संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०९
हैं; उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो उत्साहपूर्वक सबका कल्याण करते हैं, जिनमें पापका लेश भी नहीं है तथा जो परोपकार करनेसे कभी अघाते नहीं हैं, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सदा वेद, स्मृति और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका आश्रय लेते हैं तथा प्रिय और अप्रियसे रहित हैं, उन नारदजीको प्रणाम करता हूँ। जो समस्त संगोंसे अनासक्त हैं, तथापि सबमें आसक्त हुए-से दिखायी देते हैं, जिनके मनमें किसी संशयके लिये स्थान नहीं है, जो बड़े अच्छे वक्ता हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो किसी भी शास्त्रमें दोषदृष्टि नहीं करते, तपस्याका अनुष्ठान ही जिनका जीवन है, जिनका समय कभी भगवच्चिन्तनके बिना व्यर्थ नहीं जाता और जो अपने मनको सदा वशमें रखते हैं, उन श्रीनारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने तपके लिये श्रम किया है, जिनकी बुद्धि पवित्र एवं वशमें है, जो समाधिसे कभी तृप्त नहीं होते, अपने प्रयत्नमें सदा सावधान रहनेवाले उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अर्थलाभ होनेसे हर्ष नहीं मानते और लाभ न होनेपर मनमें क्लेशका अनुभव नहीं करते, जिनकी बुद्धि स्थिर तथा आत्मा अनासक्त है, उन नारदजीको नमस्कार करता हूँ। जो सर्वगुणसम्पन्न, दक्ष, पवित्र, कातरतारहित, कालज्ञ और नीतिज्ञ हैं, उन देवर्षि नारदको मैं भजता हूँ।'
नारदजीके इस स्तोत्रका मैं नित्य जप करता हूँ। इससे वे मुनिश्रेष्ठ मुझपर अधिक प्रेम रखते हैं। दूसरा कोई भी यदि पवित्र होकर प्रतिदिन इस स्तुतिका पाठ करे तो देवर्षि नारद बहुत शीघ्र उसपर अपना अतिशय कृपाप्रसाद प्रकट करते हैं। राजन्! आप भी नारदजीके इन गुणोंको सुनकर प्रतिदिन इस पवित्र स्तोत्रका जप करें, इससे वे मुनि आपपर बहुत प्रसन्न होंगे।
बाभ्रव्य कहते हैं—श्रीकृष्णके मुखसे नारदजीके इन गुणोंको सुनकर राजा उग्रसेन बहुत प्रसन्न हुए और उनके बताये अनुसार उनका स्तोत्रपाठ भी किया। तदनन्तर नारदजीकी पूजा करके तथा पर्याप्त दान देकर अपने बन्धु-बान्धव एवं कुटुम्बी जनोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको लौट गये। अर्जुन! तुम भी नारदजीके इन गुणोंका श्रवण करके श्रद्धामय होकर उनका पूजन करो।
बाभ्रव्यका यह वचन सुनकर अर्जुनको बड़ा विस्मय हुआ। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया और उन्होंने भक्तिपूर्वक नारदजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'मुने! आपके मुखसे इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती, अतः पुनः उसका वर्णन कीजिये।'
नारदजीने कहा—अर्जुन! पूर्वकालमें महायोगी अक्षपाद गौतम मुनि हो गये हैं, जो गोदावरी गंगाको यहाँ लाये थे और अहल्याके पति थे। वे बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य सुनकर और उसे सर्वोत्तम जानकर वहाँ योगसाधना करते हुए भारी तपस्या प्रारम्भ की। तदनन्तर महात्मा गौतमने योगसिद्धि प्राप्त करके इस तीर्थमें गौतमेश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंगकी स्थापना की। इस गौतमेश्वर लिंगको भलीभाँति नहलाकर उसपर चन्दनका आलेप करके उसे भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे पूजे और गुग्गुलकी धूप जलावे। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
अर्जुन बोले—देवर्षे! मैं योगके स्वरूपका तात्त्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि योगको समस्त उत्तम साधनोंसे भी उत्तम बताकर सब लोग उसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं।
नारदजीने कहा—कुरुश्रेष्ठ! मैं संक्षेपसे ही तुम्हें योगका तत्त्व बतलाता हूँ। इसके सुननेसे भी चित्त निर्मल होता है, फिर सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है? चित्तकी वृत्तियोंको जो रोकना है, वही योगका तत्त्व कहलाता है। योगी
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पुरुष अष्टांगकी विधिसे उसकी साधना करते हैं। यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्येय, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ^१ अंग हैं। इस प्रकार योग आठ अंगोंसे युक्त बताया गया है। उन आठोंमेंसे प्रत्येकका लक्षण क्रमशः सुनो, जिसके साधनसे साधकको योगकी प्राप्ति होती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच 'यम' कहे गये हैं, इन सबका भी लक्षण सुनो। जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मभाव रखकर सबके हितके लिये चेष्टा करता है, उसकी यह प्रवृत्ति 'अहिंसा' कही गयी है। जिसका वेदोंमें भी विधान किया गया है, जो स्वयं देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो, अथवा अपने अनुभवमें लाया गया हो, उसे दूसरोंको पीड़ा न देते हुए यथार्थरूपसे वाणीद्वारा प्रकट करना 'सत्य' कहलाता है। अपने ऊपर आपत्ति पड़नेपर भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी प्रकार भी दूसरोंका धन न लेना 'अस्तेय' कहा गया है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा मैथुनसे सर्वथा दूर रहना यह संन्यासियोंका 'ब्रह्मचर्य' है तथा ऋतुकालमें अपनी ही पत्नीके साथ केवल एक बार समागम करना तथा अन्य समयमें पूर्ण संयम रखना यह गृहस्थोंका 'ब्रह्मचर्य' है। मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब वस्तुओंका त्याग कर देना यह संन्यासियोंका 'अपरिग्रह' है तथा सब वस्तुओंका संग्रह रखते हुए भी केवल मनसे उनका त्याग करना—उनके प्रति ममता और आसक्तिका न होना—यह गृहस्थोंका 'अपरिग्रह' माना गया है। ये पाँच यम बताये गये हैं। अब पाँच नियमोंका श्रवण करो। शौच, सन्तोष, तप, जप और गुरुभक्ति—ये पाँच^२ नियम हैं। अब इनका भी पृथक्-पृथक् लक्षण श्रवण करो। शौच दो प्रकारका बतलाया जाता है—बाह्य और आभ्यन्तर। मिट्टी और जलसे जो शरीरकी शुद्धि की जाती है, वह 'बाह्य शौच' कहलाता है और मनकी शुद्धिको 'आन्तरिक शौच' कहते हैं। न्यायसे प्राप्त हुई जीविका या भिक्षा अथवा वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि)-के द्वारा जो कुछ प्राप्त हो, उसीसे सदा सन्तुष्ट रहना 'सन्तोष' कहलाता है। अपने आहारको घटाते हुए साधक पुरुष जो चान्द्रायण आदि विहित तपका अनुष्ठान करता है, उसका नाम 'तप' है। वेदोंके स्वाध्याय तथा प्रणवके अभ्यास आदिको 'जप' कहा गया है। भगवान् शिव ही ज्ञानस्वरूप गुरु हैं, उनमें जो भक्ति की जाती है, वही 'गुरुभक्ति' मानी गयी है। इस प्रकार नियमों और यमोंका भलीभाँति साधन करके विद्वान् पुरुष प्राणायामके लिये सन्नद्ध होवे, अन्यथा वह योगकी सिद्धि नहीं कर सकता; क्योंकि जिसका शरीर बाहर और भीतरसे शुद्ध नहीं हुआ है, उसमें वायुका महान् प्रकोप हो जाता है और वायुके प्रकोपसे शरीरमें कोढ़ हो जाती है। इतना ही नहीं, वह जड़ता आदिका भी उपभोग करता है (लकवा आदि मार जानेसे उसका शरीर जड़ हो जाता है), इसलिये बुद्धिमान् पुरुष शरीरको शुद्ध करके ही दूसरे साधनके लिये प्रयोग करे। पाण्डुनन्दन! अब मैं प्राणायामका लक्षण बतलाता हूँ, सुनो।
१- पातंजलयोगदर्शनके अनुसार योगके आठ अंगोंमें आसनकी भी गणना की गयी है, ध्येय तो साध्य है। अतः साधनका अंग नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ साध्यको अष्टांगोंमें नहीं लिया गया है। यम-नियम आदि अन्य सात साधन उसमें भी वे ही हैं, जो यहाँ स्कन्दपुराणमें दिये गये हैं।
२- योगदर्शनमें शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान—ये पाँच नियम कहे गये हैं। यहाँ भी तीन तो वैसे ही हैं। स्वाध्यायके स्थानमें यहाँ जप लिया गया है। परन्तु जपके लक्षणमें स्वाध्यायको ग्रहण करके दोनोंकी एकता मान ली गयी है। शिवकी भक्ति ही यहाँ गुरुभक्ति है, अतः यह भी ईश्वर-प्रणिधानसे भिन्न नहीं है।
