भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१७

किया है, जो कि दर्शन करनेवाले मनुष्यके समस्त कलिकलुषका विनाश करनेवाला है। जो पुरुष आश्विनमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें महान् उपहार समर्पित करके इस लिंगका पूजन करता है, वह पापरहित हो उसी लोकमें जाता है, जहाँ इस समय महामुनि गौतम विराजमान हैं। कुन्तीनन्दन! इस गुप्तक्षेत्रका माहात्म्य मैंने तुम्हें संक्षेपसे बताया है। जो यह सब सुनता है वह शुद्धचित्त हो जाता है। अब और क्या कहूँ?

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महीसागरसंगमकी श्रेष्ठता तथा उसके गुप्त-क्षेत्र होनेका कारण

अर्जुनने पूछा— नारदजी! इस तीर्थको गुप्तक्षेत्र क्यों कहते हैं? जिसका इतना महान् प्रभाव सुना गया है, वह गुप्त कैसे हुआ?

नारदजी बोले— अर्जुन! इस क्षेत्रके गुप्त होनेका जो कारण है उसके विषयमें एक बहुत प्राचीन कथा है, उसको श्रवण करो। यह क्षेत्र पूर्वकालमें शापवश गुप्त हो गया था। एक समय किसी निमित्तसे सब तीर्थोंके अधिदेवता एकत्र हो ब्रह्माजीको प्रणाम करनेके लिये उनकी सभामें गये। सब तीर्थोंको आया हुआ देखकर ब्रह्माजी अपने समस्त सभासदोंके साथ उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र आश्चर्यसे खिले हुए थे। भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर सब तीर्थोंको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'तीर्थवरो! आज आप सब लोगोंके पदार्पणसे पवित्र होकर हमारा स्थान सफल हो गया। हम सब देवता भी आपके दर्शनसे बहुत पवित्र हो गये। तीर्थोंका दर्शन, स्पर्श तथा स्नान सब परम कल्याणकारक है। बड़े-बड़े पापोंसे भरे हुए जो भयंकर एवं अत्यन्त निर्दय मनुष्य हैं, वे भी तीर्थमें पवित्र हो जाते हैं; फिर जो धर्मपरायण हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है?' यों कहकर ब्रह्माजीने अपने पुत्र पुलस्त्यको आज्ञा दी—'बेटा! तुम तीर्थोंके लिये शीघ्र ही अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजन करूँ। जब अर्घ्य देने योग्य असंख्य पुरुष एकत्र हो जायँ, तब पूजनकालमें उन सबमेंसे श्रेष्ठ एक पुरुषको एक अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।'

पिताकी यह आज्ञा पाकर पुलस्त्यजी बड़े वेगसे एक उत्तम अर्घ्यपात्र सजाकर ले आये। ब्रह्माजीने उसे हाथमें लेकर सब तीर्थोंसे कहा—'आप सब लोग मिलकर किसी एक मुख्य तीर्थका नाम बतलावें, मैं उसीको अर्घ्य देना चाहता हूँ। ऐसा करनेसे मुझे अन्यायरूपी दोष नहीं लगेगा।'

तीर्थ बोले— प्रभो! हम किसी प्रकार भी आपसमें श्रेष्ठताका निर्णय नहीं कर पाते। इसीलिये आपके पास आये हैं। आप ही हममेंसे जो श्रेष्ठ हो उसको समझकर अर्घ्य दे दीजिये।

ब्रह्माजी बोले— मैं आपलोगोंमेंसे किसी एककी श्रेष्ठताको नहीं समझ पाता। आपलोगोंको नमस्कार है। आप सभी अपार महिमासे सम्पन्न हैं। अतः स्वयं ही अपनेमेंसे श्रेष्ठ पुरुषको बतलावें।

ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर जब उनमेंसे कोई भी बहुत देरतक कुछ न बोला, तब महीसागरसंगम तीर्थने कहा—'चतुरानन! आप शीघ्र मुझे यह अर्घ्य प्रदान करें; क्योंकि दूसरा कोई भी तीर्थ मेरी करोड़वीं कलाके सामने भी पूरा नहीं पड़ता। पूर्वकालमें महाराज इन्द्रद्युम्नकी तपस्यासे तपकर यह सर्वतीर्थमयी समूची पृथ्वी ही मही नामवाली नदी हो गयी। वह सब तीर्थोंसहित मुझसे आकर मिली है, इसलिये मैं तीनों लोकोंमें सर्वतीर्थमय होकर प्रसिद्ध हूँ।'

तीर्थराज महीसागरसंगमके ऐसा कहनेपर अन्य सब तीर्थ मौन रहे। देखें ब्रह्माजी हमारे विषयमें क्या कहते हैं, यह सोचकर कोई कुछ न बोले।

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तब ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र धर्मने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर इस प्रकार कहा—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, इस तीर्थराज महीसागरसंगमने मोहवश बड़ी कुत्सित बात कह डाली है। साधु पुरुषोंको उचित है कि वे अपनेमें अच्छे गुण होते हुए भी उनका अपने ही मुखसे बखान न करें। जो भरी सभामें दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपने गुणोंका वर्णन करता है, वह रजोगुणी, अहंकारी तथा निन्दित है। इसलिये यह तीर्थ इन सब गुणोंके रहते हुए भी अपने अहंकारके कारण विख्यात न होगा। इसका स्वरूप विध्वस्त-सा हो जायगा।'

धर्मदेवके ऐसा कहनेपर सब ओर हाहाकारका शब्द गूँज उठा। तब योगीश्वर स्कन्दजी तथा मैं दोनों शीघ्रतापूर्वक वहाँ जा पहुँचे। कार्तिकेयने उस देवसमाजमें धर्मसे इस प्रकार कहा—'धर्म! तुमने धृष्टताके कारण जो यह शाप दे डाला है, वह अनुचित ही हुआ है। कोई भी बतावे तो सही कि तीनों लोकोंमें विद्यमान समस्त तीर्थोंमेंसे कौन-सा ऐसा तीर्थ है, जिससे यह महीसागरसंगम अर्घ्य पानेका अधिकारी नहीं है? इस तीर्थराजने अपने जिस गुणका वर्णन किया है, वह सब इसमें मौजूद है। ऐसी दशामें कौन-सी बुराई हो गयी? क्योंकि अवगुण तो झूठ बोलनेमें है, सत्य कहनेमें नहीं! अहो! जो सबका पालन करनेवाले हैं, उनके द्वारा ऐसा बर्ताव होना कदापि उचित नहीं है। यदि वे भी विचार न करके ऐसे कार्य करेंगे तब प्रजा किसकी शरणमें जायगी।'

स्कन्द स्वामीके ऐसा कहनेपर धर्मने इस प्रकार उत्तर दिया—'आपका यह कहना ठीक है कि यह महीसागरसंगम सब तीर्थोंमें प्रधान होने और ब्रह्माजीसे अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य है, किंतु साधु पुरुषोंका यह सनातन नियम है कि अपने ही मुँहसे अपने गुणोंका बखान नहीं करना चाहिये। दूसरोंका किया हुआ आक्षेप और अपनी प्रशंसा—ये दो दोष ब्रह्माजीको भी अपने पदसे विचलित कर सकते हैं। दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपनी प्रशंसा करनेवाले राजा ययाति क्या स्वर्गसे नीचे नहीं गिर गये थे? बुद्धिमान् ईश्वरने पूर्वकालमें जो-जो बातें प्रमाणित कर दी हैं, उन सबका भलीभाँति पालन करना चाहिये। कौन विद्वान् उनका उल्लंघन कर सकता है? कार्तिकेयजी! आपके पिताने आदेश देकर जिस कार्यके लिये हमें नियुक्त किया है, हम सदा उसीका पालन करते हैं। आपको भी उसका पालन करना चाहिये।'

यों कहकर धर्म जब अपनी मुद्रा त्याग देनेको तैयार हो गये, तब मैंने उस प्रस्तावपर विचार करके यह बात कही—'विश्वको धारण करनेवाले परम महान् महात्मा धर्मको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी प्रतिदिन पूजा करते हैं, उन पापनाशी धर्मको नमस्कार है। धर्म! यदि कदाचित् आप मुद्रा त्याग देंगे तो हमलोगोंकी सत्ता कैसे रह सकती है? प्रभो! आप इस विश्वका नाश न कीजिये। योगीश्वर कार्तिकेयको आप सम्मान देने योग्य हैं। ये साक्षात् भगवान् शंकरके पुत्र हैं; अतः उन्हींकी भाँति हम सबके लिये

  • माहे‍श्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१९

माननीय हैं। मानद! आपने इस तीर्थराजको विख्यात न होनेका जो शाप दे दिया है, उसका निवारण करनेके लिये अनुग्रह कीजिये।'

मेरे ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा—धर्म! नारदने अच्छी बात कही है, तुम इनकी बात मानो। तब धर्मने कार्तिकेयजीसे कहा—'हमलोग जिसके किंकर हैं, उन परम सिद्ध कार्तिकेयजीको नमस्कार है। स्कन्द! मेरे नाथ! मेरी यह विनय ध्यान देकर सुनिये। स्तम्भ अर्थात् गर्वके कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध होगा तथापि शनिवारकी अमावास्याको महीसागरकी यात्रा करनेसे जो फल मिलेगा, उसपर ध्यान दीजिये—प्रभासकी दस बार, पुष्करकी सात बार और प्रयागकी आठ बार यात्रा करनेसे जो फल होता है वही फल इसकी एक बारकी यात्रासे प्राप्त होगा।'

इस प्रकार वरदान देनेपर कार्तिकेयजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजीने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भ तीर्थको अर्घ्य दिया और उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठता प्रदान की। फिर सब तीर्थों और स्कन्द स्वामीको सम्मान देकर विदा किया। इस तीर्थके गुप्त होनेका यही प्राचीन वृत्तान्त है। इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण तीर्थके महान् फलका वर्णन किया। यह सब आदिसे ही सुनकर पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

सूतजी कहते हैं—यह सब सुनकर विस्मयमें पड़े हुए अर्जुनने उस तीर्थकी बड़ी प्रशंसा की और नारद आदिसे विदा लेकर द्वारकाको प्रस्थान किया।


घटोत्कचका विवाह और बर्बरीकका जन्म

शौनकजी बोले—सूतजी! आपने गुप्तक्षेत्रके इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन, अनुपम तथा हर्षवर्धक माहात्म्यका वर्णन किया। यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्धमाताकी कृपासे उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की? यह सब यथार्थरूपसे कहिये।

उग्रश्रवा (सूतजी)-ने कहा—ब्रह्मन्! इस विषयमें मैं श्रीव्यासजीके मुखसे सुनी हुई कथा कहूँगा। पहलेकी बात है, पाण्डवोंने राजा द्रुपदकी पुत्री द्रौपदीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेवसे सुरक्षित होकर रहते थे। एक समय पाण्डव अपनी राजसभामें बैठकर नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे, इतनेहीमें भीमका पुत्र घटोत्कच वहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासनसे उठे और बड़ी प्रसन्नताके साथ सबने घटोत्कचको हृदयसे लगाया। भीमनन्दन घटोत्कचने भी अत्यन्त विनीतभावसे उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उसे अपनी गोदमें बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूँघते हुए सभामें इस प्रकार पूछा—'बेटा! कहाँसे आते हो? इतने दिनोंतक कहाँ विचरते रहे? हिडिम्बाकुमार! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओंका कोई अपराध तो नहीं करते हो? भगवान् श्रीकृष्णमें और हमलोगोंमें तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करनेवाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न?'

धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमारने कहा—महाराज! मेरे मामाके मारे जानेपर मैं उसीके राज्यसिंहासनपर बिठाया गया हूँ और दुष्टोंका दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशलसे हैं, वे इस समय दिव्य तपस्यामें लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है—'बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवोंमें भक्ति रखनेवाले बनो।' माताकी यह बात सुनकर

२२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मैं भक्तियुक्त चित्तसे आपको प्रणाम करनेके लिये ही मेरुगिरिके शिखरसे यहाँ आया हूँ। मेरी इच्छा है कि आपलोग मुझे किसी महान् कार्यमें नियुक्त करें। क्योंकि यही इस जीवनका महान् फल है कि पुत्र सदा अपने पितृवर्गकी आज्ञाका पालन करे। इससे वह पुण्यलोकोंपर विजय पाता है और इस संसारमें भी यशस्वी होता है।

घटोत्कचके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले—'बेटा! तुम्हीं हमारे भक्त और सहायक हो। हिडिम्बाकुमार! निश्चय ही जैसी माता होती है, वैसा ही उसका पुत्र भी होता है। तुम्हारी माता हमलोगोंके प्रति अविचल भक्ति रखनेवाली है, तुम भी ऐसे ही हो। अहो! मेरी प्यारी पतोहू हिडिम्बादेवी बड़ा कठिन कार्य कर रही है, जो कि अपने प्यारे पतिकी सेवाका सुख छोड़कर तपस्यामें ही संलग्न है।

इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—पुण्डरीकाक्ष! आप तो जानते ही हैं कि घटोत्कचका जन्म भीमसेनसे हुआ है। यह उत्पन्न होते ही तरुण हो गया था। श्रीकृष्ण! मैं चाहता हूँ, मेरे इस पुत्रको योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप सर्वज्ञ हैं, बताइये, इसके योग्य पत्नी कौन हो सकती है? धर्मराजके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने क्षणभर ध्यान करके उनसे कहा—'राजन्! मैं बतलाता हूँ, घटोत्कचके योग्य एक बड़ी सुन्दरी स्त्री है, जो इस समय प्राग्ज्योतिषपुरमें निवास करती है। अद्भुत पराक्रम करनेवाला जो मुर नामक दैत्य था, उसीकी वह पुत्री है। मुर दैत्य बड़ा भयंकर था और पाशमय दुर्गमें रहता था। वह मेरे हाथसे मारा गया। उसके मारे जानेपर उसकी पुत्री कामकंटकटा मुझसे युद्ध करनेके लिये आयी। वह अत्यन्त पराक्रमी होनेके कारण बड़ी भयानक जान पड़ती थी। तब खड्ग और खेटक धारण करनेवाली उस दैत्य-कन्याके साथ महासमरमें मैंने भी युद्ध आरम्भ किया। मेरे शार्ङ्ग नामक धनुषसे बड़े-बड़े बाण छूटने लगे, परंतु मुरकी पुत्रीने मेरे उन सभी बाणोंको खड्गसे ही काट डाला। तब मैंने उसका वध करनेके लिये अपना सुदर्शन चक्र उठाया। यह देख कामाख्या देवी मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली—'पुरुषोत्तम! आपको इसका वध नहीं करना चाहिये। मैंने स्वयं इसको खड्ग और खेटक प्रदान किये हैं, जो अजेय हैं।'

कामाख्या देवीकी यह बात सुनकर मैंने कहा—शुभे! मैं ही इस युद्धसे निवृत्त होता हूँ, तुम इस कन्याको मना करो। तब कामाख्या देवीने उसे हृदयसे लगाकर कहा—'भद्रे! तुम युद्धसे लौट चलो। ये माधव श्रीकृष्ण युद्धमें दुर्जय हैं। कोई किसी प्रकार भी संग्राममें इन्हें मार नहीं सकता। संसारमें ऐसा कोई वीर न तो हुआ है, न है और न होगा ही, जो इन्हें युद्धमें जीत सके। औरोंकी तो बात ही क्या है, साक्षात् भगवान् शंकर भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। बेटी! ये तुम्हारे भावी श्वशुर हैं; अतः तुम इन्हें प्रणाम करके युद्धसे हट जाओ। यही तुम्हारे लिये उचित होगा। तुम इनके भाई भीमसेनकी पुत्रवधू होओगी। इसलिये अपने श्वशुरके समान पूजनीय जनार्दनका तुम आदर करो। अब पिताके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। इन श्रीकृष्णके हाथसे जो तुम्हारे पिताकी मृत्यु हुई है, वह सर्वथा स्पृहणीय है; क्योंकि इनके हाथसे मरनेपर अब तुम्हारे पिता सब पातकोंसे मुक्त होकर विष्णुधाममें चले गये।' कामाख्याके ऐसा कहनेपर कामकंटकटाने क्रोध त्याग दिया और विनीत अंगोंसे मुझे प्रणाम किया। तब मैंने उसे आशीर्वाद देकर कहा—'बेटी! तुम भगदत्तसे सम्मानित होकर इसी नगरमें निवास करो। यहाँ रहती हुई ही तुम वीर हिडिम्बाकुमारको पतिरूपमें प्राप्त करोगी।' इस प्रकार आश्वासन देकर मैंने कामाख्या देवी तथा मौर्वी (मुरपुत्री)—को विदा किया। फिर वहाँसे

मुर-कन्याको न मारनेके लिये श्रीकृष्णसे कामाख्याका अनुरोध

२२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

द्वारका होता हुआ मैं यहाँ आकर आपसे मिला हूँ। अतः वह मुरदैत्यकी सुन्दरी कन्या ही घटोत्कचके लिये योग्य स्त्री है। मैं श्वशुर हूँ, इसलिये मेरे द्वारा उसके रूपका वर्णन करना उचित न होगा। साधु पुरुषके लिये यह कदापि उचित नहीं है कि वह स्त्रियोंके रूप-सौन्दर्यका वर्णन करे। एक बात और सुन लीजिये। उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जो मुझे किसी प्रश्नपर निरुत्तर करके जीत ले तथा जो मेरे समान ही बलवान् हो, वही मेरा पति होगा। उसकी यह प्रतिज्ञा सुनकर बहुत-से दैत्य तथा राक्षस उसे जीतनेके लिये गये किंतु मौर्वीने उन सबको परास्त करके मार डाला। यदि महापराक्रमी घटोत्कच ऐसी मौर्वीको जीतनेका उत्साह रखता हो तो वह अवश्य ही इसकी पत्नी होगी।'

युधिष्ठिर बोले-प्रभो! उसके सब गुणोंसे क्या लाभ है, जब उसमें यह एक ही महान् अवगुण भरा हुआ है। उस दूधको लेकर क्या किया जायगा जिसमें विष मिला दिया गया हो। अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारे भीमसेनकुमारको केवल साहसके भरोसे कैसे इस संकटमें डाल दें? यह बेचारा तो शुद्ध वाक्य भी बोलना नहीं जानता। जनार्दन ! देश-देशमें और भी तो बहुत-सी स्त्रियाँ हैं, उन्हींमेंसे किसी उत्तम स्त्रीको बतलाइये।

भीमसेन बोले- भगवान् श्रीकृष्णने जो बात कही है, वह अनेक प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली, सत्य और उत्तम है। मेरा विश्वास है, घटोत्कच शीघ्र ही मौर्वीको प्राप्त करेगा।

अर्जुन बोले- कामाख्या देवीने मौर्वीसे कहा है, 'भद्रे ! भीमसेनका पुत्र तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा।' इस कारण मेरी राय यही है कि घटोत्कच शीघ्र वहाँ जाय।

श्रीभगवान् बोले- अर्जुन ! मुझको तुम्हारी और भीमकी बात पसंद है। हिडिम्बाकुमार ! बोलो तुम्हारी क्या राय है?

घटोत्कचने कहा-पूजनीय पुरुषोंके आगे अपने गुणोंका वर्णन करना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणें और उत्तम गुण व्यवहारमें आकर ही प्रकाशित होते हैं। मैं सर्वथा ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे मेरे निर्मल पिता पाण्डव मुझ पुत्रके कारण सत्पुरुषोंकी सभामें लज्जित न हों।

यों कहकर महाबाहु घटोत्कचने उन सबको प्रणाम किया। फिर पितरोंसे विजयका आशीर्वाद पाकर उत्साहसम्पन्न हो वहाँसे जानेका विचार किया। उस समय भगवान् जनार्दनने उसकी प्रशंसा करके कहा- 'बेटा ! कथा कहते समय विजयकी प्राप्ति करानेवाले मुझ श्रीकृष्णका स्मरण अवश्य कर लेना, जिससे मैं तुम्हारी दुर्भेद्य बुद्धिको अविलम्ब बढ़ा दूँगा।' ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उसे हृदयसे लगाया और आशीर्वाद देकर विदा किया। तदनन्तर हिडिम्बाकुमार महापराक्रमी घटोत्कच सूर्याक्ष, बालाख्य और महोदर- इन तीन सेवकोंके साथ आकाशमार्गसे चला और दिन बीतते-बीतते प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचा।

वहाँ जानेपर घटोत्कचने प्राग्ज्योतिषपुरसे बाहर एक सोनेका सुन्दर भवन देखा, जो एक विशाल वाटिकामें शोभा पा रहा था। उसकी ऊँचाई एक हजार मंजिलकी थी। मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होनेवाले उस भवनके पास पहुँचकर घटोत्कचने देखा-दरवाजेपर एक सखी खड़ी है। उसका नाम 'कर्णप्रावरणा' था। वीर हिडिम्बाकुमारने सरस भाषामें उससे पूछा- 'कल्याणी ! मुरकी पुत्री कहाँ हैं? मैं दूर देशसे आया हुआ उनकी कामना करनेवाला अतिथि हूँ और उन्हें देखना चाहता हूँ।'

भीमसेनकुमारकी यह बात सुनकर वह निशाचरी लड़खड़ाती हुई दौड़ी और महलकी छतपर बैठी हुई मौर्वीके पास जाकर इस प्रकार बोली- 'देवि ! कोई सुन्दर तरुण कामका अतिथि होकर तुम्हारे द्वारपर खड़ा है। उसके समान सुन्दर

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कान्तिवाला पुरुष कोई त्रिलोकीमें भी नहीं होगा। अतः अब उसके लिये क्या कर्तव्य है, यह आज्ञा दीजिये।'

कामकटंकटा बोली—अरी! उन्हें शीघ्र ले आ, क्यों विलम्ब करती है? कदाचित् दैवकी सहायतासे उन्हींके द्वारा मेरी प्रतिज्ञाकी पूर्ति हो जाय।

मौर्वीके ऐसा कहनेपर दासीने घटोत्कचके पास जाकर कहा—कामी पुरुष! उस मृत्युरूपा नारीके समीप शीघ्र जाओ। उसके ऐसा कहनेपर हँसते हुए घटोत्कचने वहींपर अपना धनुष छोड़कर घरके भीतर प्रवेश किया और विद्युत्की भाँति प्रकाशित होनेवाली उस दैत्य-कन्याको देखकर इस प्रकार सोचा—'अहो! मेरे पितृस्वरूप श्रीकृष्णने मेरे लिये योग्य स्त्रीको ही बतलाया है।' इस प्रकार विचार करते हुए उसने मौर्वीसे कहा—'ओ वज्रके समान कठोर हृदयवाली निष्ठुर नारी! मैं अतिथि होकर तुम्हारे घर आया हूँ। अतः सत्पुरुषोंके लिये जो उचित स्वागत-सत्कार है, वह अपने हार्दिक भावके अनुसार करो।' हिडिम्बाकुमारका यह वचन सुनकर कामकटंकटा उसके रूपसे विस्मित हो अपनी निन्दा करके इस प्रकार बोली—'भद्रपुरुष! तुम व्यर्थ ही यहाँ चले आये। जीते-जी पुनः सुखपूर्वक लौट जाओ, अथवा यदि मुझे चाहते हो तो शीघ्र कोई कथा कहो। कथा कहकर यदि मुझे सन्देहमें डाल दोगे तो मैं तुम्हारे वशमें हो जाऊँगी। उसके बाद मेरे द्वारा तुम्हारी सेवा होगी।'

उसके ऐसा कहनेपर घटोत्कचने यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनकी कथा है, उन भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करके कथा प्रारम्भ की। 'मान लो किसी पत्नीके गर्भसे कोई बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होनेपर बड़ा अजितेन्द्रिय निकला। उस युवकके एक पुत्री हुई तथा उसकी पत्नी मर गयी। तब पिताने ही उस नन्ही-सी पुत्रीकी रक्षा एवं पालन-पोषण किया। वह कन्या जब जवान हुई और उसके सब अंग विकसित हो गये, तब उसके पिताका मन उसके प्रति कामलोलुप हो उठा। तदनन्तर उस पापीने अपनी ही पुत्रीसे कहा—'प्रिये! तुम मेरे पड़ोसीकी लड़की हो। मैंने तुम्हें अपनी पत्नी बनानेके लिये यहाँ लाकर दीर्घकालतक पालन-पोषण किया है। अतः अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।' उसके ऐसा कहनेपर उस लड़कीने ऐसा ही माना। उसने इसे पतिरूपमें स्वीकार किया और इसने उसे पत्नीरूपमें। तत्पश्चात् उस कामी गदहेसे एक कन्या उत्पन्न हुई। अब बताओ, वह कन्या उसकी क्या लगेगी—पुत्री अथवा दौहित्री?' यदि तुममें शक्ति है, तो मेरे इस प्रश्नका शीघ्र उत्तर दो।'

यह प्रश्न सुनकर मौर्वीने अपने हृदयमें अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किसी प्रकार उसे इस प्रश्नका निर्णय नहीं सूझता था। तब उस प्रश्नसे परास्त होकर मौर्वीने अपनी शक्तिका उपयोग किया। वह ज्यों ही झूलेसे सहसा उठकर हाथमें तलवार लेना चाहती थी त्यों ही घटोत्कचने बड़े वेगसे पहुँचकर बायें हाथसे उसके केश पकड़ लिये और धरतीपर गिरा दिया। फिर उसके गलेपर बायाँ पैर रखकर दाहिने हाथमें कतरनी ले, उसकी नाक काट लेनेका विचार किया। मौर्वीने बहुत हाथ-पैर मारे, किंतु अन्तमें शिथिल होकर उसने मन्द स्वरमें कहा—'नाथ! मैं तुम्हारे प्रश्नसे और शक्ति तथा बलसे परास्त हो गयी हूँ। तुम्हें नमस्कार है। अब मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हारी दासी हूँ। जो आज्ञा दो वही करूँगी।'

घटोत्कचने कहा—यदि ऐसी बात है तो लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया।

घटोत्कचके यों कहकर छोड़ देनेपर कामकटंकटाने पुनः उसे प्रणाम किया और कहा—'महाबाहो! मैं जानती हूँ, तुम बड़े वीर हो। त्रिलोकीमें कहीं भी तुम्हारे पराक्रमकी तुलना नहीं है। तुम इस पृथ्वीपर साठ करोड़ राक्षसोंके स्वामी हो।

२२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ये बातें मुझे कामाख्या देवीने बतलायी थीं, वे सब आज याद आ रही हैं। मैंने अपने सेवकों तथा इस शरीरके साथ यह सारा घर तुम्हारे चरणोंमें समर्पित कर दिया। प्राणनाथ! आज्ञा दो, मैं तुम्हारे किस आदेशका पालन करूँ?'

घटोत्कचने कहा—मौर्वी! जिसके पिता और भाई-बन्धु मौजूद हैं, उसका विवाह छिपकर हो, यह किसी प्रकार उचित नहीं है। इसलिये अब तुम शीघ्र मुझे इन्द्रप्रस्थ ले चलो। यही हमारे कुलकी परिपाटी है। इन्द्रप्रस्थमें गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर मैं तुमसे विवाह करूँगा। तदनन्तर मौर्वी अनेक प्रकारकी सामग्री साथ ले घटोत्कचको अपनी पीठपर बैठाकर इन्द्रप्रस्थमें आयी। भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवोंने घटोत्कचका अभिनन्दन किया, उसके बाद शुभलग्नमें भीमकुमारने मौर्वीका पाणिग्रहण किया। कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही वधूको देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। विवाह-सम्बन्ध हो जानेपर राजा युधिष्ठिरने घटोत्कचका आदर-सत्कार करके उसे पत्नीसहित अपने राज्यको जानेका आदेश दिया। महाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके हिडिम्बाकुमार अपनी राजधानी हिडम्ब-वनको चला गया। वहाँ उसने मौर्वीके साथ बहुत दिनोंतक क्रीड़ा की। तदनन्तर समयानुसार उसके गर्भसे एक महातेजस्वी एवं बालसूर्यके समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही युवावस्थाको प्राप्त हो गया। उसने माता-पितासे कहा—'मैं आप दोनोंको प्रणाम करता हूँ, बालकके आदिगुरु माता-पिता ही हैं। अतः आप दोनोंके दिये हुए नामको मैं ग्रहण करना चाहता हूँ।' तब घटोत्कचने अपने पुत्रको छातीसे लगाकर कहा—'बेटा! तुम्हारे केश बर्बराकार (घुँघराले) हैं, इसलिये तुम्हारा नाम 'बर्बरीक' होगा। महाबाहो! तुम अपने कुलका आनन्द बढ़ानेवाले होओगे। तुम्हारे लिये जो परम कल्याणमय वस्तु है, उसको हमलोग द्वारकापुरी चलकर यदुकुलनाथ भगवान् वासुदेवसे पूछेंगे।'


बर्बरीक और विजयकी गुप्तक्षेत्रमें साधना तथा पाण्डवोंसे बर्बरीककी भेंट

तदनन्तर कामकटंकटाको घरपर ही छोड़कर बुद्धिमान् घटोत्कच अपने पुत्रको साथ ले आकाशमार्गसे द्वारकाको गया। वहाँ यादवोंकी सभामें पहुँचकर उसने उग्रसेन, वसुदेव, सात्यकि, अक्रूर, बलराम तथा श्रीकृष्ण आदि प्रधान-प्रधान यदुवीरोंको प्रणाम किया। पुत्रसहित घटोत्कचको अपने चरणोंमें पड़ा देख भगवान् श्रीकृष्णने उसको और उसके पुत्रको भी उठाकर छातीसे लगा लिया और आशीर्वाद दे अपने समीप बिठाकर इस प्रकार पूछा—'बेटा! कुरुवंशको बढ़ानेवाले राक्षसश्रेष्ठ! बतलाओ, तुम्हें सब ओरसे कुशल तो है न? यहाँ किसलिये तुम्हारा आगमन हुआ है?'

घटोत्कच बोला—देव! आपके प्रसादसे मुझे सब ओरसे कुशल ही है। आपकी बतायी हुई स्त्री मौर्वीके गर्भसे मेरे इस पुत्रका जन्म हुआ है, यह आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा; उसे सुनिये। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ।

श्रीभगवान्ने कहा—बेटा मौर्वेय! तुम्हें जो-जो पूछनेकी इच्छा हो, सब पूछ लो।

बर्बरीक बोला—आर्यदेव माधव! मैं मन, बुद्धि और समाधिके द्वारा आपको प्रणाम करके

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *२२५

यह पूछता हूँ कि संसारमें उत्पन्न हुए जीवका

कल्याण किस साधनसे होता है? कोई धर्मको कल्याणकारक कहते हैं तो कोई ऐश्वर्यदानको। कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम)-को, कोई तपस्याको, कोई द्रव्यको, कोई भोगोंको तथा कोई मोक्षको ही श्रेय कहते हैं। पुरुषोत्तम! इस प्रकार सैकड़ों श्रेयोंमेंसे किसी एक श्रेयको निश्चित करके बतलाइये जो मेरे इस कुलके लिये कल्याणकारी हो।

श्रीभगवान् बोले—बेटा! प्रत्येक वर्णके लिये पृथक्-पृथक् उत्तम श्रेय बताया गया है। ब्राह्मणोंके कल्याणका मूल है—तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय। मनीषी पुरुषोंने धर्मके स्वरूपका निरूपण भी ब्राह्मणोंके लिये कल्याणकी बात बतायी है। क्षत्रियोंके लिये सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बतायी गयी है। दुष्टोंका दमन और साधुओंका संरक्षण भी क्षत्रियोंके लिये श्रेयस्कर है। वैश्योंके श्रेयका साधन है—पशुपालन और कृषिविज्ञान। शूद्रके लिये द्विजोंकी सेवा ही श्रेयस्कर है, उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला शूद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँतिके शिल्पकर्मोंद्वारा जीविका चलावे और द्विजातियोंके हितमें लगा रहे। तुम क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो। पहले तुम ऐसे बलकी प्राप्तिके लिये साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बलसे दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन करो। ऐसा करनेसे तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी। बेटा! देवियोंकी अत्यन्त कृपा होनेसे ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करनेके उद्देश्यसे देवीकी आराधना करो।

बर्बरीकने पूछा—प्रभो! मैं किस क्षेत्रमें, किस देवीकी, कैसे आराधना करूँ?

