भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 255

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लोकोंमें किसीके पास नहीं है। तत्पश्चात् वे बोलीं—'महाद्युते! कुछ कालतक तुम यहीं निवास करो। फिर विजयकी संगति पाकर तुम अधिक कल्याणके भागी होओगे।' देवियोंके ऐसा कहनेपर सुहृदय वहीं ठहर गया। तदनन्तर मगधदेशके ब्राह्मण विजय वहाँ आये। उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिंगोंका पूजन किया और अपनी विद्याको सफल बनानेके लिये चिरकालतक देवियोंकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर देवियोंने स्वप्नमें यह आदेश दिया—'ब्रह्मन्! तुम आँगनमें सिद्धमाताके आगे सम्पूर्ण विद्याओंका साधन करो। सुहृदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।' यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियोंको प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदयसे कहा—'तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवीके स्तोत्रका पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जबतक मैं यह विद्या-साधनरूप कर्म करूँ तबतक किसी प्रकारका विघ्न न आने पावे।'

विजयके ऐसा कहनेपर महाबली बर्बरीक जब विघ्ननिवारणके लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजयने सुखपूर्वक आसनपर बैठकर 'गुं गुरुभ्यो नमः' इस मन्त्रसे गुरुओंको नमस्कार किया। उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्रका अष्टोत्तरशत जप करके पुनः गुरुजनोंको प्रणाम करनेके पश्चात् गणेश्वर-विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपतिके उस उत्तम मन्त्रका वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होनेपर भी समस्त कार्योंका साधक, महान् प्रयोजनोंकी प्राप्ति करानेवाला तथा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। 'ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः' यह सात अक्षरोंका मन्त्र है। मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार है—'ॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिर्विघ्नेश्वरो देवता गं बीजम् ॐ शक्तिः पूजार्थे जपार्थे तिलकार्थे वा मनईप्सितार्थे होमार्थे वा विनियोगः।' अर्थात् इस गणपति-मन्त्रके गण नामक ऋषि, विघ्नेश्वर देवता, गं बीज और ॐ शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथसिद्धि अथवा होमके लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्रसे चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्रका जप करे। अष्टोत्तरशत, सहस्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवनके लिये अग्निदेवका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् 'गं गणपतये स्वाहा' इस मन्त्रसे गुग्गुलकी गोलियोंद्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विघ्नोंमें इस उत्तम मन्त्रका साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोऽभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वरकल्पको जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तरशत जप करके गुग्गुलकी गुटिकाओंद्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि-विनायकका पूजन किया। इसके बाद सिद्धाम्बिकाको नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्याका साधनसहित जप किया, जिसके स्मरणमात्रसे सब दुःखोंका नाश हो जाता है। विप्रवर! मैं उस विद्याका वर्णन करता हूँ, सुनो—

ॐ भगवान् वासुदेवको नमस्कार है; सहस्र मस्तकोंवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है; जो क्षीरसमुद्रमें शयन करते हैं, शेषनागका विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं; जिन्होंने हयग्रीवरूप धारण किया है; उन्हीं भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नृसिंह! वामन! त्रिविक्रम! तथा वरदायक राम! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन! महावराह! महापुरुष! वैकुण्ठ! नारायण! पद्मनाभ! गोविन्द! दामोदर! हृषीकेश! समस्त असुरोंका संहार करनेवाले! सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें रखनेवाले! सब दुःखोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण विपत्तियोंका भंजन करनेवाले! सब नागोंका मान मर्दन करनेवाले! सर्वदेव महेश्वर! सबका बन्धन छुड़ानेवाले! सब