संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | २२५ |
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यह पूछता हूँ कि संसारमें उत्पन्न हुए जीवका
कल्याण किस साधनसे होता है? कोई धर्मको कल्याणकारक कहते हैं तो कोई ऐश्वर्यदानको। कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम)-को, कोई तपस्याको, कोई द्रव्यको, कोई भोगोंको तथा कोई मोक्षको ही श्रेय कहते हैं। पुरुषोत्तम! इस प्रकार सैकड़ों श्रेयोंमेंसे किसी एक श्रेयको निश्चित करके बतलाइये जो मेरे इस कुलके लिये कल्याणकारी हो।
श्रीभगवान् बोले—बेटा! प्रत्येक वर्णके लिये पृथक्-पृथक् उत्तम श्रेय बताया गया है। ब्राह्मणोंके कल्याणका मूल है—तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय। मनीषी पुरुषोंने धर्मके स्वरूपका निरूपण भी ब्राह्मणोंके लिये कल्याणकी बात बतायी है। क्षत्रियोंके लिये सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बतायी गयी है। दुष्टोंका दमन और साधुओंका संरक्षण भी क्षत्रियोंके लिये श्रेयस्कर है। वैश्योंके श्रेयका साधन है—पशुपालन और कृषिविज्ञान। शूद्रके लिये द्विजोंकी सेवा ही श्रेयस्कर है, उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला शूद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँतिके शिल्पकर्मोंद्वारा जीविका चलावे और द्विजातियोंके हितमें लगा रहे। तुम क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो। पहले तुम ऐसे बलकी प्राप्तिके लिये साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बलसे दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन करो। ऐसा करनेसे तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी। बेटा! देवियोंकी अत्यन्त कृपा होनेसे ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करनेके उद्देश्यसे देवीकी आराधना करो।
बर्बरीकने पूछा—प्रभो! मैं किस क्षेत्रमें, किस देवीकी, कैसे आराधना करूँ?
उसके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् दामोदरने क्षणभर ध्यान करके कहा—महीसागरसंगम तीर्थमें, जो गुप्तक्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहीं नारदजीद्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएँ निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो। बर्बरीकसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे कहा—'भीमनन्दन! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदयवाला है, इसलिये मैंने इसे 'सुहृदय' यह दूसरा नाम प्रदान किया है।' यों कहकर भगवान्ने उसे छातीसे लगा लिया और नाना प्रकारके धनसे उसको सन्तुष्ट करके गुप्तक्षेत्रमें जानेका आदेश दिया। तब भगवान् श्रीकृष्णको, अपने पिता घटोत्कचको और वहाँ बैठे हुए सब यादवोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्तक्षेत्रको चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्णसे विदा ले अपने वनको गया और पुत्रके गुणोंका स्मरण करता हुआ अपने राज्यका पालन करने लगा।
तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्तक्षेत्रमें रहकर प्रतिदिन कर्मके द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकारके उपहारोंसे तीनों समय देवियोंकी पूजा करने लगा। तीन वर्षोंतक आराधना करनेपर देवियाँ उसपर बहुत सन्तुष्ट हुईं और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों