संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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योगवेत्ता पुरुष इस प्रकार मृत्युसूचक विपरीत लक्षणोंको देखकर उत्तम धारणाका आश्रय ले समाधिमें स्थिर हो जाय। यदि वह उस मृत्युको नहीं चाहता तो उसे वह नहीं प्राप्त होती अथवा यदि मुक्तिकी इच्छा हो तो उस मृत्युको ब्रह्मरन्ध्रमें छोड़ दे। इस प्रकार विमुक्त हुए शरीरमें भी जो उपसर्ग योगीको प्राप्त होते हैं, उनके नाम सुनो। ईशान, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, इन्द्र, चन्द्र, प्रजापति तथा ब्रह्मा—इनसे सम्बन्ध रखनेवाली आठ लोकोंमें क्रमशः आठ सिद्धियाँ होती हैं, जो इस प्रकार हैं—पार्थिवी, जलमयी, तैजसी, वायुसम्बन्धिनी, आकाशसम्बन्धिनी, मानसी, अहंकारोद्भवा तथा बुद्धिजा। इनमें प्रत्येकके आठ-आठ भेद हैं और ये उत्तरोत्तर लोकोंमें क्रमशः द्विगुण-त्रिगुण आदिके क्रमसे स्थित हैं। पूर्व अर्थात् ईशानलोकमें आठ सिद्धियाँ हैं और अन्तिम अर्थात् ब्रह्मलोकमें इनकी संख्या चौंसठ हो जाती है। ऐसा किस प्रकार होता है, सो सुनो। मोटा होना, पतला होना, बालक बन जाना, बूढ़ा होना, जवान हो जाना, भिन्न-भिन्न जातिके जीवोंके रूपमें अपनेको प्रकट करना, एक ही जातिमें भी अनेक रूप ग्रहण करना तथा पार्थिव अंशके बिना ही केवल चार तत्त्वोंसे शरीरको धारण करना—ये आठ पार्थिवी सिद्धियाँ हैं, जो ईशानलोकमें पृथ्वीतत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके बाद प्रकट होती हैं।
जलतत्त्वपर विजय होनेके पश्चात् मनुष्य पृथ्वीकी ही भाँति जलमें निवास करता है। बिना किसी घबराहटके समुद्रको पी सकता है, उसे सर्वत्र जलकी प्राप्ति होती है, वह सूखे फलको भी हरा और रसीला कर सकता है। पृथ्वी और जलको छोड़कर केवल तीन भूतोंसे शरीर धारण करता है। नदियोंको हाथमें रख सकता है, उसके शरीरमें कोई घाव नहीं होता तथा उसकी बड़ी सुन्दर कान्ति होती है। इस प्रकार ये आठ नूतन और आठ पहलेकी, कुल सोलह सिद्धियाँ राक्षसलोकमें मानी गयी हैं।
अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जानेपर देहसे अग्नि प्रकट करना, अग्निके तापका भय दूर हो जाना, समस्त लोकोंको भस्म कर डालनेकी शक्तिका होना, पानीमें आग लगा देना, हाथसे आगको उठा लेना, स्मरणमात्रसे किसीको पवित्र कर देना, आगसे जलकर भस्म हुए पदार्थका पुनः निर्माण कर देना तथा केवल दो महाभूत वायु और आकाशके आधारपर शरीरको धारण करना—ये आठ तैजस सिद्धियाँ और पहलेकी सोलह सब मिलकर चौबीस सिद्धियाँ यक्षलोकमें प्रकट होती हैं।
मनके समान गमनशक्तिका होना, प्राणियोंके भीतर प्रवेश करना, पर्वत आदि बड़ी भारी वस्तुओंका भार लीलापूर्वक ढोना, हलका होना, भारी हो जाना, दोनों हाथोंसे वायुको पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागके धक्केसे समूची पृथ्वीको हिला देना तथा एकमात्र आकाशतत्त्वसे ही शरीरको धारण करना—ये वायुसम्बन्धिनी शक्तियाँ गन्धर्वलोकमें हैं। पहलेकी चौबीस और आठ नूतन कुल मिलाकर बत्तीस सिद्धियाँ गन्धर्वलोकमें हैं।
अपनी छायाको मिटा देना, इन्द्रियोंका दर्शन न होना, सदा आकाशमें चलना, इन्द्रिय और मन आदिका स्वयं शान्त रहना, दूरके शब्दको सुन लेना, सब प्राणियोंके शब्दको समझ लेना, तन्मात्राओंके चिह्नको ग्रहण कर लेना तथा समस्त प्राणियोंको देखना—ये आठ आकाशतत्त्वको जीतनेसे प्राप्त होनेवाली तथा पहलेकी बत्तीस कुल चालीस सिद्धियाँ इन्द्रलोकमें हैं।
इच्छाके अनुरूप वस्तुओंका प्राप्त होना, जहाँ इच्छा हो वहीं निकल जाना, सब प्रकारकी शक्तियोंका होना, समस्त गोपनीय वस्तुओंको देखना तथा समस्त संसारकी घटनाओंको देखना आदि आठ सिद्धियाँ मानसी हैं—ये तथा पहलेकी चालीस कुल अड़तालीस सिद्धियाँ चन्द्रलोकमें मानी गयी हैं।