भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 256
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २२७

शत्रुओंका संहार करनेवाले! समस्त ज्वरोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण ग्रहोंका निवारण तथा सब पापोंका शमन करनेवाले! भक्तजन-आनन्ददायक! जनार्दन! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्यका भाग समर्पित है।

जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है उसे वायु, अग्नि, वज्र, पत्थर, बिजली और वर्षाका भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्रसे, ग्रहोंसे तथा चोरोंसे भी भय नहीं रहता है। इस प्रकार विजयने संयमशील होकर मन, बुद्धि और समाधिके द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका साधन आरम्भ किया। जो बिना साधनके भी प्रतिदिन इस विद्याका पाठ करता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

विजय साधनमें लगे थे। उस समय रात्रिके पहले पहरमें एक राक्षसीने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीकने उस राक्षसीको भगा दिया। तत्पश्चात् आधी रातमें दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ; बर्बरीकने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नामका एक दानव विजयकी ओर दौड़ा। उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखोंसे अग्निकी बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेगसे आगे बढ़ा। दोनों बहुत देरतक स्थिरतापूर्वक युद्ध करते रहे। फिर बर्बरीकने उसे भूमिपर गिराकर खूब रगड़ा और तबतक नहीं छोड़ा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरनेपर उसे अग्निकोणमें महीसागरसंगमके तटपर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुनः विजयकी रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे पहरमें पश्चिम दिशाकी ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी। वह बड़े जोर-जोरसे गर्जना करती और अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाती हुई चलती थी; उसका नाम 'द्रुहद्रुहा' था। उसे आती देख सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेगसे उसके समीप पहुँचा। उसने हँसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक्केसे मारकर राक्षसीको धरतीपर गिरा दिया। उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुनः रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तदनन्तर चौथे पहरमें एक अद्भुत नकली संन्यासी मूड मुड़ाये दिगम्बरवेशमें वहाँ आया। उसने बड़ा भारी व्रती होनेका ढोंग रच रखा था। उसने आते ही कहा—'हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्टकी बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रखी है? आगमें हवन करते समय सूक्ष्म जीवोंका बड़ा भारी वध हो रहा है।' उसकी यह बात सुनकर बर्बरीकने हँसते हुए कहा—'अग्निमें आहुति देनेपर सब देवताओंकी तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्डका पात्र है।' यों कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास जाकर खड़ा हो गया और मुक्केसे मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तवमें वह एक दैत्य था। क्षणभरमें सचेत होनेपर वह बर्बरीकके भयसे भागा और एक गुफाके बिलमें समा गया। बर्बरीकने क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे उसका पीछा किया, किन्तु वह दैत्य वायुके समान वेगसे दौड़ता पातालमें समा गया। साठ योजन विस्तृत 'बहुप्रभा' नामकी नगरीमें वह निवास करता था। बर्बरीक वहाँ भी उसके पीछे-पीछे जा पहुँचा। उसे देखकर 'पलाशी' नामवाले दैत्योंमें 'दौड़ो, मारो, काटो और फाड़ डालो' आदिके रूपमें महान् कोलाहल मच गया। हल्ला सुनकर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक दैत्य योद्धा वीर बर्बरीकपर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों