संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कर देते हैं। इस रहस्यको समझकर योगी पुरुष सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सारांश यह कि यदि योगी भी सिद्धिका चमत्कार प्रकट करने लगे तो संसारके लोग उसे अपनी साधनासे भ्रष्ट कर देंगे। अतः उसे गुप्त रहकर ही साधना करनी चाहिये। हिरनके बच्चेके सिरपर जब पहले सींग उगते हैं तो वे तिलकके समान दिखायी देते हैं और धीरे-धीरे बढ़कर बहुत बड़े हो जाते हैं। इस बातको लक्ष्य करके योगी उस हिरनके सींगके साथ-साथ यदि बढ़ने लगे (धीरे-धीरे अपनी साधना बढ़ाता रहे) तो वह सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। मनुष्य जल या तेल आदि द्रव पदार्थोंसे भरे हुए पात्रको लेकर पृथ्वीसे बहुत ऊँचे मार्गपर चढ़ जाता है, यह देखकर भी क्या योगी पुरुषोंको अपने कर्तव्यका ज्ञान नहीं होता? उसको भी चाहिये कि वह अत्यन्त सावधान होकर योगके उच्च शिखरपर आरोहण करे।
वही घर है, जहाँ निवास हो; वही भोजन है, जिससे जीवनकी रक्षा हो। जिससे प्रयोजन सिद्ध हो और जो स्वयं ही योगसिद्धिमें सहायक हो, वैसे ही ज्ञानकी योगी उपासना करे। वही उसके लिये कार्यसाधक हो सकता है। नाना प्रकारके ज्ञानका जो अधिक संग्रह है, वह योगकी साधनामें विघ्नकारक ही होता है। जो 'यह जानने योग्य है, यह जानने योग्य है' ऐसा सोचते हुए बहुविध ज्ञानके लिये प्यासा फिरता है, वह एक हजार कल्पोंमें भी ज्ञेय वस्तुको नहीं प्राप्त कर सकता। आसक्ति छोड़कर, क्रोधको जीतकर परिमित आहारका सेवन करते हुए जितेन्द्रिय होवे और बुद्धिके द्वारा इन्द्रियद्वारोंको बंद करके मनको ध्यानमें लगावे। सात्त्विक आहारका सेवन करे; ऐसे आहारका नहीं, जिससे उसका चित्त काबूके बाहर हो जाय। चित्तको बिगाड़नेवाले आहारका सेवन करनेवाला मनुष्य रौरव नरकका प्रिय अतिथि होता है। वाणी दण्ड है, कर्म दण्ड है और मन दण्ड है। ये तीनों दण्ड जिसके अधीन हैं; वह 'त्रिदण्डी' यति माना गया है। जब सामने आया हुआ मनुष्य अनुरक्त हो जाय, परोक्षमें गुणोंका कीर्तन होने लगे और कोई भी जीव उससे भयभीत न हो; तब यह सब योगीके लिये सिद्धिसूचक लक्षण बताया जाता है। लोलुपताका न होना, निरोग रहना, निष्ठुरताका अभाव होना, सुन्दर गन्ध प्रकट होना, मल और मूत्रका कम हो जाना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता तथा वाणीमें कोमलता—ये योगसिद्धिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मचिन्तन-परायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय है; वह महामना योगी इस योगमें सिद्धि प्राप्त करता है और उस योगके प्रभावसे मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जिसका चित्त मोक्षमार्गमें आकर परब्रह्म परमात्मामें संलग्न हो सुखके अपार सिन्धुमें निमग्न हो गया है, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी माता कृतार्थ हो गयी, तथा उसे पाकर यह सारी पृथ्वी भी सौभाग्यवती हो गयी।* जिसकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध है, जो मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें समान भाव रखता है, समस्त प्राणियोंमें सम भावसे निवास करता है; वह यत्नशील साधक अपनी साधना पूर्ण करके उस सर्वोत्कृष्ट सनातन एवं अविनाशी पदको प्राप्त होता है, जहाँ पहुँच जानेपर कोई भी मनुष्य पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता।
अर्जुन! यह योगका रहस्य मैंने तुमसे बतलाया है। गौतमने ऐसे ही योगको प्राप्त किया और उन्होंने ही इस गौतमेश्वरलिंगको स्थापित
* कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा भाग्यवती च तेन। विमुक्तिमार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ५२। ३८)