जितेन्द्रिय हैं, जिनमें सरलता भरी है तथा जो यथार्थ बात कहनेवाले हैं, उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेज, यश, बुद्धि, नय, विनय, जन्म तथा तपस्या सभी दृष्टियोंसे बढ़े हुए हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वभाव सुखमय, वेष सुन्दर तथा भोजन उत्तम है; जो प्रकाशमान, पवित्र, शुभदृष्टिसम्पन्न तथा सुन्दर वचन बोलनेवाले
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०९
हैं; उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो उत्साहपूर्वक सबका कल्याण करते हैं, जिनमें पापका लेश भी नहीं है तथा जो परोपकार करनेसे कभी अघाते नहीं हैं, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सदा वेद, स्मृति और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका आश्रय लेते हैं तथा प्रिय और अप्रियसे रहित हैं, उन नारदजीको प्रणाम करता हूँ। जो समस्त संगोंसे अनासक्त हैं, तथापि सबमें आसक्त हुए-से दिखायी देते हैं, जिनके मनमें किसी संशयके लिये स्थान नहीं है, जो बड़े अच्छे वक्ता हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो किसी भी शास्त्रमें दोषदृष्टि नहीं करते, तपस्याका अनुष्ठान ही जिनका जीवन है, जिनका समय कभी भगवच्चिन्तनके बिना व्यर्थ नहीं जाता और जो अपने मनको सदा वशमें रखते हैं, उन श्रीनारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने तपके लिये श्रम किया है, जिनकी बुद्धि पवित्र एवं वशमें है, जो समाधिसे कभी तृप्त नहीं होते, अपने प्रयत्नमें सदा सावधान रहनेवाले उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अर्थलाभ होनेसे हर्ष नहीं मानते और लाभ न होनेपर मनमें क्लेशका अनुभव नहीं करते, जिनकी बुद्धि स्थिर तथा आत्मा अनासक्त है, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सर्वगुणसम्पन्न, दक्ष, पवित्र, कातरतारहित, कालज्ञ और नीतिज्ञ हैं, उन देवर्षि नारदको मैं भजता हूँ।'
नारदजीके इस स्तोत्रका मैं नित्य जप करता हूँ। इससे वे मुनिश्रेष्ठ मुझपर अधिक प्रेम रखते हैं। दूसरा कोई भी यदि पवित्र होकर प्रतिदिन इस स्तुतिका पाठ करे तो देवर्षि नारद बहुत शीघ्र उसपर अपना अतिशय कृपाप्रसाद प्रकट करते हैं। राजन्! आप भी नारदजीके इन गुणोंको सुनकर प्रतिदिन इस पवित्र स्तोत्रका जप करें, इससे वे मुनि आपपर बहुत प्रसन्न होंगे।
बाभ्रव्य कहते हैं—श्रीकृष्णके मुखसे नारदजीके इन गुणोंको सुनकर राजा उग्रसेन बहुत प्रसन्न हुए और उनके बताये अनुसार उनका स्तोत्रपाठ भी किया। तदनन्तर नारदजीकी पूजा करके तथा पर्याप्त दान देकर अपने बन्धु-बान्धव एवं कुटुम्बी जनोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको लौट गये। अर्जुन! तुम भी नारदजीके इन गुणोंका श्रवण करके श्रद्धामय होकर उनका पूजन करो।
बाभ्रव्यका यह वचन सुनकर अर्जुनको बड़ा विस्मय हुआ। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया और उन्होंने भक्तिपूर्वक नारदजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'मुने! आपके मुखसे इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती, अतः पुनः उसका वर्णन कीजिये।'
नारदजीने कहा—अर्जुन! पूर्वकालमें महायोगी अक्षपाद गौतम मुनि हो गये हैं, जो गोदावरी गंगाको यहाँ लाये थे और अहल्याके पति थे। वे बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर और उसे सर्वोत्तम जानकर वहाँ योगसाधना करते हुए भारी तपस्या प्रारम्भ की। तदनन्तर महात्मा गौतमने योगसिद्धि प्राप्त करके इस तीर्थमें गौतमेश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंगकी स्थापना की। इस गौतमेश्वर लिंगको भलीभाँति नहलाकर उसपर चन्दनका आलेप करके उसे भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे पूजे और गुग्गुलकी धूप जलावे। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
अर्जुन बोले—देवर्षे! मैं योगके स्वरूपका तात्त्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि योगको समस्त उत्तम साधनोंसे भी उत्तम बताकर सब लोग उसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं।
नारदजीने कहा—कुरुश्रेष्ठ! मैं संक्षेपसे ही तुम्हें योगका तत्त्व बतलाता हूँ। इसके सुननेसे भी चित्त निर्मल होता है, फिर सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है? चित्तकी वृत्तियोंको जो रोकना है, वही योगका तत्त्व कहलाता है। योगी
२१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पुरुष अष्टांगकी विधिसे उसकी साधना करते हैं। यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्येय, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ^१ अंग हैं। इस प्रकार योग आठ अंगोंसे युक्त बताया गया है। उन आठोंमेंसे प्रत्येकका लक्षण क्रमशः सुनो, जिसके साधनसे साधकको योगकी प्राप्ति होती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच 'यम' कहे गये हैं, इन सबका भी लक्षण सुनो। जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मभाव रखकर सबके हितके लिये चेष्टा करता है, उसकी यह प्रवृत्ति 'अहिंसा' कही गयी है। जिसका वेदोंमें भी विधान किया गया है, जो स्वयं देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो, अथवा अपने अनुभवमें लाया गया हो, उसे दूसरोंको पीड़ा न देते हुए यथार्थरूपसे वाणीद्वारा प्रकट करना 'सत्य' कहलाता है। अपने ऊपर आपत्ति पड़नेपर भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी प्रकार भी दूसरोंका धन न लेना 'अस्तेय' कहा गया है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा मैथुनसे सर्वथा दूर रहना यह संन्यासियोंका 'ब्रह्मचर्य' है तथा ऋतुकालमें अपनी ही पत्नीके साथ केवल एक बार समागम करना तथा अन्य समयमें पूर्ण संयम रखना यह गृहस्थोंका 'ब्रह्मचर्य' है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब वस्तुओंका त्याग कर देना यह संन्यासियोंका 'अपरिग्रह' है तथा सब वस्तुओंका संग्रह रखते हुए भी केवल मनसे उनका त्याग करना—उनके प्रति ममता और आसक्तिका न होना—यह गृहस्थोंका 'अपरिग्रह' माना गया है। ये पाँच यम बताये गये हैं। अब पाँच नियमोंका श्रवण करो। शौच, सन्तोष, तप, जप और गुरुभक्ति—ये पाँच^२ नियम हैं। अब इनका भी पृथक्-पृथक् लक्षण श्रवण करो। शौच दो प्रकारका बतलाया जाता है—बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी और जलसे जो शरीरकी शुद्धि की जाती है, वह 'बाह्य शौच' कहलाता है और मनकी शुद्धिको 'आन्तरिक शौच' कहते हैं। न्यायसे प्राप्त हुई जीविका या भिक्षा अथवा वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि)-के द्वारा जो कुछ प्राप्त