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प्राण और अपान वायुका निरोध 'प्राणायाम' कहलाता है। विद्वान् पुरुषोंने उसे तीन प्रकारका बतलाया है— लघु, मध्यम और उत्तरीय (उत्तम)। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। आँखको बंद करने और खोलनेमें जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। लघुसे दूना अर्थात् चौबीस मात्रावाला मध्यम प्राणायाम बताया गया है। त्रिगुण अर्थात् छत्तीस मात्राका उत्तम प्राणायाम माना गया है। प्रथम अर्थात् लघु प्राणायामसे स्वेद (पसीने)-को जीते, मध्यमसे कम्पको तथा तृतीय (उत्तम) प्राणायामसे विषादको जीते। इस प्रकार क्रमशः इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। किसी सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक विराजमान हो पद्मासन* लगाकर रेचक, पूरक और कुम्भक भेदसे त्रिविध प्राणायामका अभ्यास करे। प्राणोंका उपरोध (संयम) करनेसे उस साधनका नाम 'प्राणायाम' है। जैसे आगमें धौंकनेपर पर्वतीय धातुओंकी मैल जल जाती है, उसी प्रकार प्राणायामसे इन्द्रियजनित सम्पूर्ण दोष दग्ध हो जाते हैं। सौ कपिला गायोंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही प्राणायामसे भी मिल जाता है। इसलिये योगज्ञ पुरुष सदैव प्राणायाम करे। प्राणायामसे शान्ति आदि दिव्य गुण सिद्ध होते हैं। शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद— ये क्रमशः प्रकट होनेवाले दिव्य गुण हैं। स्वाभाविक और आगन्तुक पापोंकी निवृत्ति तथा उनकी वासनाओंका शमन यह 'शान्ति' नामक प्रथम गुण है। मन और बुद्धिके द्वारा लोभ और मोहरूपी दोषोंका पूर्णतया निराकरण करके जो शान्तिकी प्राप्ति होती है, उसीको इस लोकमें 'प्रशान्ति' कहते हैं। भूत, भविष्य, दूरस्थ तथा अदृश्य पदार्थोंका यहाँ भलीभाँति ज्ञान होना ही 'दीप्ति' है। सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी प्रसन्नता तथा बुद्धि और प्राणोंकी भी निर्मलताको 'प्रसाद' कहा गया है। इस प्रकार ये चार फल प्राणायामके द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं। ऐसे फलवाले प्राणायामका योगी पुरुष सदैव अभ्यास करे। जैसे सदा सेवन करनेपर सिंह, व्याघ्र और हाथी भी मृदुता (कोमलता एवं नम्रता)-को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार प्राणायामद्वारा साधित (संयममें लाया हुआ) प्राण भी वशमें हो जाता है। यह प्राणायाम बताया गया। अब प्रत्याहारका वर्णन सुनो। विषय-सेवनमें लगे हुए चित्तको विषयोंकी ओरसे लौटानेका जो प्रयत्न है, उसे 'प्रत्याहार' बताया गया है। चित्तको संयममें रखना ही प्रत्याहारका मुख्य लक्षण है। इस प्रकार प्रत्याहार बताया गया। अब धारणाका लक्षण सुनो। जैसे जल पीनेकी अभिलाषा रखनेवाले लोग पत्र और नाल आदिके द्वारा धीरे-धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष धारणाद्वारा साधित वायुका धीरे-धीरे पान करता है। गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, तालु तथा भ्रूमध्यभाग (ललाट)-में क्रमशः चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल, षोडशदल तथा द्विदल कमलका चिन्तन करके उन सबमें प्राणवायुकी धारणा करे और धीरे-धीरे एक स्थानसे समेटकर दूसरे स्थानमें ऊपर उठाते हुए उस प्राणको मस्तकके भीतर ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित कर दे। गुदा आदि छः अंग और चतुर्दल आदि छः चक्र— इन बारह स्थानोंमें प्राणवायुकी धारणा तथा संकोच करनेसे सब मिलकर बारह प्राणायाम
* पद्मासन लगानेकी विधि यह है—दायीं जाँघपर बायाँ चरण रखे और बायीं जाँघपर दायाँ चरण रखे। फिर बायें हाथको पीठकी ओरसे ले जाकर दायें चरणका अंगूठा दृढ़ताके साथ पकड़ ले। इसी प्रकार दायें हाथको पीछेकी ओरसे ले जाकर बायें चरणका अंगूठा पकड़ ले। फिर गर्दन झुकाकर अपनी ठोढ़ीको छातीमें सटा ले और नेत्रोंसे केवल नासिकाके अग्रभागको ही देखे। यह योगाभ्यासी पुरुषोंके उपयोगमें आनेवाला पद्मासन कहलाता है, यह रोगोंका नाश करनेवाला है।
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होते हैं। इसीको 'धारणा' कहा गया है। इन धारणाओंको सिद्ध कर लेनेपर योगी पुरुष अक्षर ब्रह्मकी समताको प्राप्त हो जाता है। धारणामें स्थित हुए पुरुषके ये जो ध्येयतत्त्व हैं, उसका लक्षण सुनो। अर्जुन ! ध्येयतत्त्व बहुत प्रकारका है, उनका कहीं अन्त नहीं मिलता। कोई शिवका, कोई विष्णुका, कोई सूर्य और ब्रह्माका तथा कोई महादेवीका ध्यान करते हैं। जो जिसका ध्यान करता है, वह उसीमें लीन होता है, इसलिये सदा कल्याण करनेवाले पंचमुख भगवान् शंकरका ध्यान करना चाहिये। भगवान् शिव वृषभकी पीठपर पद्मासनसे विराजमान हैं, उनकी अंगकान्ति गौर है, उनके दस हाथ हैं और मुखपर अत्यन्त प्रसन्नता छा रही है तथा वे ध्यानमग्न हो रहे हैं। इस प्रकार तुम्हारे लिये 'ध्येय' का स्वरूप बताया गया। इसका सदा ध्यान करना चाहिये। 'ध्यान' का लक्षण इस प्रकार है। धारणामें स्थित हुआ साधक आधे पलके लिये भी अपने ध्येय (इष्टदेव)-से भिन्न वस्तुका चिन्तन न करे। इस प्रकार इस दुर्गम भूमिकामें स्थित होकर योगवेत्ता पुरुष कुछ भी चिन्तन न करे—यही 'समाधि' कहलाती है। समाधिका ठीक-ठीक लक्षण बता रहा हूँ, सुनो। जो शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा रूपसे सर्वथा रहित है, उस परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हुआ योगी 'समाधिस्थ' कहा गया है। समाधिमें स्थित हुआ मनुष्य कभी विघ्नोंसे अभिभूत नहीं होता। भारी-से-भारी दुःख क्यों न आ जाय, वह उससे भी विचलित नहीं होता। उसके कानोंके पास यदि सैकड़ों शंख फूँके जायँ और बहुत-से नगाड़े पीटे जायँ तो भी वह बाहरके शब्दको नहीं सुनता। कोड़ोंके प्रहारसे उसे घायल कर दिया जाय, आगसे उसका शरीर जल जाय तथा सर्दीसे भरे हुए भयंकर स्थानमें उसे बैठा दिया जाय, तो भी वह बाहरके स्पर्शका अनुभव नहीं करता। फिर वैसे पुरुषके लिये बाहरी रूप, गन्ध और रसके विषयमें तो कहना ही क्या है? जो इस प्रकार आत्माका साक्षात्कार करके पुनः समाधिको प्राप्त करता है, उसे भूख और प्यास कभी बाधा नहीं पहुँचा सकती। निश्चल समाधिको पाकर मनुष्य जिस सुखका अनुभव करता है, वह न तो स्वर्गलोकमें है और न पातालमें ही है; फिर मनुष्यलोकमें तो वह हो ही कहाँ सकता है।
कुरुनन्दन! इस प्रकार योगमार्गमें आरूढ़ हुए पुरुषके लिये भी पाँच उपसर्ग प्राप्त होते हैं, जो बड़े ही कटु हैं—उनका परिचय सुनो। प्रातिभ, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये ही पाँच उपसर्ग हैं। सम्पूर्ण शास्त्रोंकी प्रतिभा (ज्ञान)का हो जाना ही 'प्रातिभ' उपसर्ग है। यह है तो सात्त्विक परंतु इसके कारण जिसके हृदयमें अहंकार आ जाता है, इससे वह योगी अपनी स्थितिसे नीचे गिर जाता है। हजारों योजन दूरसे भी शब्दको सुन लेना 'श्रावण' नामक उपसर्ग है। यह दूसरा विघ्न है। यह भी सात्त्विक ही है परंतु इसके कारण भी जो गर्व करता है, वह नष्ट हो जाता है (साधनासे गिर जाता है)। जिससे देवताओंकी आठ योनियोंको देखता है, उस शक्तिका प्राप्त होना 'दैव' उपसर्ग है। यह भी सात्त्विक दोष है, इससे भी घमण्ड होनेपर साधकका विनाश होता है। जैसे जलके भँवरमें डूबा हुआ मनुष्य व्याकुल होता है, उसी प्रकार सहसा प्रकट हुए विविध विज्ञानके आवर्तमें जो चित्तकी व्याकुलता होती है, उसका नाम 'आवर्त' है। यह राजस दोष है, जो बड़ा भयंकर है। जब योगीका मन अनेक प्रकारके दोषोंसे आक्रान्त हो समस्त आधारोंसे भ्रष्ट होनेके कारण अवलम्बशून्य होकर भटकने लगता है तब उसे 'भ्रम' नामक दोष बताया जाता है। यह तामस दोष है। इन
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अत्यन्त घोर उपद्रवोंसे योगका नाश हो जानेके कारण सम्पूर्ण देवयोनियाँ बार-बार आवर्तन करती (आवागमनमें पड़ी रहती) हैं।
इसलिये योगी मनोमय* श्वेत कंबलका आवरण डालकर परब्रह्म परमात्मामें चित्तको स्थिर करके निरन्तर उन्हींका चिन्तन करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले योगीको सदा सात्त्विक आहारका सेवन करना चाहिये। राजस और तामस आहारोंसे योगीको कभी सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती। स्वधर्मपालनमें लगे हुए श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय महात्माओंके यहाँ योगीको भिक्षा माँगनी चाहिये। भिक्षामें मिले हुए यवान्न, मट्ठा, दूध, जौकी लपसी, पका हुआ फल-मूल अथवा कन, तिलकी खली या सत्तू—ये सब पवित्र आहार हैं, जो योगियोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
योगका साधक विभिन्न लक्षणोंसे अपनी मृत्युका समय जानकर कालको वंचित करनेके लिये एकाग्रचित्त हो योगतत्पर हो जाय। अब मैं उन निमित्तों (लक्षणों)-को बतलाता हूँ, जिनसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। लाल चमड़ा अथवा लाल वस्त्र धारण किये हुए हँसती-गाती हुई कोई स्त्री स्वप्नमें जिस पुरुषको दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें किसी नंगे संन्यासीको हँसते और उछलते-कूदते देखकर यह समझ लेना चाहिये कि उसके रूपमें अपनी मृत्यु आ गयी है। जो स्वप्नमें रीछ और वानरसे जुते हुए रथपर बैठकर गाता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर जाता है अथवा कीचड़ या गोबरमें डूबता है, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें बिना जलकी नदीको केश, अंगार, भस्म अथवा सर्पोंसे किसी एकके द्वारा भरी हुई देखकर मनुष्य जीवित नहीं रहता। यदि विकराल, भयंकर तथा क्रूर स्वभाववाले मनुष्य हाथमें हथियार लिये स्वप्नमें पत्थरोंसे मारें तो मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त हो जाता है। सूर्योदयकालमें रोती हुई गीदड़ी जिसके सामने होकर दाहिने अथवा बायें चली जाती है, वह भी शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो दीपके बुझनेकी गन्धको नहीं जानता, रातमें रक्तवमन करता है तथा दूसरेके नेत्रमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता, वह जीवित नहीं रहता। आधी रातमें इन्द्रधनुष और दिनमें तारागणोंको देखकर शास्त्रविश्वासी पुरुष यह मान ले कि उसकी आयु क्षीण हो गयी है। जिसकी नाक टेढ़ी हो जाय, कानोंमें नीचाई-ऊँचाई आ जाय तथा बायीं आँख सदा बहती रहे; उसकी आयु समाप्त हो गयी है। जब मुँह कुछ-कुछ लाल हो जाय और जीभ काली पड़ जाय, तब विद्वान् पुरुषको यह समझ लेना चाहिये कि अपनी मृत्यु समीप आ गयी है। जो स्वप्नमें ऊँट और गदहेकी सवारीसे दक्षिण दिशाकी ओर जाता है तथा जो अपने दोनों कान बंद करके आवाज नहीं सुन पाता; वह जीवित नहीं रहता है। स्वप्नमें जो गड्ढेमें गिर जाय और उसके निकलनेका दरवाजा बंद कर दिया जाय, जिससे वह फिर उठ न सके; जिसकी स्वच्छ दृष्टि भी लाल हो जाय, जो स्वप्नमें अग्निप्रवेश करके फिर वहाँसे न निकले, इसी तरह जलमें प्रवेश करके वहाँसे न निकले, तो वही उसके जीवनका अन्तिम काल है। जो रात या दिनमें दुष्ट भूतोंद्वारा मारा जाता है तथा जिसकी प्रकृतिमें कोई विकार आ गया है, उसके निकट ही यमराज और काल मौजूद हैं। जो भक्त होकर भी देवता, गुरु, पिता-माता तथा ज्ञानी पुरुषोंकी निन्दा और अवहेलना करता है, वह जीवित नहीं रहता है।
* मनसे यह भावना करे कि मेरे सब ओर श्वेत कंबलका आवरण पड़ा है, मैं अकेला हूँ, जगत्की कोई विघ्न-बाधा मेरे पासतक नहीं पहुँच सकती।
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योगवेत्ता पुरुष इस प्रकार मृत्युसूचक विपरीत लक्षणोंको देखकर उत्तम धारणाका आश्रय ले समाधिमें स्थिर हो जाय। यदि वह उस मृत्युको नहीं चाहता तो उसे वह नहीं प्राप्त होती अथवा यदि मुक्तिकी इच्छा हो तो उस मृत्युको ब्रह्मरन्ध्रमें छोड़ दे। इस प्रकार विमुक्त हुए शरीरमें भी जो उपसर्ग योगीको प्राप्त होते हैं, उनके नाम सुनो। ईशान, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, इन्द्र, चन्द्र, प्रजापति तथा ब्रह्मा—इनसे सम्बन्ध रखनेवाली आठ लोकोंमें क्रमशः आठ सिद्धियाँ होती हैं, जो इस प्रकार हैं—पार्थिवी, जलमयी, तैजसी, वायुसम्बन्धिनी, आकाशसम्बन्धिनी, मानसी, अहंकारोद्भवा तथा बुद्धिजा। इनमें प्रत्येकके आठ-आठ भेद हैं और ये उत्तरोत्तर लोकोंमें क्रमशः द्विगुण-त्रिगुण आदिके क्रमसे स्थित हैं। पूर्व अर्थात् ईशानलोकमें आठ सिद्धियाँ हैं और अन्तिम अर्थात् ब्रह्मलोकमें इनकी संख्या चौंसठ हो जाती है। ऐसा किस प्रकार होता है, सो सुनो। मोटा होना, पतला होना, बालक बन जाना, बूढ़ा होना, जवान हो जाना, भिन्न-भिन्न जातिके जीवोंके रूपमें अपनेको प्रकट करना, एक ही जातिमें भी अनेक रूप ग्रहण करना तथा पार्थिव अंशके बिना ही केवल चार तत्त्वोंसे शरीरको धारण करना—ये आठ पार्थिवी सिद्धियाँ हैं, जो ईशानलोकमें पृथ्वीतत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके बाद प्रकट होती हैं।
जलतत्त्वपर विजय होनेके पश्चात् मनुष्य पृथ्वीकी ही भाँति जलमें निवास करता है। बिना किसी घबराहटके समुद्रको पी सकता है, उसे सर्वत्र जलकी प्राप्ति होती है, वह सूखे फलको भी हरा और रसीला कर सकता है। पृथ्वी और जलको छोड़कर केवल तीन भूतोंसे शरीर धारण करता है। नदियोंको हाथमें रख सकता है, उसके शरीरमें कोई घाव नहीं होता तथा उसकी बड़ी सुन्दर कान्ति होती है। इस प्रकार ये आठ नूतन और आठ पहलेकी, कुल सोलह सिद्धियाँ राक्षसलोकमें मानी गयी हैं।
अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जानेपर देहसे अग्नि प्रकट करना, अग्निके तापका भय दूर हो जाना, समस्त लोकोंको भस्म कर डालनेकी शक्तिका होना, पानीमें आग लगा देना, हाथसे आगको उठा लेना, स्मरणमात्रसे किसीको पवित्र कर देना, आगसे जलकर भस्म हुए पदार्थका पुनः निर्माण कर देना तथा केवल दो महाभूत वायु और आकाशके आधारपर शरीरको धारण करना—ये आठ तैजस सिद्धियाँ और पहलेकी सोलह सब मिलकर चौबीस सिद्धियाँ यक्षलोकमें प्रकट होती हैं।
मनके समान गमनशक्तिका होना, प्राणियोंके भीतर प्रवेश करना, पर्वत आदि बड़ी भारी वस्तुओंका भार लीलापूर्वक ढोना, हलका होना, भारी हो जाना, दोनों हाथोंसे वायुको पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागके धक्केसे समूची पृथ्वीको हिला देना तथा एकमात्र आकाशतत्त्वसे ही शरीरको धारण करना—ये वायुसम्बन्धिनी शक्तियाँ गन्धर्वलोकमें हैं। पहलेकी चौबीस और आठ नूतन कुल मिलाकर बत्तीस सिद्धियाँ गन्धर्वलोकमें हैं।
अपनी छायाको मिटा देना, इन्द्रियोंका दर्शन न होना, सदा आकाशमें चलना, इन्द्रिय और मन आदिका स्वयं शान्त रहना, दूरके शब्दको सुन लेना, सब प्राणियोंके शब्दको समझ लेना, तन्मात्राओंके चिह्नको ग्रहण कर लेना तथा समस्त प्राणियोंको देखना—ये आठ आकाशतत्त्वको जीतनेसे प्राप्त होनेवाली तथा पहलेकी बत्तीस कुल चालीस सिद्धियाँ इन्द्रलोकमें हैं।
इच्छाके अनुरूप वस्तुओंका प्राप्त होना, जहाँ इच्छा हो वहीं निकल जाना, सब प्रकारकी शक्तियोंका होना, समस्त गोपनीय वस्तुओंको देखना तथा समस्त संसारकी घटनाओंको देखना आदि आठ सिद्धियाँ मानसी हैं—ये तथा पहलेकी चालीस कुल अड़तालीस सिद्धियाँ चन्द्रलोकमें मानी गयी हैं।
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१५
काटना, तपाना, छेदना, संसारको बदल डालना, समस्त प्राणियोंको प्रसन्न कर देना तथा मृत्युकालपर विजय पाना आदि आठ अहंकारोद्भवा तथा पहलेकी अड़तालीस, कुल छप्पन सिद्धियाँ प्राजापत्यलोकमें हैं।
