संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०९
हैं; उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो उत्साहपूर्वक सबका कल्याण करते हैं, जिनमें पापका लेश भी नहीं है तथा जो परोपकार करनेसे कभी अघाते नहीं हैं, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सदा वेद, स्मृति और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका आश्रय लेते हैं तथा प्रिय और अप्रियसे रहित हैं, उन नारदजीको प्रणाम करता हूँ। जो समस्त संगोंसे अनासक्त हैं, तथापि सबमें आसक्त हुए-से दिखायी देते हैं, जिनके मनमें किसी संशयके लिये स्थान नहीं है, जो बड़े अच्छे वक्ता हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो किसी भी शास्त्रमें दोषदृष्टि नहीं करते, तपस्याका अनुष्ठान ही जिनका जीवन है, जिनका समय कभी भगवच्चिन्तनके बिना व्यर्थ नहीं जाता और जो अपने मनको सदा वशमें रखते हैं, उन श्रीनारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने तपके लिये श्रम किया है, जिनकी बुद्धि पवित्र एवं वशमें है, जो समाधिसे कभी तृप्त नहीं होते, अपने प्रयत्नमें सदा सावधान रहनेवाले उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अर्थलाभ होनेसे हर्ष नहीं मानते और लाभ न होनेपर मनमें क्लेशका अनुभव नहीं करते, जिनकी बुद्धि स्थिर तथा आत्मा अनासक्त है, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सर्वगुणसम्पन्न, दक्ष, पवित्र, कातरतारहित, कालज्ञ और नीतिज्ञ हैं, उन देवर्षि नारदको मैं भजता हूँ।'
नारदजीके इस स्तोत्रका मैं नित्य जप करता हूँ। इससे वे मुनिश्रेष्ठ मुझपर अधिक प्रेम रखते हैं। दूसरा कोई भी यदि पवित्र होकर प्रतिदिन इस स्तुतिका पाठ करे तो देवर्षि नारद बहुत शीघ्र उसपर अपना अतिशय कृपाप्रसाद प्रकट करते हैं। राजन्! आप भी नारदजीके इन गुणोंको सुनकर प्रतिदिन इस पवित्र स्तोत्रका जप करें, इससे वे मुनि आपपर बहुत प्रसन्न होंगे।
बाभ्रव्य कहते हैं—श्रीकृष्णके मुखसे नारदजीके इन गुणोंको सुनकर राजा उग्रसेन बहुत प्रसन्न हुए और उनके बताये अनुसार उनका स्तोत्रपाठ भी किया। तदनन्तर नारदजीकी पूजा करके तथा पर्याप्त दान देकर अपने बन्धु-बान्धव एवं कुटुम्बी जनोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको लौट गये। अर्जुन! तुम भी नारदजीके इन गुणोंका श्रवण करके श्रद्धामय होकर उनका पूजन करो।
बाभ्रव्यका यह वचन सुनकर अर्जुनको बड़ा विस्मय हुआ। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया और उन्होंने भक्तिपूर्वक नारदजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'मुने! आपके मुखसे इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती, अतः पुनः उसका वर्णन कीजिये।'
नारदजीने कहा—अर्जुन! पूर्वकालमें महायोगी अक्षपाद गौतम मुनि हो गये हैं, जो गोदावरी गंगाको यहाँ लाये थे और अहल्याके पति थे। वे बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर और उसे सर्वोत्तम जानकर वहाँ योगसाधना करते हुए भारी तपस्या प्रारम्भ की। तदनन्तर महात्मा गौतमने योगसिद्धि प्राप्त करके इस तीर्थमें गौतमेश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंगकी स्थापना की। इस गौतमेश्वर लिंगको भलीभाँति नहलाकर उसपर चन्दनका आलेप करके उसे भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे पूजे और गुग्गुलकी धूप जलावे। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
अर्जुन बोले—देवर्षे! मैं योगके स्वरूपका तात्त्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि योगको समस्त उत्तम साधनोंसे भी उत्तम बताकर सब लोग उसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं।
नारदजीने कहा—कुरुश्रेष्ठ! मैं संक्षेपसे ही तुम्हें योगका तत्त्व बतलाता हूँ। इसके सुननेसे भी चित्त निर्मल होता है, फिर सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है? चित्तकी वृत्तियोंको जो रोकना है, वही योगका तत्त्व कहलाता है। योगी