हो, उसीसे सदा सन्तुष्ट रहना 'सन्तोष' कहलाता है। अपने आहारको घटाते हुए साधक पुरुष जो चान्द्रायण आदि विहित तपका अनुष्ठान करता है, उसका नाम 'तप' है। वेदोंके स्वाध्याय तथा प्रणवके अभ्यास आदिको 'जप' कहा गया है। भगवान् शिव ही ज्ञानस्वरूप गुरु हैं, उनमें जो भक्ति की जाती है, वही 'गुरुभक्ति' मानी गयी है। इस प्रकार नियमों और यमोंका भलीभाँति साधन करके विद्वान् पुरुष प्राणायामके लिये सन्नद्ध होवे, अन्यथा वह योगकी सिद्धि नहीं कर सकता; क्योंकि जिसका शरीर बाहर और भीतरसे शुद्ध नहीं हुआ है, उसमें वायुका महान् प्रकोप हो जाता है और वायुके प्रकोपसे शरीरमें कोढ़ हो जाती है। इतना ही नहीं, वह जड़ता आदिका भी उपभोग करता है (लकवा आदि मार जानेसे उसका शरीर जड़ हो जाता है), इसलिये बुद्धिमान् पुरुष शरीरको शुद्ध करके ही दूसरे साधनके लिये प्रयोग करे। पाण्डुनन्दन! अब मैं प्राणायामका लक्षण बतलाता हूँ, सुनो।
१- पातंजलयोगदर्शनके अनुसार योगके आठ अंगोंमें आसनकी भी गणना की गयी है, ध्येय तो साध्य है। अतः साधनका अंग नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ साध्यको अष्टांगोंमें नहीं लिया गया है। यम-नियम आदि अन्य सात साधन उसमें भी वे ही हैं, जो यहाँ स्कन्दपुराणमें दिये गये हैं।
२- योगदर्शनमें शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान—ये पाँच नियम कहे गये हैं। यहाँ भी तीन तो वैसे ही हैं। स्वाध्यायके स्थानमें यहाँ जप लिया गया है। परन्तु जपके लक्षणमें स्वाध्यायको ग्रहण करके दोनोंकी एकता मान ली गयी है। शिवकी भक्ति ही यहाँ गुरुभक्ति है, अतः यह भी ईश्वर-प्रणिधानसे भिन्न नहीं है।
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २११
प्राण और अपान वायुका निरोध 'प्राणायाम' कहलाता है। विद्वान् पुरुषोंने उसे तीन प्रकारका बतलाया है— लघु, मध्यम और उत्तरीय (उत्तम)। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। आँखको बंद करने और खोलनेमें जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। लघुसे दूना अर्थात् चौबीस मात्रावाला मध्यम प्राणायाम बताया गया है। त्रिगुण अर्थात् छत्तीस मात्राका उत्तम प्राणायाम माना गया है। प्रथम अर्थात् लघु प्राणायामसे स्वेद (पसीने)-को जीते, मध्यमसे कम्पको तथा तृतीय (उत्तम) प्राणायामसे विषादको जीते। इस प्रकार क्रमशः इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। किसी सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक विराजमान हो पद्मासन* लगाकर रेचक, पूरक और कुम्भक भेदसे त्रिविध प्राणायामका अभ्यास करे। प्राणोंका उपरोध (संयम) करनेसे उस साधनका नाम 'प्राणायाम' है। जैसे आगमें धौंकनेपर पर्वतीय धातुओंकी मैल जल जाती है, उसी प्रकार प्राणायामसे इन्द्रियजनित सम्पूर्ण दोष दग्ध हो जाते हैं। सौ कपिला गायोंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही प्राणायामसे भी मिल जाता है। इसलिये योगज्ञ पुरुष सदैव प्राणायाम करे। प्राणायामसे शान्ति आदि दिव्य गुण सिद्ध होते हैं। शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद— ये क्रमशः प्रकट होनेवाले दिव्य गुण हैं। स्वाभाविक और आगन्तुक पापोंकी निवृत्ति तथा उनकी वासनाओंका शमन यह 'शान्ति' नामक प्रथम गुण है। मन और बुद्धिके द्वारा लोभ और मोहरूपी दोषोंका