भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 241
२१२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

होते हैं। इसीको 'धारणा' कहा गया है। इन धारणाओंको सिद्ध कर लेनेपर योगी पुरुष अक्षर ब्रह्मकी समताको प्राप्त हो जाता है। धारणामें स्थित हुए पुरुषके ये जो ध्येयतत्त्व हैं, उसका लक्षण सुनो। अर्जुन ! ध्येयतत्त्व बहुत प्रकारका है, उनका कहीं अन्त नहीं मिलता। कोई शिवका, कोई विष्णुका, कोई सूर्य और ब्रह्माका तथा कोई महादेवीका ध्यान करते हैं। जो जिसका ध्यान करता है, वह उसीमें लीन होता है, इसलिये सदा कल्याण करनेवाले पंचमुख भगवान् शंकरका ध्यान करना चाहिये। भगवान् शिव वृषभकी पीठपर पद्मासनसे विराजमान हैं, उनकी अंगकान्ति गौर है, उनके दस हाथ हैं और मुखपर अत्यन्त प्रसन्नता छा रही है तथा वे ध्यानमग्न हो रहे हैं। इस प्रकार तुम्हारे लिये 'ध्येय' का स्वरूप बताया गया। इसका सदा ध्यान करना चाहिये। 'ध्यान' का लक्षण इस प्रकार है। धारणामें स्थित हुआ साधक आधे पलके लिये भी अपने ध्येय (इष्टदेव)-से भिन्न वस्तुका चिन्तन न करे। इस प्रकार इस दुर्गम भूमिकामें स्थित होकर योगवेत्ता पुरुष कुछ भी चिन्तन न करे—यही 'समाधि' कहलाती है। समाधिका ठीक-ठीक लक्षण बता रहा हूँ, सुनो। जो शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा रूपसे सर्वथा रहित है, उस परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हुआ योगी 'समाधिस्थ' कहा गया है। समाधिमें स्थित हुआ मनुष्य कभी विघ्नोंसे अभिभूत नहीं होता। भारी-से-भारी दुःख क्यों न आ जाय, वह उससे भी विचलित नहीं होता। उसके कानोंके पास यदि सैकड़ों शंख फूँके जायँ और बहुत-से नगाड़े पीटे जायँ तो भी वह बाहरके शब्दको नहीं सुनता। कोड़ोंके प्रहारसे उसे घायल कर दिया जाय, आगसे उसका शरीर जल जाय तथा सर्दीसे भरे हुए भयंकर स्थानमें उसे बैठा दिया जाय, तो भी वह बाहरके स्पर्शका अनुभव नहीं करता। फिर वैसे पुरुषके लिये बाहरी रूप, गन्ध और रसके विषयमें तो कहना ही क्या है? जो इस प्रकार आत्माका साक्षात्कार करके पुनः समाधिको प्राप्त करता है, उसे भूख और प्यास कभी बाधा नहीं पहुँचा सकती। निश्चल समाधिको पाकर मनुष्य जिस सुखका अनुभव करता है, वह न तो स्वर्गलोकमें है और न पातालमें ही है; फिर मनुष्यलोकमें तो वह हो ही कहाँ सकता है।

कुरुनन्दन! इस प्रकार योगमार्गमें आरूढ़ हुए पुरुषके लिये भी पाँच उपसर्ग प्राप्त होते हैं, जो बड़े ही कटु हैं—उनका परिचय सुनो। प्रातिभ, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये ही पाँच उपसर्ग हैं। सम्पूर्ण शास्त्रोंकी प्रतिभा (ज्ञान)का हो जाना ही 'प्रातिभ' उपसर्ग है। यह है तो सात्त्विक परंतु इसके कारण जिसके हृदयमें अहंकार आ जाता है, इससे वह योगी अपनी स्थितिसे नीचे गिर जाता है। हजारों योजन दूरसे भी शब्दको सुन लेना 'श्रावण' नामक उपसर्ग है। यह दूसरा विघ्न है। यह भी सात्त्विक ही है परंतु इसके कारण भी जो गर्व करता है, वह नष्ट हो जाता है (साधनासे गिर जाता है)। जिससे देवताओंकी आठ योनियोंको देखता है, उस शक्तिका प्राप्त होना 'दैव' उपसर्ग है। यह भी सात्त्विक दोष है, इससे भी घमण्ड होनेपर साधकका विनाश होता है। जैसे जलके भँवरमें डूबा हुआ मनुष्य व्याकुल होता है, उसी प्रकार सहसा प्रकट हुए विविध विज्ञानके आवर्तमें जो चित्तकी व्याकुलता होती है, उसका नाम 'आवर्त' है। यह राजस दोष है, जो बड़ा भयंकर है। जब योगीका मन अनेक प्रकारके दोषोंसे आक्रान्त हो समस्त आधारोंसे भ्रष्ट होनेके कारण अवलम्बशून्य होकर भटकने लगता है तब उसे 'भ्रम' नामक दोष बताया जाता है। यह तामस दोष है। इन