संकेतमात्रसे ही संसारकी सृष्टि कर देना, सबपर अनुग्रह करना, प्रलयका अधिकार प्राप्त कर लेना, अन्य लोगोंके चित्तमें प्रवेश करके उसे प्रेरित करना, जिसकी कहीं समता नहीं ऐसी वस्तु प्रकट कर देना, चित्रलिखित वस्तुको प्रत्यक्ष प्रकट कर देना, अशुभको शान्त कर देना तथा कर्तृत्वशक्तिसे सम्पन्न होना—ये आठ बुद्धिजनित सिद्धियाँ तथा पहलेकी छप्पन मिलाकर कुल चौसठ सिद्धियाँ ब्रह्मलोकमें विद्यमान हैं।
यह गोपनीय रहस्य मैंने तुमसे प्रकट किया है। ये सब सिद्धियाँ जीते-जी अथवा देह-भेद होनेपर योगीको प्राप्त होती हैं। परंतु इनके द्वारा सदैव पतनका भय बना रहता है। इसलिये योगीको इन सिद्धियोंके प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिये। इन सब सिद्धिजनक गुणोंका निवारण करके सदा योगसाधनामें लगे रहनेवाले योगीको ऐसी आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, जो योगमें भलीभाँति सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता। ये आठ सिद्धियाँ माहेश्वरपदमें स्थिति सूचित करती हैं। सूक्ष्म-से-सूक्ष्म हो जाना 'अणिमा' शक्ति है। अत्यन्त शीघ्रतासे कोई काम करना 'लघिमा' है। समस्त लोकसे पूजनीय पदकी प्राप्ति होनेसे 'महिमा' मानी गयी है। 'प्राप्ति' नामक सिद्धि वह है, जब कि योगीके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता है। सर्वत्र व्यापक होनेके कारण उसमें 'प्राकाम्य' नामक सिद्धिका उदय माना जाता है। सिद्ध योगी जिससे ईश्वरतुल्य हो जाता है, वह 'ईशित्व' नामक सिद्धि है। सबको वशमें करनेके कारण उसमें 'वशिता' नामक उत्तम सिद्धि मानी गयी है। जहाँ इच्छा हो वहीं पहुँच जाना 'कामावसायिता' नामक सिद्धि है। ये समस्त सिद्धियाँ ईश्वरपदको प्राप्त हुए योगीमें प्रकट होती हैं। इसलिये वह न तो जन्म लेता है, न बढ़ता है और न मृत्युको ही प्राप्त होता है। ऐसा योगी मुक्त कहा गया है। जो इस प्रकार मुक्ति पाता है, उसका आत्मा परमात्माके साथ उसी प्रकार एक हो जाता है, जैसे जलमें डाला हुआ जल परस्पर एकताको प्राप्त हो जाता है। योगका ऐसा फल जानकर योगी पुरुष सदा योगका अभ्यास करे। निर्मल योगीजन यहाँ योगसिद्धिके लिये कुछ उपमाएँ दिया करते हैं। जैसे सूर्यकान्तमणि चन्द्रमाकी किरणोंके संयोगसे अथवा चन्द्रकान्तमणिके सम्पर्कसे अग्नि प्रकट नहीं करता अपितु अकेला होनेपर ही सजातीय सूर्यकिरणके संयोगसे वह आग प्रज्वलित करता है, उसी प्रकार योगीकी भी उपमा है। योगी भी तभी सिद्धि लाभ करता है, जब वह प्रतिबन्धकोंसे दूर रहकर अनुकूल साधन-सामग्रीके साथ अकेला रहकर साधनमें संलग्न होता है। जैसे चिड़िया, चूहा और नेवला घरमें स्वामीकी भाँति निवास करते हैं और घर गिर जानेपर अन्यत्र चले जाते हैं, किंतु उनके मनको इसके लिये दुःख नहीं होता। यही उपमा योगीके लिये भी है। उसको भी देह-गेहमें ममता नहीं रखनी चाहिये। जैसे चींटी या दीमक अपने बहुत छोटे मुखाग्रसे थोड़ी-थोड़ी मिट्टी जमा करके मिट्टीका ढेर लगा देते हैं, यही उपदेश योगीके लिये भी है। योगी निरन्तर थोड़ी-थोड़ी साधनशक्तिका संचय करते हुए एक दिन महती योगशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। पत्र, पुष्प और फलसे भरे हुए वृक्षको पशु, पक्षी और मनुष्य आदि नष्ट
२१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कर देते हैं। इस रहस्यको समझकर योगी पुरुष सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सारांश यह कि यदि योगी भी सिद्धिका चमत्कार प्रकट करने लगे तो संसारके लोग उसे अपनी साधनासे भ्रष्ट कर देंगे। अतः उसे गुप्त रहकर ही साधना करनी चाहिये। हिरनके बच्चेके सिरपर जब पहले सींग उगते हैं तो वे तिलकके समान दिखायी देते हैं और धीरे-धीरे बढ़कर बहुत बड़े हो जाते हैं। इस बातको लक्ष्य करके योगी उस हिरनके सींगके साथ-साथ यदि बढ़ने लगे (धीरे-धीरे अपनी साधना बढ़ाता रहे) तो वह सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। मनुष्य जल या तेल आदि द्रव पदार्थोंसे भरे हुए पात्रको लेकर पृथ्वीसे बहुत ऊँचे मार्गपर चढ़ जाता है, यह देखकर भी क्या योगी पुरुषोंको अपने कर्तव्यका ज्ञान नहीं होता? उसको भी चाहिये कि वह अत्यन्त सावधान होकर योगके उच्च शिखरपर आरोहण करे।
वही घर है, जहाँ निवास हो; वही भोजन है, जिससे जीवनकी रक्षा हो। जिससे प्रयोजन सिद्ध हो और जो स्वयं ही योगसिद्धिमें सहायक हो, वैसे ही ज्ञानकी योगी उपासना करे। वही उसके लिये कार्यसाधक हो सकता है। नाना प्रकारके ज्ञानका जो अधिक संग्रह है, वह योगकी साधनामें विघ्नकारक ही होता है। जो 'यह जानने योग्य है, यह जानने योग्य है' ऐसा सोचते हुए बहुविध ज्ञानके लिये प्यासा फिरता है, वह एक हजार कल्पोंमें भी ज्ञेय वस्तुको नहीं प्राप्त कर सकता। आसक्ति छोड़कर, क्रोधको जीतकर परिमित आहारका सेवन करते हुए जितेन्द्रिय होवे और बुद्धिके द्वारा इन्द्रियद्वारोंको बंद करके मनको ध्यानमें लगावे। सात्त्विक आहारका सेवन करे; ऐसे आहारका नहीं, जिससे उसका चित्त काबूके बाहर हो जाय। चित्तको बिगाड़नेवाले आहारका सेवन करनेवाला मनुष्य रौरव नरकका प्रिय अतिथि होता है। वाणी दण्ड है, कर्म दण्ड है और मन दण्ड है। ये तीनों दण्ड जिसके अधीन हैं; वह 'त्रिदण्डी' यति माना गया है। जब सामने आया हुआ मनुष्य अनुरक्त हो जाय, परोक्षमें गुणोंका कीर्तन होने लगे और कोई भी जीव उससे भयभीत न हो; तब यह सब योगीके लिये सिद्धिसूचक लक्षण बताया जाता है। लोलुपताका न होना, निरोग रहना, निष्ठुरताका अभाव होना, सुन्दर गन्ध प्रकट होना, मल और मूत्रका कम हो जाना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता तथा वाणीमें कोमलता—ये योगसिद्धिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मचिन्तन-परायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय है; वह महामना योगी इस योगमें सिद्धि प्राप्त करता है और उस योगके प्रभावसे मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जिसका चित्त मोक्षमार्गमें आकर परब्रह्म परमात्मामें संलग्न हो सुखके अपार सिन्धुमें निमग्न हो गया है, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी माता कृतार्थ हो गयी, तथा उसे पाकर यह सारी पृथ्वी भी सौभाग्यवती हो गयी।* जिसकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध है, जो मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें समान भाव रखता है, समस्त प्राणियोंमें सम भावसे निवास करता है; वह यत्नशील साधक अपनी साधना पूर्ण करके उस सर्वोत्कृष्ट सनातन एवं अविनाशी पदको प्राप्त होता है, जहाँ पहुँच जानेपर कोई भी मनुष्य पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता।
अर्जुन! यह योगका रहस्य मैंने तुमसे बतलाया है। गौतमने ऐसे ही योगको प्राप्त किया और उन्होंने ही इस गौतमेश्वरलिंगको स्थापित
* कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा भाग्यवती च तेन। विमुक्तिमार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ५२। ३८)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१७
किया है, जो कि दर्शन करनेवाले मनुष्यके समस्त कलिकलुषका विनाश करनेवाला है। जो पुरुष आश्विनमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें महान् उपहार समर्पित करके इस लिंगका पूजन करता है, वह पापरहित हो उसी लोकमें जाता है, जहाँ इस समय महामुनि गौतम विराजमान हैं। कुन्तीनन्दन! इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य मैंने तुम्हें संक्षेपसे बताया है। जो यह सब सुनता है वह शुद्धचित्त हो जाता है। अब और क्या कहूँ?
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महीसागरसंगमकी श्रेष्ठता तथा उसके गुप्त-क्षेत्र होनेका कारण
अर्जुनने पूछा— नारदजी! इस तीर्थको गुप्तक्षेत्र क्यों कहते हैं? जिसका इतना महान् प्रभाव सुना गया है, वह गुप्त कैसे हुआ?