उसके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् दामोदरने क्षणभर ध्यान करके कहा—महीसागरसंगम तीर्थमें, जो गुप्तक्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहीं नारदजीद्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएँ निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो। बर्बरीकसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे कहा—'भीमनन्दन! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदयवाला है, इसलिये मैंने इसे 'सुहृदय' यह दूसरा नाम प्रदान किया है।' यों कहकर भगवान्ने उसे छातीसे लगा लिया और नाना प्रकारके धनसे उसको सन्तुष्ट करके गुप्तक्षेत्रमें जानेका आदेश दिया। तब भगवान् श्रीकृष्णको, अपने पिता घटोत्कचको और वहाँ बैठे हुए सब यादवोंको प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्तक्षेत्रको चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्णसे विदा ले अपने वनको गया और पुत्रके गुणोंका स्मरण करता हुआ अपने राज्यका पालन करने लगा।

तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्तक्षेत्रमें रहकर प्रतिदिन कर्मके द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकारके उपहारोंसे तीनों समय देवियोंकी पूजा करने लगा। तीन वर्षोंतक आराधना करनेपर देवियाँ उसपर बहुत सन्तुष्ट हुईं और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों

२२६

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लोकोंमें किसीके पास नहीं है। तत्पश्चात् वे बोलीं—'महाद्युते! कुछ कालतक तुम यहीं निवास करो। फिर विजयकी संगति पाकर तुम अधिक कल्याणके भागी होओगे।' देवियोंके ऐसा कहनेपर सुहृदय वहीं ठहर गया। तदनन्तर मगधदेशके ब्राह्मण विजय वहाँ आये। उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिंगोंका पूजन किया और अपनी विद्याको सफल बनानेके लिये चिरकालतक देवियोंकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर देवियोंने स्वप्नमें यह आदेश दिया—'ब्रह्मन्! तुम आँगनमें सिद्धमाताके आगे सम्पूर्ण विद्याओंका साधन करो। सुहृदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।' यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियोंको प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदयसे कहा—'तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवीके स्तोत्रका पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जबतक मैं यह विद्या-साधनरूप कर्म करूँ तबतक किसी प्रकारका विघ्न न आने पावे।'

विजयके ऐसा कहनेपर महाबली बर्बरीक जब विघ्ननिवारणके लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजयने सुखपूर्वक आसनपर बैठकर 'गुं गुरुभ्यो नमः' इस मन्त्रसे गुरुओंको नमस्कार किया। उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्रका अष्टोत्तरशत जप करके पुनः गुरुजनोंको प्रणाम करनेके पश्चात् गणेश्वर-विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपतिके उस उत्तम मन्त्रका वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होनेपर भी समस्त कार्योंका साधक, महान् प्रयोजनोंकी प्राप्ति करानेवाला तथा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। 'ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः' यह सात अक्षरोंका मन्त्र है। मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार है—'ॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिर्विघ्नेश्वरो देवता गं बीजम् ॐ शक्तिः पूजार्थे जपार्थे तिलकार्थे वा मनईप्सितार्थे होमार्थे वा विनियोगः।' अर्थात् इस गणपति-मन्त्रके गण नामक ऋषि, विघ्नेश्वर देवता, गं बीज और ॐ शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथसिद्धि अथवा होमके लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्रसे चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्रका जप करे। अष्टोत्तरशत, सहस्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवनके लिये अग्निदेवका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् 'गं गणपतये स्वाहा' इस मन्त्रसे गुग्गुलकी गोलियोंद्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विघ्नोंमें इस उत्तम मन्त्रका साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोऽभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वरकल्पको जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तरशत जप करके गुग्गुलकी गुटिकाओंद्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि-विनायकका पूजन किया। इसके बाद सिद्धाम्बिकाको नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्याका साधनसहित जप किया, जिसके स्मरणमात्रसे सब दुःखोंका नाश हो जाता है। विप्रवर! मैं उस विद्याका वर्णन करता हूँ, सुनो—

ॐ भगवान् वासुदेवको नमस्कार है; सहस्र मस्तकोंवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है; जो क्षीरसमुद्रमें शयन करते हैं, शेषनागका विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं; जिन्होंने हयग्रीवरूप धारण किया है; उन्हीं भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नृसिंह! वामन! त्रिविक्रम! तथा वरदायक राम! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन! महावराह! महापुरुष! वैकुण्ठ! नारायण! पद्मनाभ! गोविन्द! दामोदर! हृषीकेश! समस्त असुरोंका संहार करनेवाले! सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें रखनेवाले! सब दुःखोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण विपत्तियोंका भंजन करनेवाले! सब नागोंका मान मर्दन करनेवाले! सर्वदेव महेश्वर! सबका बन्धन छुड़ानेवाले! सब

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २२७

शत्रुओंका संहार करनेवाले! समस्त ज्वरोंका नाश करनेवाले! सम्पूर्ण ग्रहोंका निवारण तथा सब पापोंका शमन करनेवाले! भक्तजन-आनन्ददायक! जनार्दन! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्यका भाग समर्पित है।

जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है उसे वायु, अग्नि, वज्र, पत्थर, बिजली और वर्षाका भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्रसे, ग्रहोंसे तथा चोरोंसे भी भय नहीं रहता है। इस प्रकार विजयने संयमशील होकर मन, बुद्धि और समाधिके द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्याका साधन आरम्भ किया। जो बिना साधनके भी प्रतिदिन इस विद्याका पाठ करता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

