भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 242
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१३

अत्यन्त घोर उपद्रवोंसे योगका नाश हो जानेके कारण सम्पूर्ण देवयोनियाँ बार-बार आवर्तन करती (आवागमनमें पड़ी रहती) हैं।

इसलिये योगी मनोमय* श्वेत कंबलका आवरण डालकर परब्रह्म परमात्मामें चित्तको स्थिर करके निरन्तर उन्हींका चिन्तन करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले योगीको सदा सात्त्विक आहारका सेवन करना चाहिये। राजस और तामस आहारोंसे योगीको कभी सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती। स्वधर्मपालनमें लगे हुए श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय महात्माओंके यहाँ योगीको भिक्षा माँगनी चाहिये। भिक्षामें मिले हुए यवान्न, मट्ठा, दूध, जौकी लपसी, पका हुआ फल-मूल अथवा कन, तिलकी खली या सत्तू—ये सब पवित्र आहार हैं, जो योगियोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।

योगका साधक विभिन्न लक्षणोंसे अपनी मृत्युका समय जानकर कालको वंचित करनेके लिये एकाग्रचित्त हो योगतत्पर हो जाय। अब मैं उन निमित्तों (लक्षणों)-को बतलाता हूँ, जिनसे योगवेत्ता पुरुष अपनी मृत्युको जान लेता है। लाल चमड़ा अथवा लाल वस्त्र धारण किये हुए हँसती-गाती हुई कोई स्त्री स्वप्नमें जिस पुरुषको दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें किसी नंगे संन्यासीको हँसते और उछलते-कूदते देखकर यह समझ लेना चाहिये कि उसके रूपमें अपनी मृत्यु आ गयी है। जो स्वप्नमें रीछ और वानरसे जुते हुए रथपर बैठकर गाता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर जाता है अथवा कीचड़ या गोबरमें डूबता है, वह जीवित नहीं रहता। स्वप्नमें बिना जलकी नदीको केश, अंगार, भस्म अथवा सर्पोंसे किसी एकके द्वारा भरी हुई देखकर मनुष्य जीवित नहीं रहता। यदि विकराल, भयंकर तथा क्रूर स्वभाववाले मनुष्य हाथमें हथियार लिये स्वप्नमें पत्थरोंसे मारें तो मनुष्य तत्काल मृत्युको प्राप्त हो जाता है। सूर्योदयकालमें रोती हुई गीदड़ी जिसके सामने होकर दाहिने अथवा बायें चली जाती है, वह भी शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो दीपके बुझनेकी गन्धको नहीं जानता, रातमें रक्तवमन करता है तथा दूसरेके नेत्रमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता, वह जीवित नहीं रहता। आधी रातमें इन्द्रधनुष और दिनमें तारागणोंको देखकर शास्त्रविश्वासी पुरुष यह मान ले कि उसकी आयु क्षीण हो गयी है। जिसकी नाक टेढ़ी हो जाय, कानोंमें नीचाई-ऊँचाई आ जाय तथा बायीं आँख सदा बहती रहे; उसकी आयु समाप्त हो गयी है। जब मुँह कुछ-कुछ लाल हो जाय और जीभ काली पड़ जाय, तब विद्वान् पुरुषको यह समझ लेना चाहिये कि अपनी मृत्यु समीप आ गयी है। जो स्वप्नमें ऊँट और गदहेकी सवारीसे दक्षिण दिशाकी ओर जाता है तथा जो अपने दोनों कान बंद करके आवाज नहीं सुन पाता; वह जीवित नहीं रहता है। स्वप्नमें जो गड्ढेमें गिर जाय और उसके निकलनेका दरवाजा बंद कर दिया जाय, जिससे वह फिर उठ न सके; जिसकी स्वच्छ दृष्टि भी लाल हो जाय, जो स्वप्नमें अग्निप्रवेश करके फिर वहाँसे न निकले, इसी तरह जलमें प्रवेश करके वहाँसे न निकले, तो वही उसके जीवनका अन्तिम काल है। जो रात या दिनमें दुष्ट भूतोंद्वारा मारा जाता है तथा जिसकी प्रकृतिमें कोई विकार आ गया है, उसके निकट ही यमराज और काल मौजूद हैं। जो भक्त होकर भी देवता, गुरु, पिता-माता तथा ज्ञानी पुरुषोंकी निन्दा और अवहेलना करता है, वह जीवित नहीं रहता है।


* मनसे यह भावना करे कि मेरे सब ओर श्वेत कंबलका आवरण पड़ा है, मैं अकेला हूँ, जगत्की कोई विघ्न-बाधा मेरे पासतक नहीं पहुँच सकती।