नारदजी बोले— अर्जुन! इस क्षेत्रके गुप्त होनेका जो कारण है उसके विषयमें एक बहुत प्राचीन कथा है, उसको श्रवण करो। यह क्षेत्र पूर्वकालमें शापवश गुप्त हो गया था। एक समय किसी निमित्तसे सब तीर्थोंके अधिदेवता एकत्र हो ब्रह्माजीको प्रणाम करनेके लिये उनकी सभामें गये। सब तीर्थोंको आया हुआ देखकर ब्रह्माजी अपने समस्त सभासदोंके साथ उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र आश्चर्यसे खिले हुए थे। भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर सब तीर्थोंको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'तीर्थवरो! आज आप सब लोगोंके पदार्पणसे पवित्र होकर हमारा स्थान सफल हो गया। हम सब देवता भी आपके दर्शनसे बहुत पवित्र हो गये। तीर्थोंका दर्शन, स्पर्श तथा स्नान सब परम कल्याणकारक है। बड़े-बड़े पापोंसे भरे हुए जो भयंकर एवं अत्यन्त निर्दय मनुष्य हैं, वे भी तीर्थमें पवित्र हो जाते हैं; फिर जो धर्मपरायण हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है?' यों कहकर ब्रह्माजीने अपने पुत्र पुलस्त्यको आज्ञा दी—'बेटा! तुम तीर्थोंके लिये शीघ्र ही अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजन करूँ। जब अर्घ्य देने योग्य असंख्य पुरुष एकत्र हो जायँ, तब पूजनकालमें उन सबमेंसे श्रेष्ठ एक पुरुषको एक अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।'
पिताकी यह आज्ञा पाकर पुलस्त्यजी बड़े वेगसे एक उत्तम अर्घ्यपात्र सजाकर ले आये। ब्रह्माजीने उसे हाथमें लेकर सब तीर्थोंसे कहा—'आप सब लोग मिलकर किसी एक मुख्य तीर्थका नाम बतलावें, मैं उसीको अर्घ्य देना चाहता हूँ। ऐसा करनेसे मुझे अन्यायरूपी दोष नहीं लगेगा।'
तीर्थ बोले— प्रभो! हम किसी प्रकार भी आपसमें श्रेष्ठताका निर्णय नहीं कर पाते। इसीलिये आपके पास आये हैं। आप ही हममेंसे जो श्रेष्ठ हो उसको समझकर अर्घ्य दे दीजिये।
ब्रह्माजी बोले— मैं आपलोगोंमेंसे किसी एककी श्रेष्ठताको नहीं समझ पाता। आपलोगोंको नमस्कार है। आप सभी अपार महिमासे सम्पन्न हैं। अतः स्वयं ही अपनेमेंसे श्रेष्ठ पुरुषको बतलावें।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर जब उनमेंसे कोई भी बहुत देरतक कुछ न बोला, तब महीसागरसंगम तीर्थने कहा—'चतुरानन! आप शीघ्र मुझे यह अर्घ्य प्रदान करें; क्योंकि दूसरा कोई भी तीर्थ मेरी करोड़वीं कलाके सामने भी पूरा नहीं पड़ता। पूर्वकालमें महाराज इन्द्रद्युम्नकी तपस्यासे तपकर यह सर्वतीर्थमयी समूची पृथ्वी ही मही नामवाली नदी हो गयी। वह सब तीर्थोंसहित मुझसे आकर मिली है, इसलिये मैं तीनों लोकोंमें सर्वतीर्थमय होकर प्रसिद्ध हूँ।'
तीर्थराज महीसागरसंगमके ऐसा कहनेपर अन्य सब तीर्थ मौन रहे। देखें ब्रह्माजी हमारे विषयमें क्या कहते हैं, यह सोचकर कोई कुछ न बोले।
२१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तब ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र धर्मने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर इस प्रकार कहा—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, इस तीर्थराज महीसागरसंगमने मोहवश बड़ी कुत्सित बात कह डाली है। साधु पुरुषोंको उचित है कि वे अपनेमें अच्छे गुण होते हुए भी उनका अपने ही मुखसे बखान न करें। जो भरी सभामें दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपने गुणोंका वर्णन करता है, वह रजोगुणी, अहंकारी तथा निन्दित है। इसलिये यह तीर्थ इन सब गुणोंके रहते हुए भी अपने अहंकारके कारण विख्यात न होगा। इसका स्वरूप विध्वस्त-सा हो जायगा।'
धर्मदेवके ऐसा कहनेपर सब ओर हाहाकारका शब्द गूँज उठा। तब योगीश्वर स्कन्दजी तथा मैं दोनों शीघ्रतापूर्वक वहाँ जा पहुँचे। कार्तिकेयने उस देवसमाजमें धर्मसे इस प्रकार कहा—'धर्म! तुमने धृष्टताके कारण जो यह शाप दे डाला है, वह अनुचित ही हुआ है। कोई भी बतावे तो सही कि तीनों लोकोंमें विद्यमान समस्त तीर्थोंमेंसे कौन-सा ऐसा तीर्थ है, जिससे यह महीसागरसंगम अर्घ्य पानेका अधिकारी नहीं है? इस तीर्थराजने अपने जिस गुणका वर्णन किया है, वह सब इसमें मौजूद है। ऐसी दशामें कौन-सी बुराई हो गयी? क्योंकि अवगुण तो झूठ बोलनेमें है, सत्य कहनेमें नहीं! अहो! जो सबका पालन करनेवाले हैं, उनके द्वारा ऐसा बर्ताव होना कदापि उचित नहीं है। यदि वे भी विचार न करके ऐसे कार्य करेंगे तब प्रजा किसकी शरणमें जायगी।'
स्कन्द स्वामीके ऐसा कहनेपर धर्मने इस प्रकार उत्तर दिया—'आपका यह कहना ठीक है कि यह महीसागरसंगम सब तीर्थोंमें प्रधान होने और ब्रह्माजीसे अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य है, किंतु साधु पुरुषोंका यह सनातन नियम है कि अपने ही मुँहसे अपने गुणोंका बखान नहीं करना चाहिये। दूसरोंका किया हुआ आक्षेप और अपनी प्रशंसा—ये दो दोष ब्रह्माजीको भी अपने पदसे विचलित कर सकते हैं। दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपनी प्रशंसा करनेवाले राजा ययाति क्या स्वर्गसे नीचे नहीं गिर गये थे? बुद्धिमान् ईश्वरने पूर्वकालमें जो-जो बातें प्रमाणित कर दी हैं, उन सबका भलीभाँति पालन करना चाहिये। कौन विद्वान् उनका उल्लंघन कर सकता है? कार्तिकेयजी! आपके पिताने आदेश देकर जिस कार्यके लिये हमें नियुक्त किया है, हम सदा उसीका पालन करते हैं। आपको भी उसका पालन करना चाहिये।'
यों कहकर धर्म जब अपनी मुद्रा त्याग देनेको तैयार हो गये, तब मैंने उस प्रस्तावपर विचार करके यह बात कही—'विश्वको धारण करनेवाले परम महान् महात्मा धर्मको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी प्रतिदिन पूजा करते हैं, उन पापनाशी धर्मको नमस्कार है। धर्म! यदि कदाचित् आप मुद्रा त्याग देंगे तो हमलोगोंकी सत्ता कैसे रह सकती है? प्रभो! आप इस विश्वका नाश न कीजिये। योगीश्वर कार्तिकेयको आप सम्मान देने योग्य हैं। ये साक्षात् भगवान् शंकरके पुत्र हैं; अतः उन्हींकी भाँति हम सबके लिये
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१९
माननीय हैं। मानद! आपने इस तीर्थराजको विख्यात न होनेका जो शाप दे दिया है, उसका निवारण करनेके लिये अनुग्रह कीजिये।'
मेरे ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा—धर्म! नारदने अच्छी बात कही है, तुम इनकी बात मानो। तब धर्मने कार्तिकेयजीसे कहा—'हमलोग जिसके किंकर हैं, उन परम सिद्ध कार्तिकेयजीको नमस्कार है। स्कन्द! मेरे नाथ! मेरी यह विनय ध्यान देकर सुनिये। स्तम्भ अर्थात् गर्वके कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध होगा तथापि शनिवारकी अमावास्याको महीसागरकी यात्रा करनेसे जो फल मिलेगा, उसपर ध्यान दीजिये—प्रभासकी दस बार, पुष्करकी सात बार और प्रयागकी आठ बार यात्रा करनेसे जो फल होता है वही फल इसकी एक बारकी यात्रासे प्राप्त होगा।'
इस प्रकार वरदान देनेपर कार्तिकेयजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजीने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भ तीर्थको अर्घ्य दिया और उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठता प्रदान की। फिर सब तीर्थों और स्कन्द स्वामीको सम्मान देकर विदा किया। इस तीर्थके गुप्त होनेका यही प्राचीन वृत्तान्त है। इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण तीर्थके महान् फलका वर्णन किया। यह सब आदिसे ही सुनकर पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सूतजी कहते हैं—यह सब सुनकर विस्मयमें पड़े हुए अर्जुनने उस तीर्थकी बड़ी प्रशंसा की और नारद आदिसे विदा लेकर द्वारकाको प्रस्थान किया।
घटोत्कचका विवाह और बर्बरीकका जन्म
शौनकजी बोले—सूतजी! आपने गुप्तक्षेत्रके इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन, अनुपम तथा हर्षवर्धक माहात्म्यका वर्णन किया। यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्धमाताकी कृपासे उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की? यह सब यथार्थरूपसे कहिये।
उग्रश्रवा (सूतजी)-ने कहा—ब्रह्मन्! इस विषयमें मैं श्रीव्यासजीके मुखसे सुनी हुई कथा कहूँगा। पहलेकी बात है, पाण्डवोंने राजा द्रुपदकी पुत्री द्रौपदीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेवसे सुरक्षित होकर रहते थे। एक समय पाण्डव अपनी राजसभामें बैठकर नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे, इतनेहीमें भीमका पुत्र घटोत्कच वहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासनसे उठे और बड़ी प्रसन्नताके साथ सबने घटोत्कचको हृदयसे लगाया। भीमनन्दन घटोत्कचने भी अत्यन्त विनीतभावसे उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उसे अपनी गोदमें बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूँघते हुए सभामें इस प्रकार पूछा—'बेटा! कहाँसे आते हो? इतने दिनोंतक कहाँ विचरते रहे? हिडिम्बाकुमार! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओंका कोई अपराध तो नहीं करते हो? भगवान् श्रीकृष्णमें और हमलोगोंमें तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करनेवाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न?'
धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमारने कहा—महाराज! मेरे मामाके मारे जानेपर मैं उसीके राज्यसिंहासनपर बिठाया गया हूँ और दुष्टोंका दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशलसे हैं, वे इस समय दिव्य तपस्यामें लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है—'बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवोंमें भक्ति रखनेवाले बनो।' माताकी यह बात सुनकर
२२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मैं भक्तियुक्त चित्तसे आपको प्रणाम करनेके लिये ही मेरुगिरिके शिखरसे यहाँ आया हूँ। मेरी इच्छा है कि आपलोग मुझे किसी महान् कार्यमें नियुक्त करें। क्योंकि यही इस जीवनका महान् फल है कि पुत्र सदा अपने पितृवर्गकी आज्ञाका पालन करे। इससे वह पुण्यलोकोंपर विजय पाता है और इस संसारमें भी यशस्वी होता है।
घटोत्कचके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले—'बेटा! तुम्हीं हमारे भक्त और सहायक हो। हिडिम्बाकुमार! निश्चय ही जैसी माता होती है, वैसा ही उसका पुत्र भी होता है। तुम्हारी माता हमलोगोंके प्रति अविचल भक्ति रखनेवाली है, तुम भी ऐसे ही हो। अहो! मेरी प्यारी पतोहू हिडिम्बादेवी बड़ा कठिन कार्य कर रही है, जो कि अपने प्यारे पतिकी सेवाका सुख छोड़कर तपस्यामें ही संलग्न है।
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—पुण्डरीकाक्ष! आप तो जानते ही हैं कि घटोत्कचका जन्म भीमसेनसे हुआ है। यह उत्पन्न होते ही तरुण हो गया था। श्रीकृष्ण! मैं चाहता हूँ, मेरे इस पुत्रको योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप सर्वज्ञ हैं, बताइये, इसके योग्य पत्नी कौन हो सकती है? धर्मराजके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने क्षणभर ध्यान करके उनसे कहा—'राजन्! मैं बतलाता हूँ, घटोत्कचके योग्य एक बड़ी सुन्दरी स्त्री है, जो इस समय प्राग्ज्योतिषपुरमें निवास करती है। अद्भुत पराक्रम करनेवाला जो मुर नामक दैत्य था, उसीकी वह पुत्री है। मुर दैत्य बड़ा भयंकर था और पाशमय दुर्गमें रहता था। वह मेरे हाथसे मारा गया। उसके मारे जानेपर उसकी पुत्री कामकंटकटा मुझसे युद्ध करनेके लिये आयी। वह अत्यन्त पराक्रमी होनेके कारण बड़ी भयानक जान पड़ती थी। तब खड्ग और खेटक धारण करनेवाली उस दैत्य-कन्याके साथ महासमरमें मैंने भी युद्ध आरम्भ किया। मेरे शार्ङ्ग नामक धनुषसे बड़े-बड़े बाण छूटने लगे, परंतु मुरकी पुत्रीने मेरे उन सभी बाणोंको खड्गसे ही काट डाला। तब मैंने उसका वध करनेके लिये अपना सुदर्शन चक्र उठाया। यह देख कामाख्या देवी मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली—'पुरुषोत्तम! आपको इसका वध नहीं करना चाहिये। मैंने स्वयं इसको खड्ग और खेटक प्रदान किये हैं, जो अजेय हैं।'
कामाख्या देवीकी यह बात सुनकर मैंने कहा—शुभे! मैं ही इस युद्धसे निवृत्त होता हूँ, तुम इस कन्याको मना करो। तब कामाख्या देवीने उसे हृदयसे लगाकर कहा—'भद्रे! तुम युद्धसे लौट चलो। ये माधव श्रीकृष्ण युद्धमें दुर्जय हैं। कोई किसी प्रकार भी संग्राममें इन्हें मार नहीं सकता। संसारमें ऐसा कोई वीर न तो हुआ है, न है और न होगा ही, जो इन्हें युद्धमें जीत सके। औरोंकी तो बात ही क्या है, साक्षात् भगवान् शंकर भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। बेटी! ये तुम्हारे भावी श्वशुर हैं; अतः तुम इन्हें प्रणाम करके युद्धसे हट जाओ। यही तुम्हारे लिये उचित होगा। तुम इनके भाई भीमसेनकी पुत्रवधू होओगी। इसलिये अपने श्वशुरके समान पूजनीय जनार्दनका तुम आदर करो। अब पिताके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। इन श्रीकृष्णके हाथसे जो तुम्हारे पिताकी मृत्यु हुई है, वह सर्वथा स्पृहणीय है; क्योंकि इनके हाथसे मरनेपर अब तुम्हारे पिता सब पातकोंसे मुक्त होकर विष्णुधाममें चले गये।' कामाख्याके ऐसा कहनेपर कामकंटकटाने क्रोध त्याग दिया और विनीत अंगोंसे मुझे प्रणाम किया। तब मैंने उसे आशीर्वाद देकर कहा—'बेटी! तुम भगदत्तसे सम्मानित होकर इसी नगरमें निवास करो। यहाँ रहती हुई ही तुम वीर हिडिम्बाकुमारको पतिरूपमें प्राप्त करोगी।' इस प्रकार आश्वासन देकर मैंने कामाख्या देवी तथा मौर्वी (मुरपुत्री)—को विदा किया। फिर वहाँसे
मुर-कन्याको न मारनेके लिये श्रीकृष्णसे कामाख्याका अनुरोध
२२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
द्वारका होता हुआ मैं यहाँ आकर आपसे मिला हूँ। अतः वह मुरदैत्यकी सुन्दरी कन्या ही घटोत्कचके लिये योग्य स्त्री है। मैं श्वशुर हूँ, इसलिये मेरे द्वारा उसके रूपका वर्णन करना उचित न होगा। साधु पुरुषके लिये यह कदापि उचित नहीं है कि वह स्त्रियोंके रूप-सौन्दर्यका वर्णन करे। एक बात और सुन लीजिये। उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जो मुझे किसी प्रश्नपर निरुत्तर करके जीत ले तथा जो मेरे समान ही बलवान् हो, वही मेरा पति होगा। उसकी यह प्रतिज्ञा सुनकर बहुत-से दैत्य तथा राक्षस उसे जीतनेके लिये गये किंतु मौर्वीने उन सबको परास्त करके मार डाला। यदि महापराक्रमी घटोत्कच ऐसी मौर्वीको जीतनेका उत्साह रखता हो तो वह अवश्य ही इसकी पत्नी होगी।'
युधिष्ठिर बोले-प्रभो! उसके सब गुणोंसे क्या लाभ है, जब उसमें यह एक ही महान् अवगुण भरा हुआ है। उस दूधको लेकर क्या किया जायगा जिसमें विष मिला दिया गया हो। अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारे भीमसेनकुमारको केवल साहसके भरोसे कैसे इस संकटमें डाल दें? यह बेचारा तो शुद्ध वाक्य भी बोलना नहीं जानता। जनार्दन ! देश-देशमें और भी तो बहुत-सी स्त्रियाँ हैं, उन्हींमेंसे किसी उत्तम स्त्रीको बतलाइये।
भीमसेन बोले- भगवान् श्रीकृष्णने जो बात कही है, वह अनेक प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली, सत्य और उत्तम है। मेरा विश्वास है, घटोत्कच शीघ्र ही मौर्वीको प्राप्त करेगा।
अर्जुन बोले- कामाख्या देवीने मौर्वीसे कहा है, 'भद्रे ! भीमसेनका पुत्र तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा।' इस कारण मेरी राय यही है कि घटोत्कच शीघ्र वहाँ जाय।
श्रीभगवान् बोले- अर्जुन ! मुझको तुम्हारी और भीमकी बात पसंद है। हिडिम्बाकुमार ! बोलो तुम्हारी क्या राय है?
घटोत्कचने कहा-पूजनीय पुरुषोंके आगे अपने गुणोंका वर्णन करना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणें और उत्तम गुण व्यवहारमें आकर ही प्रकाशित होते हैं। मैं सर्वथा ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे मेरे निर्मल पिता पाण्डव मुझ पुत्रके कारण सत्पुरुषोंकी सभामें लज्जित न हों।
यों कहकर महाबाहु घटोत्कचने उन सबको प्रणाम किया। फिर पितरोंसे विजयका आशीर्वाद पाकर उत्साहसम्पन्न हो वहाँसे जानेका विचार किया। उस समय भगवान् जनार्दनने उसकी प्रशंसा करके कहा- 'बेटा ! कथा कहते समय विजयकी प्राप्ति करानेवाले मुझ श्रीकृष्णका स्मरण अवश्य कर लेना, जिससे मैं तुम्हारी दुर्भेद्य बुद्धिको अविलम्ब बढ़ा दूँगा।' ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उसे हृदयसे लगाया और आशीर्वाद देकर विदा किया। तदनन्तर हिडिम्बाकुमार महापराक्रमी घटोत्कच सूर्याक्ष, बालाख्य और महोदर- इन तीन सेवकोंके साथ आकाशमार्गसे चला और दिन बीतते-बीतते प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचा।
वहाँ जानेपर घटोत्कचने प्राग्ज्योतिषपुरसे बाहर एक सोनेका सुन्दर भवन देखा, जो एक विशाल वाटिकामें शोभा पा रहा था। उसकी ऊँचाई एक हजार मंजिलकी थी। मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होनेवाले उस भवनके पास पहुँचकर घटोत्कचने देखा-दरवाजेपर एक सखी खड़ी है। उसका नाम 'कर्णप्रावरणा' था। वीर हिडिम्बाकुमारने सरस भाषामें उससे पूछा- 'कल्याणी ! मुरकी पुत्री कहाँ हैं? मैं दूर देशसे आया हुआ उनकी कामना करनेवाला अतिथि हूँ और उन्हें देखना चाहता हूँ।'
भीमसेनकुमारकी यह बात सुनकर वह निशाचरी लड़खड़ाती हुई दौड़ी और महलकी छतपर बैठी हुई मौर्वीके पास जाकर इस प्रकार बोली- 'देवि ! कोई सुन्दर तरुण कामका अतिथि होकर तुम्हारे द्वारपर खड़ा है। उसके समान सुन्दर
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २२३
कान्तिवाला पुरुष कोई त्रिलोकीमें भी नहीं होगा। अतः अब उसके लिये क्या कर्तव्य है, यह आज्ञा दीजिये।'
कामकटंकटा बोली—अरी! उन्हें शीघ्र ले आ, क्यों विलम्ब करती है? कदाचित् दैवकी सहायतासे उन्हींके द्वारा मेरी प्रतिज्ञाकी पूर्ति हो जाय।
मौर्वीके ऐसा कहनेपर दासीने घटोत्कचके पास जाकर कहा—कामी पुरुष! उस मृत्युरूपा नारीके समीप शीघ्र जाओ। उसके ऐसा कहनेपर हँसते हुए घटोत्कचने वहींपर अपना धनुष छोड़कर घरके भीतर प्रवेश किया और विद्युत्की भाँति प्रकाशित होनेवाली उस दैत्य-कन्याको देखकर इस प्रकार सोचा—'अहो! मेरे पितृस्वरूप श्रीकृष्णने मेरे लिये योग्य स्त्रीको ही बतलाया है।' इस प्रकार विचार करते हुए उसने मौर्वीसे कहा—'ओ वज्रके समान कठोर हृदयवाली निष्ठुर नारी! मैं अतिथि होकर तुम्हारे घर आया हूँ। अतः सत्पुरुषोंके लिये जो उचित स्वागत-सत्कार है, वह अपने हार्दिक भावके अनुसार करो।' हिडिम्बाकुमारका यह वचन सुनकर कामकटंकटा उसके रूपसे विस्मित हो अपनी निन्दा करके इस प्रकार बोली—'भद्रपुरुष! तुम व्यर्थ ही यहाँ चले आये। जीते-जी पुनः सुखपूर्वक लौट जाओ, अथवा यदि मुझे चाहते हो तो शीघ्र कोई कथा कहो। कथा कहकर यदि मुझे सन्देहमें डाल दोगे तो मैं तुम्हारे वशमें हो जाऊँगी। उसके बाद मेरे द्वारा तुम्हारी सेवा होगी।'
उसके ऐसा कहनेपर घटोत्कचने यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनकी कथा है, उन भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करके कथा प्रारम्भ की। 'मान लो किसी पत्नीके गर्भसे कोई बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होनेपर बड़ा अजितेन्द्रिय निकला। उस युवकके एक पुत्री हुई तथा उसकी पत्नी मर गयी। तब पिताने ही उस नन्ही-सी पुत्रीकी रक्षा एवं पालन-पोषण किया। वह कन्या जब जवान हुई और उसके सब अंग विकसित हो गये, तब उसके पिताका मन उसके प्रति कामलोलुप हो उठा। तदनन्तर उस पापीने अपनी ही पुत्रीसे कहा—'प्रिये! तुम मेरे पड़ोसीकी लड़की हो। मैंने तुम्हें अपनी पत्नी बनानेके लिये यहाँ लाकर दीर्घकालतक पालन-पोषण किया है। अतः अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।' उसके ऐसा कहनेपर उस लड़कीने ऐसा ही माना। उसने इसे पतिरूपमें स्वीकार किया और इसने उसे पत्नीरूपमें। तत्पश्चात् उस कामी गदहेसे एक कन्या उत्पन्न हुई। अब बताओ, वह कन्या उसकी क्या लगेगी—पुत्री अथवा दौहित्री?' यदि तुममें शक्ति है, तो मेरे इस प्रश्नका शीघ्र उत्तर दो।'
यह प्रश्न सुनकर मौर्वीने अपने हृदयमें अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किसी प्रकार उसे इस प्रश्नका निर्णय नहीं सूझता था। तब उस प्रश्नसे परास्त होकर मौर्वीने अपनी शक्तिका उपयोग किया। वह ज्यों ही झूलेसे सहसा उठकर हाथमें तलवार लेना चाहती थी त्यों ही घटोत्कचने बड़े वेगसे पहुँचकर बायें हाथसे उसके केश पकड़ लिये और धरतीपर गिरा दिया। फिर उसके गलेपर बायाँ पैर रखकर दाहिने हाथमें कतरनी ले, उसकी नाक काट लेनेका विचार किया। मौर्वीने बहुत हाथ-पैर मारे, किंतु अन्तमें शिथिल होकर उसने मन्द स्वरमें कहा—'नाथ! मैं तुम्हारे प्रश्नसे और शक्ति तथा बलसे परास्त हो गयी हूँ। तुम्हें नमस्कार है। अब मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हारी दासी हूँ। जो आज्ञा दो वही करूँगी।'
घटोत्कचने कहा—यदि ऐसी बात है तो लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया।
घटोत्कचके यों कहकर छोड़ देनेपर कामकटंकटाने पुनः उसे प्रणाम किया और कहा—'महाबाहो! मैं जानती हूँ, तुम बड़े वीर हो। त्रिलोकीमें कहीं भी तुम्हारे पराक्रमकी तुलना नहीं है। तुम इस पृथ्वीपर साठ करोड़ राक्षसोंके स्वामी हो।
२२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये बातें मुझे कामाख्या देवीने बतलायी थीं, वे सब आज याद आ रही हैं। मैंने अपने सेवकों तथा इस शरीरके साथ यह सारा घर तुम्हारे चरणोंमें समर्पित कर दिया। प्राणनाथ! आज्ञा दो, मैं तुम्हारे किस आदेशका पालन करूँ?'