विजय साधनमें लगे थे। उस समय रात्रिके पहले पहरमें एक राक्षसीने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीकने उस राक्षसीको भगा दिया। तत्पश्चात् आधी रातमें दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ; बर्बरीकने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नामका एक दानव विजयकी ओर दौड़ा। उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखोंसे अग्निकी बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेगसे आगे बढ़ा। दोनों बहुत देरतक स्थिरतापूर्वक युद्ध करते रहे। फिर बर्बरीकने उसे भूमिपर गिराकर खूब रगड़ा और तबतक नहीं छोड़ा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरनेपर उसे अग्निकोणमें महीसागरसंगमके तटपर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुनः विजयकी रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे पहरमें पश्चिम दिशाकी ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी। वह बड़े जोर-जोरसे गर्जना करती और अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाती हुई चलती थी; उसका नाम 'द्रुहद्रुहा' था। उसे आती देख सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेगसे उसके समीप पहुँचा। उसने हँसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक्केसे मारकर राक्षसीको धरतीपर गिरा दिया। उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुनः रक्षाके लिये खड़ा हो गया। तदनन्तर चौथे पहरमें एक अद्भुत नकली संन्यासी मूड मुड़ाये दिगम्बरवेशमें वहाँ आया। उसने बड़ा भारी व्रती होनेका ढोंग रच रखा था। उसने आते ही कहा—'हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्टकी बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रखी है? आगमें हवन करते समय सूक्ष्म जीवोंका बड़ा भारी वध हो रहा है।' उसकी यह बात सुनकर बर्बरीकने हँसते हुए कहा—'अग्निमें आहुति देनेपर सब देवताओंकी तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्डका पात्र है।' यों कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास जाकर खड़ा हो गया और मुक्केसे मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तवमें वह एक दैत्य था। क्षणभरमें सचेत होनेपर वह बर्बरीकके भयसे भागा और एक गुफाके बिलमें समा गया। बर्बरीकने क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे उसका पीछा किया, किन्तु वह दैत्य वायुके समान वेगसे दौड़ता पातालमें समा गया। साठ योजन विस्तृत 'बहुप्रभा' नामकी नगरीमें वह निवास करता था। बर्बरीक वहाँ भी उसके पीछे-पीछे जा पहुँचा। उसे देखकर 'पलाशी' नामवाले दैत्योंमें 'दौड़ो, मारो, काटो और फाड़ डालो' आदिके रूपमें महान् कोलाहल मच गया। हल्ला सुनकर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक दैत्य योद्धा वीर बर्बरीकपर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों

२२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दैत्योंको देखकर घटोत्कचका पुत्र क्रोधसे जल उठा। उसने किन्हींको पैरोंसे, किन्हींको भुजदण्डोंसे और किन्हींको छातीके धक्केसे मार-मारकर क्षणभरमें यमलोक पहुँचा दिया।

दैत्योंके मारे जानेपर वासुकि आदि नाग वहाँ आये और नाना प्रकारके प्रिय वचनोंद्वारा सुहृदयकी स्तुति करते हुए बोले—'भैमिनन्दन! आपने नागोंका बड़ा भारी उपकार किया, क्योंकि आपके द्वारा यह पलाशी नामक दैत्य अपने सेवकोंसहित मारा गया। वीर! इस दुरात्माने अपने सेवकोंकी सहायतासे भाँति-भाँतिके उपाय करके हमलोगोंको पीड़ा दी और पातालसे भी नीचे कर दिया था। आज आप हम नागोंसे कोई मनोवांछित वर माँगिये। हम सब आपपर प्रसन्न होकर वर देनेको उत्सुक हैं।'

बर्बरीक बोला—नागगण! यदि मुझे वर देना है, तो मैं यही माँगता हूँ कि विजय सब प्रकारके विघ्नोंसे मुक्त होकर सिद्धि प्राप्त कर लें।

तब नागोंने प्रसन्न होकर कहा—बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। बर्बरीक नागोंको वह दैत्यपुरी देकर उनके द्वारा सम्मानित हो वहाँसे लौटा। बिलके मनोहर मार्गसे लौटते समय उसने देखा, कल्पवृक्षके नीचे एक सर्वरत्नमय लिंग विराजमान है; उसका महान् प्रकाश सब ओर फैल रहा है तथा बहुत-सी नागकन्याएँ उसका पूजन कर रही हैं। यह सब देखकर बर्बरीकको बड़ा विस्मय हुआ! उसने नागकन्याओंसे पूछा—'सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी इस शिवलिंगकी किसने स्थापना की है? तथा इस शिवलिंगसे चारों दिशाओंकी ओर जो ये मार्ग गये हैं, इनका भी परिचय दो।'

वीर बर्बरीकका यह वचन सुनकर नागकन्याओंने सकुचाते हुए कहा—सम्पूर्ण नागोंके राजा महात्मा शेषने तपस्या करके यहाँ इस महालिंगकी स्थापना की है। इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे यह सब सिद्धियोंको देनेवाला है। इस लिंगसे पूर्वदिशाकी ओर जानेवाला यह मार्ग भूलोकमें 'श्री' पर्वततक चला गया है। नागलोक सुविधापूर्वक वहाँतक पहुँच सकें, इसके लिये 'इलापत्र' नागने इस मार्गका निर्माण किया है। दक्षिणसे जानेवाला यह मार्ग पृथ्वीपर 'शूर्पारक' क्षेत्रमें पहुँचता है, इसे 'कर्कोटक' नागने वहाँ जानेके लिये बनवाया है। पश्चिमका यह मार्ग अतिशय प्रकाशमान 'प्रभास' तीर्थको जाता है, इसे ऐरावतने नागोंकी यात्राके लिये बनवाया है। इसी प्रकार उत्तरसे होकर निकला हुआ यह मार्ग पृथ्वीपर 'कुरुक्षेत्र' में जाता है, महात्मा तक्षकने वहाँ जानेके लिये यह मार्ग तैयार किया है। लिंगसे ऊपरकी ओर जो मार्ग जाता है, जिससे जानेके लिये आप खड़े हैं; यह गुप्तक्षेत्रमें सिद्धलिंगके पास गया है। यह मार्ग स्वामी स्कन्दने अपनी शक्तिके प्रहारसे बनाया है। वीर! ये सब बातें हमने बता दीं, अब आप हमारा निवेदन सुनिये। पहले तो यह बताइये कि आप कौन हैं? अभी-अभी आप दैत्यके पीछे लगे गये थे और अब अकेले ही लौट रहे हैं; इसका क्या कारण है,

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २२९


हम सब आपकी दासियाँ हैं और पतिरूपमें आपका वरण करती हैं। आप हमारे साथ यहाँके विविध स्थानोंमें क्रीडा कीजिये।

बर्बरीकने कहा—देवियो! मेरा जन्म कुरुवंशमें हुआ है। मैं पाण्डुनन्दन भीमसेनका पौत्र हूँ। बर्बरीक मेरा नाम है। मैं उस दैत्यको मारनेके लिये आया था। वह पापी दैत्य मारा गया; अतः अब पृथ्वीपर लौटा जा रहा हूँ। आप लोगोंसे किसी प्रकार मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैंने सदा ब्रह्मचारी रहनेका व्रत लिया है।