पूर्णतया निराकरण करके जो शान्तिकी प्राप्ति होती है, उसीको इस लोकमें 'प्रशान्ति' कहते हैं। भूत, भविष्य, दूरस्थ तथा अदृश्य पदार्थोंका यहाँ भलीभाँति ज्ञान होना ही 'दीप्ति' है। सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी प्रसन्नता तथा बुद्धि और प्राणोंकी भी निर्मलताको 'प्रसाद' कहा गया है। इस प्रकार ये चार फल प्राणायामके द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं। ऐसे फलवाले प्राणायामका योगी पुरुष सदैव अभ्यास करे। जैसे सदा सेवन करनेपर सिंह, व्याघ्र और हाथी भी मृदुता (कोमलता एवं नम्रता)-को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार प्राणायामद्वारा साधित (संयममें लाया हुआ) प्राण भी वशमें हो जाता है। यह प्राणायाम बताया गया। अब प्रत्याहारका वर्णन सुनो। विषय-सेवनमें लगे हुए चित्तको विषयोंकी ओरसे लौटानेका जो प्रयत्न है, उसे 'प्रत्याहार' बताया गया है। चित्तको संयममें रखना ही प्रत्याहारका मुख्य लक्षण है। इस प्रकार प्रत्याहार बताया गया। अब धारणाका लक्षण सुनो। जैसे जल पीनेकी अभिलाषा रखनेवाले लोग पत्र और नाल आदिके द्वारा धीरे-धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष धारणाद्वारा साधित वायुका धीरे-धीरे पान करता है। गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, तालु तथा भ्रूमध्यभाग (ललाट)-में क्रमशः चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल, षोडशदल तथा द्विदल कमलका चिन्तन करके उन सबमें प्राणवायुकी धारणा करे और धीरे-धीरे एक स्थानसे समेटकर दूसरे स्थानमें ऊपर उठाते हुए उस प्राणको मस्तकके भीतर ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित कर दे। गुदा आदि छः अंग और चतुर्दल आदि छः चक्र— इन बारह स्थानोंमें प्राणवायुकी धारणा तथा संकोच करनेसे सब मिलकर बारह प्राणायाम
* पद्मासन लगानेकी विधि यह है—दायीं जाँघपर बायाँ चरण रखे और बायीं जाँघपर दायाँ चरण रखे। फिर बायें हाथको पीठकी ओरसे ले जाकर दायें चरणका अंगूठा दृढ़ताके साथ पकड़ ले। इसी प्रकार दायें हाथको पीछेकी ओरसे ले जाकर बायें चरणका अंगूठा पकड़ ले। फिर गर्दन झुकाकर अपनी ठोढ़ीको छातीमें सटा ले और नेत्रोंसे केवल नासिकाके अग्रभागको ही देखे। यह योगाभ्यासी पुरुषोंके उपयोगमें आनेवाला पद्मासन कहलाता है, यह रोगोंका नाश करनेवाला है।
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होते हैं। इसीको 'धारणा' कहा गया है। इन धारणाओंको सिद्ध कर लेनेपर योगी पुरुष अक्षर ब्रह्मकी समताको प्राप्त हो जाता है। धारणामें स्थित हुए पुरुषके ये जो ध्येयतत्त्व हैं, उसका लक्षण सुनो। अर्जुन ! ध्येयतत्त्व बहुत प्रकारका है, उनका कहीं अन्त नहीं मिलता। कोई शिवका, कोई विष्णुका, कोई सूर्य और ब्रह्माका तथा कोई महादेवीका ध्यान करते हैं। जो जिसका ध्यान करता है, वह उसीमें लीन होता है, इसलिये सदा कल्याण करनेवाले पंचमुख भगवान् शंकरका ध्यान करना चाहिये। भगवान् शिव वृषभकी पीठपर पद्मासनसे विराजमान हैं, उनकी अंगकान्ति गौर है, उनके दस हाथ हैं और मुखपर अत्यन्त प्रसन्नता छा रही है तथा वे ध्यानमग्न हो रहे हैं। इस प्रकार तुम्हारे लिये 'ध्येय' का स्वरूप बताया गया। इसका सदा ध्यान करना चाहिये। 