संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पुरुष अष्टांगकी विधिसे उसकी साधना करते हैं। यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्येय, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ^१ अंग हैं। इस प्रकार योग आठ अंगोंसे युक्त बताया गया है। उन आठोंमेंसे प्रत्येकका लक्षण क्रमशः सुनो, जिसके साधनसे साधकको योगकी प्राप्ति होती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच 'यम' कहे गये हैं, इन सबका भी लक्षण सुनो। जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मभाव रखकर सबके हितके लिये चेष्टा करता है, उसकी यह प्रवृत्ति 'अहिंसा' कही गयी है। जिसका वेदोंमें भी विधान किया गया है, जो स्वयं देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो, अथवा अपने अनुभवमें लाया गया हो, उसे दूसरोंको पीड़ा न देते हुए यथार्थरूपसे वाणीद्वारा प्रकट करना 'सत्य' कहलाता है। अपने ऊपर आपत्ति पड़नेपर भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी प्रकार भी दूसरोंका धन न लेना 'अस्तेय' कहा गया है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा मैथुनसे सर्वथा दूर रहना यह संन्यासियोंका 'ब्रह्मचर्य' है तथा ऋतुकालमें अपनी ही पत्नीके साथ केवल एक बार समागम करना तथा अन्य समयमें पूर्ण संयम रखना यह गृहस्थोंका 'ब्रह्मचर्य' है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब वस्तुओंका त्याग कर देना यह संन्यासियोंका 'अपरिग्रह' है तथा सब वस्तुओंका संग्रह रखते हुए भी केवल मनसे उनका त्याग करना—उनके प्रति ममता और आसक्तिका न होना—यह गृहस्थोंका 'अपरिग्रह' माना गया है। ये पाँच यम बताये गये हैं। अब पाँच नियमोंका श्रवण करो। शौच, सन्तोष, तप, जप और गुरुभक्ति—ये पाँच^२ नियम हैं। अब इनका भी पृथक्-पृथक् लक्षण श्रवण करो। शौच दो प्रकारका बतलाया जाता है—बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी और जलसे जो शरीरकी शुद्धि की जाती है, वह 'बाह्य शौच' कहलाता है और मनकी शुद्धिको 'आन्तरिक शौच' कहते हैं। न्यायसे प्राप्त हुई जीविका या भिक्षा अथवा वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि)-के द्वारा जो कुछ प्राप्त हो, उसीसे सदा सन्तुष्ट रहना 'सन्तोष' कहलाता है। अपने आहारको घटाते हुए साधक पुरुष जो चान्द्रायण आदि विहित तपका अनुष्ठान करता है, उसका नाम 'तप' है। वेदोंके स्वाध्याय तथा प्रणवके अभ्यास आदिको 'जप' कहा गया है। भगवान् शिव ही ज्ञानस्वरूप गुरु हैं, उनमें जो भक्ति की जाती है, वही 'गुरुभक्ति' मानी गयी है। इस प्रकार नियमों और यमोंका भलीभाँति साधन करके विद्वान् पुरुष प्राणायामके लिये सन्नद्ध होवे, अन्यथा वह योगकी सिद्धि नहीं कर सकता; क्योंकि जिसका शरीर बाहर और भीतरसे शुद्ध नहीं हुआ है, उसमें वायुका महान् प्रकोप हो जाता है और वायुके प्रकोपसे शरीरमें कोढ़ हो जाती है। इतना ही नहीं, वह जड़ता आदिका भी उपभोग करता है (लकवा आदि मार जानेसे उसका शरीर जड़ हो जाता है), इसलिये बुद्धिमान् पुरुष शरीरको शुद्ध करके ही दूसरे साधनके लिये प्रयोग करे। पाण्डुनन्दन! अब मैं प्राणायामका लक्षण बतलाता हूँ, सुनो।
१- पातंजलयोगदर्शनके अनुसार योगके आठ अंगोंमें आसनकी भी गणना की गयी है, ध्येय तो साध्य है। अतः साधनका अंग नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ साध्यको अष्टांगोंमें नहीं लिया गया है। यम-नियम आदि अन्य सात साधन उसमें भी वे ही हैं, जो यहाँ स्कन्दपुराणमें दिये गये हैं।
२- योगदर्शनमें शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान—ये पाँच नियम कहे गये हैं। यहाँ भी तीन तो वैसे ही हैं। स्वाध्यायके स्थानमें यहाँ जप लिया गया है। परन्तु जपके लक्षणमें स्वाध्यायको ग्रहण करके दोनोंकी एकता मान ली गयी है। शिवकी भक्ति ही यहाँ गुरुभक्ति है, अतः यह भी ईश्वर-प्रणिधानसे भिन्न नहीं है।