घटोत्कचने कहा—मौर्वी! जिसके पिता और भाई-बन्धु मौजूद हैं, उसका विवाह छिपकर हो, यह किसी प्रकार उचित नहीं है। इसलिये अब तुम शीघ्र मुझे इन्द्रप्रस्थ ले चलो। यही हमारे कुलकी परिपाटी है। इन्द्रप्रस्थमें गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर मैं तुमसे विवाह करूँगा। तदनन्तर मौर्वी अनेक प्रकारकी सामग्री साथ ले घटोत्कचको अपनी पीठपर बैठाकर इन्द्रप्रस्थमें आयी। भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवोंने घटोत्कचका अभिनन्दन किया, उसके बाद शुभलग्नमें भीमकुमारने मौर्वीका पाणिग्रहण किया। कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही वधूको देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। विवाह-सम्बन्ध हो जानेपर राजा युधिष्ठिरने घटोत्कचका आदर-सत्कार करके उसे पत्नीसहित अपने राज्यको जानेका आदेश दिया। महाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके हिडिम्बाकुमार अपनी राजधानी हिडम्ब-वनको चला गया। वहाँ उसने मौर्वीके साथ बहुत दिनोंतक क्रीड़ा की। तदनन्तर समयानुसार उसके गर्भसे एक महातेजस्वी एवं बालसूर्यके समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही युवावस्थाको प्राप्त हो गया। उसने माता-पितासे कहा—'मैं आप दोनोंको प्रणाम करता हूँ, बालकके आदिगुरु माता-पिता ही हैं। अतः आप दोनोंके दिये हुए नामको मैं ग्रहण करना चाहता हूँ।' तब घटोत्कचने अपने पुत्रको छातीसे लगाकर कहा—'बेटा! तुम्हारे केश बर्बराकार (घुँघराले) हैं, इसलिये तुम्हारा नाम 'बर्बरीक' होगा। महाबाहो! तुम अपने कुलका आनन्द बढ़ानेवाले होओगे। तुम्हारे लिये जो परम कल्याणमय वस्तु है, उसको हमलोग द्वारकापुरी चलकर यदुकुलनाथ भगवान् वासुदेवसे पूछेंगे।'
बर्बरीक और विजयकी गुप्तक्षेत्रमें साधना तथा पाण्डवोंसे बर्बरीककी भेंट
तदनन्तर कामकटंकटाको घरपर ही छोड़कर बुद्धिमान् घटोत्कच अपने पुत्रको साथ ले आकाशमार्गसे द्वारकाको गया। वहाँ यादवोंकी सभामें पहुँचकर उसने उग्रसेन, वसुदेव, सात्यकि, अक्रूर, बलराम तथा श्रीकृष्ण आदि प्रधान-प्रधान यदुवीरोंको प्रणाम किया। पुत्रसहित घटोत्कचको अपने चरणोंमें पड़ा देख भगवान् श्रीकृष्णने उसको और उसके पुत्रको भी उठाकर छातीसे लगा लिया और आशीर्वाद दे अपने समीप बिठाकर इस प्रकार पूछा—'बेटा! कुरुवंशको बढ़ानेवाले राक्षसश्रेष्ठ! बतलाओ, तुम्हें सब ओरसे कुशल तो है न? यहाँ किसलिये तुम्हारा आगमन हुआ है?'
घटोत्कच बोला—देव! आपके प्रसादसे मुझे सब ओरसे कुशल ही है। आपकी बतायी हुई स्त्री मौर्वीके गर्भसे मेरे इस पुत्रका जन्म हुआ है, यह आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा; उसे सुनिये। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ।
श्रीभगवान्ने कहा—बेटा मौर्वेय! तुम्हें जो-जो पूछनेकी इच्छा हो, सब पूछ लो।
बर्बरीक बोला—आर्यदेव माधव! मैं मन, बुद्धि और समाधिके द्वारा आपको प्रणाम करके
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यह पूछता हूँ कि संसारमें उत्पन्न हुए जीवका
कल्याण किस साधनसे होता है? कोई धर्मको कल्याणकारक कहते हैं तो कोई ऐश्वर्यदानको। कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम)-को, कोई तपस्याको, कोई द्रव्यको, कोई भोगोंको तथा कोई मोक्षको ही श्रेय कहते हैं। पुरुषोत्तम! इस प्रकार सैकड़ों श्रेयोंमेंसे किसी एक श्रेयको निश्चित करके बतलाइये जो मेरे इस कुलके लिये कल्याणकारी हो।
श्रीभगवान् बोले—बेटा! प्रत्येक वर्णके लिये पृथक्-पृथक् उत्तम श्रेय बताया गया है। ब्राह्मणोंके कल्याणका मूल है—तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय। मनीषी पुरुषोंने धर्मके स्वरूपका निरूपण भी ब्राह्मणोंके लिये कल्याणकी बात बतायी है। क्षत्रियोंके लिये सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बतायी गयी है। दुष्टोंका दमन और साधुओंका संरक्षण भी क्षत्रियोंके लिये श्रेयस्कर है। वैश्योंके श्रेयका साधन है—पशुपालन और कृषिविज्ञान। शूद्रके लिये द्विजोंकी सेवा ही श्रेयस्कर है, उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला शूद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँतिके शिल्पकर्मोंद्वारा जीविका चलावे और द्विजातियोंके हितमें लगा रहे। तुम क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो। पहले तुम ऐसे बलकी प्राप्तिके लिये साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बलसे दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन करो। ऐसा करनेसे तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी। बेटा! देवियोंकी अत्यन्त कृपा होनेसे ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करनेके उद्देश्यसे देवीकी आराधना करो।
बर्बरीकने पूछा—प्रभो! मैं किस क्षेत्रमें, किस देवीकी, कैसे आराधना करूँ?
