भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 246
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१७

किया है, जो कि दर्शन करनेवाले मनुष्यके समस्त कलिकलुषका विनाश करनेवाला है। जो पुरुष आश्विनमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें महान् उपहार समर्पित करके इस लिंगका पूजन करता है, वह पापरहित हो उसी लोकमें जाता है, जहाँ इस समय महामुनि गौतम विराजमान हैं। कुन्तीनन्दन! इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य मैंने तुम्हें संक्षेपसे बताया है। जो यह सब सुनता है वह शुद्धचित्त हो जाता है। अब और क्या कहूँ?

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महीसागरसंगमकी श्रेष्ठता तथा उसके गुप्त-क्षेत्र होनेका कारण

अर्जुनने पूछा— नारदजी! इस तीर्थको गुप्तक्षेत्र क्यों कहते हैं? जिसका इतना महान् प्रभाव सुना गया है, वह गुप्त कैसे हुआ?

नारदजी बोले— अर्जुन! इस क्षेत्रके गुप्त होनेका जो कारण है उसके विषयमें एक बहुत प्राचीन कथा है, उसको श्रवण करो। यह क्षेत्र पूर्वकालमें शापवश गुप्त हो गया था। एक समय किसी निमित्तसे सब तीर्थोंके अधिदेवता एकत्र हो ब्रह्माजीको प्रणाम करनेके लिये उनकी सभामें गये। सब तीर्थोंको आया हुआ देखकर ब्रह्माजी अपने समस्त सभासदोंके साथ उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र आश्चर्यसे खिले हुए थे। भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर सब तीर्थोंको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'तीर्थवरो! आज आप सब लोगोंके पदार्पणसे पवित्र होकर हमारा स्थान सफल हो गया। हम सब देवता भी आपके दर्शनसे बहुत पवित्र हो गये। तीर्थोंका दर्शन, स्पर्श तथा स्नान सब परम कल्याणकारक है। बड़े-बड़े पापोंसे भरे हुए जो भयंकर एवं अत्यन्त निर्दय मनुष्य हैं, वे भी तीर्थमें पवित्र हो जाते हैं; फिर जो धर्मपरायण हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है?' यों कहकर ब्रह्माजीने अपने पुत्र पुलस्त्यको आज्ञा दी—'बेटा! तुम तीर्थोंके लिये शीघ्र ही अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजन करूँ। जब अर्घ्य देने योग्य असंख्य पुरुष एकत्र हो जायँ, तब पूजनकालमें उन सबमेंसे श्रेष्ठ एक पुरुषको एक अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।'

पिताकी यह आज्ञा पाकर पुलस्त्यजी बड़े वेगसे एक उत्तम अर्घ्यपात्र सजाकर ले आये। ब्रह्माजीने उसे हाथमें लेकर सब तीर्थोंसे कहा—'आप सब लोग मिलकर किसी एक मुख्य तीर्थका नाम बतलावें, मैं उसीको अर्घ्य देना चाहता हूँ। ऐसा करनेसे मुझे अन्यायरूपी दोष नहीं लगेगा।'

तीर्थ बोले— प्रभो! हम किसी प्रकार भी आपसमें श्रेष्ठताका निर्णय नहीं कर पाते। इसीलिये आपके पास आये हैं। आप ही हममेंसे जो श्रेष्ठ हो उसको समझकर अर्घ्य दे दीजिये।

ब्रह्माजी बोले— मैं आपलोगोंमेंसे किसी एककी श्रेष्ठताको नहीं समझ पाता। आपलोगोंको नमस्कार है। आप सभी अपार महिमासे सम्पन्न हैं। अतः स्वयं ही अपनेमेंसे श्रेष्ठ पुरुषको बतलावें।

ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर जब उनमेंसे कोई भी बहुत देरतक कुछ न बोला, तब महीसागरसंगम तीर्थने कहा—'चतुरानन! आप शीघ्र मुझे यह अर्घ्य प्रदान करें; क्योंकि दूसरा कोई भी तीर्थ मेरी करोड़वीं कलाके सामने भी पूरा नहीं पड़ता। पूर्वकालमें महाराज इन्द्रद्युम्नकी तपस्यासे तपकर यह सर्वतीर्थमयी समूची पृथ्वी ही मही नामवाली नदी हो गयी। वह सब तीर्थोंसहित मुझसे आकर मिली है, इसलिये मैं तीनों लोकोंमें सर्वतीर्थमय होकर प्रसिद्ध हूँ।'

तीर्थराज महीसागरसंगमके ऐसा कहनेपर अन्य सब तीर्थ मौन रहे। देखें ब्रह्माजी हमारे विषयमें क्या कहते हैं, यह सोचकर कोई कुछ न बोले।