'ध्यान' का लक्षण इस प्रकार है। धारणामें स्थित हुआ साधक आधे पलके लिये भी अपने ध्येय (इष्टदेव)-से भिन्न वस्तुका चिन्तन न करे। इस प्रकार इस दुर्गम भूमिकामें स्थित होकर योगवेत्ता पुरुष कुछ भी चिन्तन न करे—यही 'समाधि' कहलाती है। समाधिका ठीक-ठीक लक्षण बता रहा हूँ, सुनो। जो शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा रूपसे सर्वथा रहित है, उस परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हुआ योगी 'समाधिस्थ' कहा गया है। समाधिमें स्थित हुआ मनुष्य कभी विघ्नोंसे अभिभूत नहीं होता। भारी-से-भारी दुःख क्यों न आ जाय, वह उससे भी विचलित नहीं होता। उसके कानोंके पास यदि सैकड़ों शंख फूँके जायँ और बहुत-से नगाड़े पीटे जायँ तो भी वह बाहरके शब्दको नहीं सुनता। कोड़ोंके प्रहारसे उसे घायल कर दिया जाय, आगसे उसका शरीर जल जाय तथा सर्दीसे भरे हुए भयंकर स्थानमें उसे बैठा दिया जाय, तो भी वह बाहरके स्पर्शका अनुभव नहीं करता। फिर वैसे पुरुषके लिये बाहरी रूप, गन्ध और रसके विषयमें तो कहना ही क्या है? जो इस प्रकार आत्माका साक्षात्कार करके पुनः समाधिको प्राप्त करता है, उसे भूख और प्यास कभी बाधा नहीं पहुँचा सकती। निश्चल समाधिको पाकर मनुष्य जिस सुखका अनुभव करता है, वह न तो स्वर्गलोकमें है और न पातालमें ही है; फिर मनुष्यलोकमें तो वह हो ही कहाँ सकता है।
कुरुनन्दन! इस प्रकार योगमार्गमें आरूढ़ हुए पुरुषके लिये भी पाँच उपसर्ग प्राप्त होते हैं, जो बड़े ही कटु हैं—उनका परिचय सुनो। प्रातिभ, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये ही पाँच उपसर्ग हैं। सम्पूर्ण शास्त्रोंकी प्रतिभा (ज्ञान)का हो जाना ही 'प्रातिभ' उपसर्ग है। यह है तो सात्त्विक परंतु इसके कारण जिसके हृदयमें अहंकार आ जाता है, इससे वह योगी अपनी स्थितिसे नीचे गिर जाता है। हजारों योजन दूरसे भी शब्दको सुन लेना 'श्रावण' नामक उपसर्ग है। यह दूसरा विघ्न है। यह भी सात्त्विक ही है परंतु इसके कारण भी जो गर्व करता है, वह नष्ट हो जाता है (साधनासे गिर जाता है)। जिससे देवताओंकी आठ योनियोंको देखता है, उस शक्तिका प्राप्त होना 'दैव' उपसर्ग है। यह भी सात्त्विक दोष है, इससे भी घमण्ड होनेपर साधकका विनाश होता है। जैसे जलके भँवरमें डूबा हुआ मनुष्य व्याकुल होता है, उसी प्रकार सहसा प्रकट हुए विविध विज्ञानके आवर्तमें जो चित्तकी व्याकुलता होती है, उसका नाम 'आवर्त' है। यह राजस दोष है, जो बड़ा भयंकर है। जब योगीका मन अनेक प्रकारके दोषोंसे आक्रान्त हो समस्त आधारोंसे भ्रष्ट होनेके कारण अवलम्बशून्य होकर भटकने लगता है तब उसे 'भ्रम' नामक दोष बताया जाता है। यह तामस दोष है। इन
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१३
अत्यन्त घोर उपद्रवोंसे योगका नाश हो जानेके कारण सम्पूर्ण देवयोनियाँ बार-बार आवर्तन करती (आवागमनमें पड़ी रहती) हैं।
इसलिये योगी मनोमय* श्वेत कंबलका आवरण डालकर परब्रह्म परमात्मामें चित्तको स्थिर करके निरन्तर उन्हींका चिन्तन करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले योगीको सदा सात्त्विक आहारका सेवन करना चाहिये। राजस और तामस आहारोंसे योगीको कभी सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती। स्वधर्मपालनमें लगे हुए श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय महात्माओंके यहाँ योगीको भिक्षा माँगनी चाहिये। भिक्षामें मिले हुए यवान्न, मट्ठा, दूध, जौकी लपसी, पका हुआ फल-मूल अथवा कन, तिलकी खली या सत्तू—ये सब पवित्र आहार हैं, जो योगियोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