उसके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् दामोदरने क्षणभर ध्यान करके कहा—महीसागरसंगम तीर्थमें, जो गुप्तक्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहीं नारदजीद्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएँ निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो। बर्बरीकसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे कहा—'भीमनन्दन! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदयवाला है, इसलिये मैंने इसे 'सुहृदय' यह दूसरा नाम प्रदान किया है।' यों कहकर भगवान्ने उसे छातीसे लगा लिया और नाना प्रकारके धनसे उसको सन्तुष्ट करके गुप्तक्षेत्रमें जानेका आदेश दिया। तब भगवान् श्रीकृष्णको, अपने पिता घटोत्कचको और वहाँ बैठे हुए सब यादवोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्तक्षेत्रको चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्णसे विदा ले अपने वनको गया और पुत्रके गुणोंका स्मरण करता हुआ अपने राज्यका पालन करने लगा।
तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्तक्षेत्रमें रहकर प्रतिदिन कर्मके द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकारके उपहारोंसे तीनों समय देवियोंकी पूजा करने लगा। तीन वर्षोंतक आराधना करनेपर देवियाँ उसपर बहुत सन्तुष्ट हुईं और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लोकोंमें किसीके पास नहीं है। तत्पश्चात् वे बोलीं—'महाद्युते! कुछ कालतक तुम यहीं निवास करो। फिर विजयकी संगति पाकर तुम अधिक कल्याणके भागी होओगे।' देवियोंके ऐसा कहनेपर सुहृदय वहीं ठहर गया। तदनन्तर मगधदेशके ब्राह्मण विजय वहाँ आये। उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिंगोंका पूजन किया और अपनी विद्याको सफल बनानेके लिये चिरकालतक देवियोंकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर देवियोंने स्वप्नमें यह आदेश दिया—'ब्रह्मन्! तुम आँगनमें सिद्धमाताके आगे सम्पूर्ण विद्याओंका साधन करो। सुहृदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।' यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियोंको प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदयसे कहा—'तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवीके स्तोत्रका पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जबतक मैं यह विद्या-साधनरूप कर्म करूँ तबतक किसी प्रकारका विघ्न न आने पावे।'
विजयके ऐसा कहनेपर महाबली बर्बरीक जब विघ्ननिवारणके लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजयने सुखपूर्वक आसनपर बैठकर 'गुं गुरुभ्यो नमः' इस मन्त्रसे गुरुओंको नमस्कार किया। उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्रका अष्टोत्तरशत जप करके पुनः गुरुजनोंको प्रणाम करनेके पश्चात् गणेश्वर-विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपतिके उस उत्तम मन्त्रका वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होनेपर भी समस्त कार्योंका साधक, महान् प्रयोजनोंकी प्राप्ति करानेवाला तथा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। 'ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः' यह सात अक्षरोंका मन्त्र है। मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार है—'ॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिर्विघ्नेश्वरो देवता गं बीजम् ॐ शक्तिः पूजार्थे जपार्थे तिलकार्थे वा मनईप्सितार्थे होमार्थे वा विनियोगः।' अर्थात् इस गणपति-मन्त्रके गण नामक ऋषि, विघ्नेश्वर देवता, गं बीज और ॐ शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथसिद्धि अथवा होमके लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्रसे चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्रका जप करे। अष्टोत्तरशत, सहस्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवनके लिये अग्निदेवका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् 'गं गणपतये स्वाहा' इस मन्त्रसे गुग्गुलकी गोलियोंद्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विघ्नोंमें इस उत्तम मन्त्रका साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोऽभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वरकल्पको जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तरशत जप करके गुग्गुलकी गुटिकाओंद्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि-विनायकका पूजन किया। इसके बाद सिद्धाम्बिकाको नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्याका साधनसहित जप किया, जिसके स्मरणमात्रसे सब दुःखोंका नाश हो जाता है। विप्रवर! मैं उस विद्याका वर्णन करता हूँ, सुनो—
ॐ भगवान् वासुदेवको नमस्कार है; सहस्र मस्तकोंवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है; जो क्षीरसमुद्रमें शयन करते हैं, शेषनागका विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं; जिन्होंने हयग्रीवरूप धारण किया है; उन्हीं भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नृसिंह! वामन! त्रिविक्रम! तथा वरदायक राम! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन! महावराह! महापुरुष! वैकुण्ठ! नारायण! पद्मनाभ! गोविन्द! दामोदर! हृषीकेश! समस्त असुरोंका संहार करनेवाले! सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें रखनेवाले! सब दुःखोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण विपत्तियोंका भंजन करनेवाले! सब नागोंका मान मर्दन करनेवाले! सर्वदेव महेश्वर! सबका बन्धन छुड़ानेवाले! सब
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शत्रुओंका संहार करनेवाले! समस्त ज्वरोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण ग्रहोंका निवारण तथा सब पापोंका शमन करनेवाले! भक्तजन-आनन्ददायक! जनार्दन! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्यका भाग समर्पित है।
जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है उसे वायु, अग्नि, वज्र, पत्थर, बिजली और वर्षाका भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्रसे, ग्रहोंसे तथा चोरोंसे भी भय नहीं रहता है। इस प्रकार विजयने संयमशील होकर मन, बुद्धि और समाधिके द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका साधन आरम्भ किया। जो बिना साधनके भी प्रतिदिन इस विद्याका पाठ करता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं।
विजय साधनमें लगे थे। उस समय रात्रिके पहले पहरमें एक राक्षसीने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीकने उस राक्षसीको भगा दिया। तत्पश्चात् आधी रातमें दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ; बर्बरीकने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नामका एक दानव विजयकी ओर दौड़ा। उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखोंसे अग्निकी बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेगसे आगे बढ़ा। दोनों बहुत देरतक स्थिरतापूर्वक युद्ध करते रहे। फिर बर्बरीकने उसे भूमिपर गिराकर खूब रगड़ा और तबतक नहीं छोड़ा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरनेपर उसे अग्निकोणमें महीसागरसंगमके तटपर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुनः विजयकी रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे पहरमें पश्चिम दिशाकी ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी। वह बड़े जोर-जोरसे गर्जना करती और अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाती हुई चलती थी; उसका नाम 'द्रुहद्रुहा' था। उसे आती देख सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेगसे उसके समीप पहुँचा। उसने हँसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक्केसे मारकर राक्षसीको धरतीपर गिरा दिया। उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुनः रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तदनन्तर चौथे पहरमें एक अद्भुत नकली संन्यासी मूड मुड़ाये दिगम्बरवेशमें वहाँ आया। उसने बड़ा भारी व्रती होनेका ढोंग रच रखा था। उसने आते ही कहा—'हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्टकी बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रखी है? आगमें हवन करते समय सूक्ष्म जीवोंका बड़ा भारी वध हो रहा है।' उसकी यह बात सुनकर बर्बरीकने हँसते हुए कहा—'अग्निमें आहुति देनेपर सब देवताओंकी तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्डका पात्र है।' यों कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास जाकर खड़ा हो गया और मुक्केसे मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तवमें वह एक दैत्य था। क्षणभरमें सचेत होनेपर वह बर्बरीकके भयसे भागा और एक गुफाके बिलमें समा गया। बर्बरीकने क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे उसका पीछा किया, किन्तु वह दैत्य वायुके समान वेगसे दौड़ता पातालमें समा गया। साठ योजन विस्तृत 'बहुप्रभा' नामकी नगरीमें वह निवास करता था। बर्बरीक वहाँ भी उसके पीछे-पीछे जा पहुँचा। उसे देखकर 'पलाशी' नामवाले दैत्योंमें 'दौड़ो, मारो, काटो और फाड़ डालो' आदिके रूपमें महान् कोलाहल मच गया। हल्ला सुनकर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक दैत्य योद्धा वीर बर्बरीकपर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों
२२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
दैत्योंको देखकर घटोत्कचका पुत्र क्रोधसे जल उठा। उसने किन्हींको पैरोंसे, किन्हींको भुजदण्डोंसे और किन्हींको छातीके धक्केसे मार-मारकर क्षणभरमें यमलोक पहुँचा दिया।
दैत्योंके मारे जानेपर वासुकि आदि नाग वहाँ आये और नाना प्रकारके प्रिय वचनोंद्वारा सुहृदयकी स्तुति करते हुए बोले—'भैमिनन्दन! आपने नागोंका बड़ा भारी उपकार किया, क्योंकि आपके द्वारा यह पलाशी नामक दैत्य अपने सेवकोंसहित मारा गया। वीर! इस दुरात्माने अपने सेवकोंकी सहायतासे भाँति-भाँतिके उपाय करके हमलोगोंको पीड़ा दी और पातालसे भी नीचे कर दिया था। आज आप हम नागोंसे कोई मनोवांछित वर माँगिये। हम सब आपपर प्रसन्न होकर वर देनेको उत्सुक हैं।'
बर्बरीक बोला—नागगण! यदि मुझे वर देना है, तो मैं यही माँगता हूँ कि विजय सब प्रकारके विघ्नोंसे मुक्त होकर सिद्धि प्राप्त कर लें।
तब नागोंने प्रसन्न होकर कहा—बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। बर्बरीक नागोंको वह दैत्यपुरी देकर उनके द्वारा सम्मानित हो वहाँसे लौटा। बिलके मनोहर मार्गसे लौटते समय उसने देखा, कल्पवृक्षके नीचे एक सर्वरत्नमय लिंग विराजमान है; उसका महान् प्रकाश सब ओर फैल रहा है तथा बहुत-सी नागकन्याएँ उसका पूजन कर रही हैं। यह सब देखकर बर्बरीकको बड़ा विस्मय हुआ! उसने नागकन्याओंसे पूछा—'सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी इस शिवलिंगकी किसने स्थापना की है? तथा इस शिवलिंगसे चारों दिशाओंकी ओर जो ये मार्ग गये हैं, इनका भी परिचय दो।'
वीर बर्बरीकका यह वचन सुनकर नागकन्याओंने सकुचाते हुए कहा—सम्पूर्ण नागोंके राजा महात्मा शेषने तपस्या करके यहाँ इस महालिंगकी स्थापना की है। इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे यह सब सिद्धियोंको देनेवाला है। इस लिंगसे पूर्वदिशाकी ओर जानेवाला यह मार्ग भूलोकमें 'श्री' पर्वततक चला गया है। नागलोक सुविधापूर्वक वहाँतक पहुँच सकें, इसके लिये 'इलापत्र' नागने इस मार्गका निर्माण किया है। दक्षिणसे जानेवाला यह मार्ग पृथ्वीपर 'शूर्पारक' क्षेत्रमें पहुँचता है, इसे 'कर्कोटक' नागने वहाँ जानेके लिये बनवाया है। पश्चिमका यह मार्ग अतिशय प्रकाशमान 'प्रभास' तीर्थको जाता है, इसे ऐरावतने नागोंकी यात्राके लिये बनवाया है। इसी प्रकार उत्तरसे होकर निकला हुआ यह मार्ग पृथ्वीपर 'कुरुक्षेत्र' में जाता है, महात्मा तक्षकने वहाँ जानेके लिये यह मार्ग तैयार किया है। लिंगसे ऊपरकी ओर जो मार्ग जाता है, जिससे जानेके लिये आप खड़े हैं; यह गुप्तक्षेत्रमें सिद्धलिंगके पास गया है। यह मार्ग स्वामी स्कन्दने अपनी शक्तिके प्रहारसे बनाया है। वीर! ये सब बातें हमने बता दीं, अब आप हमारा निवेदन सुनिये। पहले तो यह बताइये कि आप कौन हैं? अभी-अभी आप दैत्यके पीछे लगे गये थे और अब अकेले ही लौट रहे हैं; इसका क्या कारण है,