संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१५
काटना, तपाना, छेदना, संसारको बदल डालना, समस्त प्राणियोंको प्रसन्न कर देना तथा मृत्युकालपर विजय पाना आदि आठ अहंकारोद्भवा तथा पहलेकी अड़तालीस, कुल छप्पन सिद्धियाँ प्राजापत्यलोकमें हैं।
संकेतमात्रसे ही संसारकी सृष्टि कर देना, सबपर अनुग्रह करना, प्रलयका अधिकार प्राप्त कर लेना, अन्य लोगोंके चित्तमें प्रवेश करके उसे प्रेरित करना, जिसकी कहीं समता नहीं ऐसी वस्तु प्रकट कर देना, चित्रलिखित वस्तुको प्रत्यक्ष प्रकट कर देना, अशुभको शान्त कर देना तथा कर्तृत्वशक्तिसे सम्पन्न होना—ये आठ बुद्धिजनित सिद्धियाँ तथा पहलेकी छप्पन मिलाकर कुल चौसठ सिद्धियाँ ब्रह्मलोकमें विद्यमान हैं।
यह गोपनीय रहस्य मैंने तुमसे प्रकट किया है। ये सब सिद्धियाँ जीते-जी अथवा देह-भेद होनेपर योगीको प्राप्त होती हैं। परंतु इनके द्वारा सदैव पतनका भय बना रहता है। इसलिये योगीको इन सिद्धियोंके प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिये। इन सब सिद्धिजनक गुणोंका निवारण करके सदा योगसाधनामें लगे रहनेवाले योगीको ऐसी आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, जो योगमें भलीभाँति सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता। ये आठ सिद्धियाँ माहेश्वरपदमें स्थिति सूचित करती हैं। सूक्ष्म-से-सूक्ष्म हो जाना 'अणिमा' शक्ति है। अत्यन्त शीघ्रतासे कोई काम करना 'लघिमा' है। समस्त लोकसे पूजनीय पदकी प्राप्ति होनेसे 'महिमा' मानी गयी है। 'प्राप्ति' नामक सिद्धि वह है, जब कि योगीके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता है। सर्वत्र व्यापक होनेके कारण उसमें 'प्राकाम्य' नामक सिद्धिका उदय माना जाता है। सिद्ध योगी जिससे ईश्वरतुल्य हो जाता है, वह 'ईशित्व' नामक सिद्धि है। सबको वशमें करनेके कारण उसमें 'वशिता' नामक उत्तम सिद्धि मानी गयी है। जहाँ इच्छा हो वहीं पहुँच जाना 'कामावसायिता' नामक सिद्धि है। ये समस्त सिद्धियाँ ईश्वरपदको प्राप्त हुए योगीमें प्रकट होती हैं। इसलिये वह न तो जन्म लेता है, न बढ़ता है और न मृत्युको ही प्राप्त होता है। ऐसा योगी मुक्त कहा गया है। जो इस प्रकार मुक्ति पाता है, उसका आत्मा परमात्माके साथ उसी प्रकार एक हो जाता है, जैसे जलमें डाला हुआ जल परस्पर एकताको प्राप्त हो जाता है। योगका ऐसा फल जानकर योगी पुरुष सदा योगका अभ्यास करे। निर्मल योगीजन यहाँ योगसिद्धिके लिये कुछ उपमाएँ दिया करते हैं। जैसे सूर्यकान्तमणि चन्द्रमाकी किरणोंके संयोगसे अथवा चन्द्रकान्तमणिके सम्पर्कसे अग्नि प्रकट नहीं करता अपितु अकेला होनेपर ही सजातीय सूर्यकिरणके संयोगसे वह आग प्रज्वलित करता है, उसी प्रकार योगीकी भी उपमा है। योगी भी तभी सिद्धि लाभ करता है, जब वह प्रतिबन्धकोंसे दूर रहकर अनुकूल साधन-सामग्रीके साथ अकेला रहकर साधनमें संलग्न होता है। जैसे चिड़िया, चूहा और नेवला घरमें स्वामीकी भाँति निवास करते हैं और घर गिर जानेपर अन्यत्र चले जाते हैं, किंतु उनके मनको इसके लिये दुःख नहीं होता। यही उपमा योगीके लिये भी है। उसको भी देह-गेहमें ममता नहीं रखनी चाहिये। जैसे चींटी या दीमक अपने बहुत छोटे मुखाग्रसे थोड़ी-थोड़ी मिट्टी जमा करके मिट्टीका ढेर लगा देते हैं, यही उपदेश योगीके लिये भी है। योगी निरन्तर थोड़ी-थोड़ी साधनशक्तिका संचय करते हुए एक दिन महती योगशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। पत्र, पुष्प और फलसे भरे हुए वृक्षको पशु, पक्षी और मनुष्य आदि नष्ट