योगका साधक विभिन्न लक्षणोंसे अपनी मृत्युका समय जानकर कालको वंचित करनेके लिये एकाग्रचित्त हो योगतत्पर हो जाय। अब मैं उन निमित्तों (लक्षणों)-को बतलाता हूँ, जिनसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। लाल चमड़ा अथवा लाल वस्त्र धारण किये हुए हँसती-गाती हुई कोई स्त्री स्वप्नमें जिस पुरुषको दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें किसी नंगे संन्यासीको हँसते और उछलते-कूदते देखकर यह समझ लेना चाहिये कि उसके रूपमें अपनी मृत्यु आ गयी है। जो स्वप्नमें रीछ और वानरसे जुते हुए रथपर बैठकर गाता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर जाता है अथवा कीचड़ या गोबरमें डूबता है, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें बिना जलकी नदीको केश, अंगार, भस्म अथवा सर्पोंसे किसी एकके द्वारा भरी हुई देखकर मनुष्य जीवित नहीं रहता। यदि विकराल, भयंकर तथा क्रूर स्वभाववाले मनुष्य हाथमें हथियार लिये स्वप्नमें पत्थरोंसे मारें तो मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त हो जाता है। सूर्योदयकालमें रोती हुई गीदड़ी जिसके सामने होकर दाहिने अथवा बायें चली जाती है, वह भी शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो दीपके बुझनेकी गन्धको नहीं जानता, रातमें रक्तवमन करता है तथा दूसरेके नेत्रमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता, वह जीवित नहीं रहता। आधी रातमें इन्द्रधनुष और दिनमें तारागणोंको देखकर शास्त्रविश्वासी पुरुष यह मान ले कि उसकी आयु क्षीण हो गयी है। जिसकी नाक टेढ़ी हो जाय, कानोंमें नीचाई-ऊँचाई आ जाय तथा बायीं आँख सदा बहती रहे; उसकी आयु समाप्त हो गयी है। जब मुँह कुछ-कुछ लाल हो जाय और जीभ काली पड़ जाय, तब विद्वान् पुरुषको यह समझ लेना चाहिये कि अपनी मृत्यु समीप आ गयी है। जो स्वप्नमें ऊँट और गदहेकी सवारीसे दक्षिण दिशाकी ओर जाता है तथा जो अपने दोनों कान बंद करके आवाज नहीं सुन पाता; वह जीवित नहीं रहता है। स्वप्नमें जो गड्ढेमें गिर जाय और उसके निकलनेका दरवाजा बंद कर दिया जाय, जिससे वह फिर उठ न सके; जिसकी स्वच्छ दृष्टि भी लाल हो जाय, जो स्वप्नमें अग्निप्रवेश करके फिर वहाँसे न निकले, इसी तरह जलमें प्रवेश करके वहाँसे न निकले, तो वही उसके जीवनका अन्तिम काल है। जो रात या दिनमें दुष्ट भूतोंद्वारा मारा जाता है तथा जिसकी प्रकृतिमें कोई विकार आ गया है, उसके निकट ही यमराज और काल मौजूद हैं। जो भक्त होकर भी देवता, गुरु, पिता-माता तथा ज्ञानी पुरुषोंकी निन्दा और अवहेलना करता है, वह जीवित नहीं रहता है।
* मनसे यह भावना करे कि मेरे सब ओर श्वेत कंबलका आवरण पड़ा है, मैं अकेला हूँ, जगत्की कोई विघ्न-बाधा मेरे पासतक नहीं पहुँच सकती।
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योगवेत्ता पुरुष इस प्रकार मृत्युसूचक विपरीत लक्षणोंको देखकर उत्तम धारणाका आश्रय ले समाधिमें स्थिर हो जाय। यदि वह उस मृत्युको नहीं चाहता तो उसे वह नहीं प्राप्त होती अथवा यदि मुक्तिकी इच्छा हो तो उस मृत्युको ब्रह्मरन्ध्रमें छोड़ दे। इस प्रकार विमुक्त हुए शरीरमें भी जो उपसर्ग योगीको प्राप्त होते हैं, उनके नाम सुनो। ईशान, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, इन्द्र, चन्द्र, प्रजापति तथा ब्रह्मा—इनसे सम्बन्ध रखनेवाली आठ लोकोंमें क्रमशः आठ सिद्धियाँ होती हैं, जो इस प्रकार हैं—पार्थिवी, जलमयी, तैजसी, वायुसम्बन्धिनी, आकाशसम्बन्धिनी, मानसी, अहंकारोद्भवा तथा बुद्धिजा। इनमें प्रत्येकके आठ-आठ भेद हैं और ये उत्तरोत्तर लोकोंमें क्रमशः द्विगुण-त्रिगुण आदिके क्रमसे स्थित हैं। पूर्व अर्थात् ईशानलोकमें आठ सिद्धियाँ हैं और अन्तिम अर्थात् ब्रह्मलोकमें इनकी संख्या चौंसठ हो जाती है। ऐसा किस प्रकार होता है, सो सुनो। मोटा होना, पतला होना, बालक बन जाना, बूढ़ा होना, जवान हो जाना, भिन्न-भिन्न जातिके जीवोंके रूपमें अपनेको प्रकट करना, एक ही जातिमें भी अनेक रूप ग्रहण करना तथा पार्थिव अंशके बिना ही केवल चार तत्त्वोंसे शरीरको धारण करना—ये आठ पार्थिवी सिद्धियाँ हैं, जो ईशानलोकमें पृथ्वीतत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके बाद प्रकट होती हैं।
जलतत्त्वपर विजय होनेके पश्चात् मनुष्य पृथ्वीकी ही भाँति जलमें निवास करता है। बिना किसी घबराहटके समुद्रको पी सकता है, उसे सर्वत्र जलकी प्राप्ति होती है, वह सूखे फलको भी हरा और रसीला कर सकता है। पृथ्वी और जलको छोड़कर केवल तीन भूतोंसे शरीर धारण करता है। नदियोंको हाथमें रख सकता है, उसके शरीरमें कोई घाव नहीं होता तथा उसकी बड़ी सुन्दर कान्ति होती है। इस प्रकार ये आठ नूतन और आठ पहलेकी, कुल सोलह सिद्धियाँ राक्षसलोकमें मानी गयी हैं।
अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जानेपर देहसे अग्नि प्रकट करना, अग्निके तापका भय दूर हो जाना, समस्त लोकोंको भस्म कर डालनेकी शक्तिका होना, पानीमें आग लगा देना, हाथसे आगको उठा लेना, स्मरणमात्रसे किसीको पवित्र कर देना, आगसे जलकर भस्म हुए पदार्थका पुनः निर्माण कर देना तथा केवल दो महाभूत वायु और आकाशके आधारपर शरीरको धारण करना—ये आठ तैजस सिद्धियाँ और पहलेकी सोलह सब मिलकर चौबीस सिद्धियाँ यक्षलोकमें प्रकट होती हैं।
मनके समान गमनशक्तिका होना, प्राणियोंके भीतर प्रवेश करना, पर्वत आदि बड़ी भारी वस्तुओंका भार लीलापूर्वक ढोना, हलका होना, भारी हो जाना, दोनों हाथोंसे वायुको पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागके धक्केसे समूची पृथ्वीको हिला देना तथा एकमात्र आकाशतत्त्वसे ही शरीरको धारण करना—ये वायुसम्बन्धिनी शक्तियाँ गन्धर्वलोकमें हैं। पहलेकी चौबीस और आठ नूतन कुल मिलाकर बत्तीस सिद्धियाँ गन्धर्वलोकमें हैं।
अपनी छायाको मिटा देना, इन्द्रियोंका दर्शन न होना, सदा आकाशमें चलना, इन्द्रिय और मन आदिका स्वयं शान्त रहना, दूरके शब्दको सुन लेना, सब प्राणियोंके शब्दको समझ लेना, तन्मात्राओंके चिह्नको ग्रहण कर लेना तथा समस्त प्राणियोंको देखना—ये आठ आकाशतत्त्वको जीतनेसे प्राप्त होनेवाली तथा पहलेकी बत्तीस कुल चालीस सिद्धियाँ इन्द्रलोकमें हैं।
इच्छाके अनुरूप वस्तुओंका प्राप्त होना, जहाँ इच्छा हो वहीं निकल जाना, सब प्रकारकी शक्तियोंका होना, समस्त गोपनीय वस्तुओंको देखना तथा समस्त संसारकी घटनाओंको देखना आदि आठ सिद्धियाँ मानसी हैं—ये तथा पहलेकी चालीस कुल अड़तालीस सिद्धियाँ चन्द्रलोकमें मानी गयी हैं।