यों कहकर बर्बरीकने उस शिवलिंगका पूजन और साष्टांग प्रणाम किया। फिर उन सब कन्याओंके देखते-देखते ऊपरके मार्गसे चल दिया। बिलसे बाहर आकर उसने पूर्वदिशाके मुखको प्रकाशयुक्त देखा, फिर बड़े हर्षके साथ वह विजयसे मिला। उस समयतक विजय अपना सब कार्य पूरा कर चुके थे। उन्होंने बर्बरीकसे कहा—'वीरेन्द्र! तुम्हारे प्रसादसे मैंने अनुपम सिद्धि प्राप्त की है। तुम दीर्घकालतक जीओ, आनन्द करो, दान दो और विजयी बनो। इसीलिये साधु पुरुष साधुओंका ही संग करना चाहते हैं, क्योंकि सत्पुरुषोंका संग सब दोषोंको दूर करनेकी दवा है। मेरे होमकुण्डमें सिन्दूरके समान लाल रंगका सात्त्विक एवं अत्यन्त पवित्र भस्म है, उसे हाथमें भरकर ले लो। युद्धभूमिमें इसे पहले छोड़ देनेपर शत्रुके स्थानपर मृत्यु भी हो, (साक्षात् मृत्यु ही शत्रु बन कर आ जाय) तो उसके शरीरको भी यह नष्ट कर देगा। इस प्रकार शत्रुओंपर तुम्हें सुखपूर्वक विजय प्राप्त होगी।'

बर्बरीक बोला—जो निष्काम भावसे किसीका उपकार करता है, वही साधु कहलाता है। जो किसी वस्तुकी इच्छा रखकर उपकार करता है, उसकी साधुतामें कौन गुण है।* अतः यह भस्म किसी दूसरेको दे दीजिये। मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपको प्रसन्नमुख देखना चाहता हूँ, इसके सिवा और कुछ नहीं।

तदनन्तर देवियोंसहित देवताओंने विजयका सम्मान करके उन्हें सिद्धैश्वर्य प्रदान किया और उनका नाम 'सिद्धसेन' रखा। इस प्रकार विजयने अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की।

तत्पश्चात् कुछ काल बीतनेपर पाण्डवलोग जूएममें हार गये और विभिन्न तीर्थोंमें घूमते हुए उस शुभ तीर्थमें भी स्नानके लिये आये। वहाँ चण्डिका देवीका दर्शन करके मार्गके थके-माँदे होनेके कारण कहीं बैठ गये। पाँचों पाण्डवोंके साथ द्रौपदी भी थी। उस समय चण्डिकाका गण भी वहीं विराजमान था। बर्बरीकने वहाँ पधारे हुए पाण्डव वीरोंको देखा, परंतु वह उन्हें पहचानता नहीं था। पाण्डव भी उसे नहीं पहचानते थे; क्योंकि जन्मसे लेकर अबतक पाण्डवोंके साथ उसकी भेंट ही नहीं हुई थी।


* उपकुर्यान्निराकाङ्क्षो यः स साधुरितीर्यते। साकाङ्क्षमुपकुर्याद्यः साधुत्वे तस्य को गुणः॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ५९।८०)

२३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पाण्डवोंने अपनी गठरी आदि वहीं खोल दी और प्याससे पीड़ित होकर जलकी ओर देखा। तब भीमसेन कुण्डमें पानी पीनेके लिये घुसे। उस समय युधिष्ठिरने उनसे कहा—'भीमसेन! तुम कुण्डसे पानी निकालकर बाहर ही हाथ-पैर धो लो, उसके बाद जल पीना; अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा।' भीमसेनके नेत्र प्याससे व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिरकी बातें बिना सुने ही जल पीनेकी इच्छासे कुण्डमें प्रवेश किया। जल देखकर उन्होंने वहीं पीनेका निश्चय किया और शुद्धिके लिये मुख, दोनों हाथ और दोनों पैर धोये। भीमसेन जब इस प्रकार पैर धो रहे थे, उस समय सुहृदयने ऊपरसे यह सत्य वचन कहा—'ओ दुर्मते! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारा विचार तो बड़ा पापपूर्ण है। अहो! तुम देवीके कुण्डमें हाथ, पैर और मुँह धो रहे हो। मैं देवीको सदा इसी जलसे स्नान कराता हूँ। मलसे दूषित जलको तो मनुष्य भी नहीं छूते, फिर देवता उसका स्पर्श कैसे कर सकते हैं? जब तुम इतने बड़े मूढ़ हो, तब तीर्थोंमें क्यों घूम रहे हो?'

भीमसेनने कहा—क्रूर राक्षसाधम! तू क्यों ऐसी कठोर बातें कहता है? जलका दूसरा उपयोग ही क्या है? वह प्राणियोंके भोगके लिये ही तो होता है? बड़े-बड़े मुनीश्वरोंने भी तीर्थोंमें स्नानका विधान किया है। अंगोंको धोना ही तो स्नान कहा गया है। फिर तू मेरी निन्दा क्यों करता है? यदि स्नान और अंग-प्रक्षालन न किया जाय तो धर्मात्मा पुरुष किसलिये पूर्त धर्मका अनुष्ठान करते हैं? क्यों बावड़ी, कूप और तड़ाग आदि बनवाते हैं?

सुहृदय बोला—निःसन्देह तुम्हारा यह कथन सत्य है कि मुख्य-मुख्य तीर्थोंमें स्नान करना चाहिये। ऐसी विधि है भी, परंतु जो नदी आदि चर तीर्थ हैं—जिनके जल बहते रहते हैं, उन्हींमें भीतर प्रवेश करके स्नान आदि करना चाहिये। कूप-सरोवर आदि स्थावर तीर्थोंमें तो बाहर खड़े होकर ही स्नानादि करना उचित है। स्थावर तीर्थोंमें भी वहीं भीतर प्रवेश करके स्नान करनेका विधान है, जहाँ भक्त पुरुष देवताको स्नान करानेके लिये जल न लेते हों तथा जो सरोवर देवस्थानसे सौ हाथसे भी अधिक दूर बनाया गया हो। उसके भीतर प्रवेश करनेका भी यह एक क्रम है कि पहले बाहर ही दोनों पैर धोकर फिर कुण्डमें स्नान किया जाय, अन्यथा दोष बताया गया है।१ क्या तुमने ब्रह्माजीका कहा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है?—

मलं मूत्रं पुरीषं च श्लेष्मनिष्ठिवितं तथा।
गण्डूषमप्सु मुञ्चन्ति ये ते ब्रह्महभिः समाः॥

'जो जलमें मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, थूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्महत्यारोंके समान हैं।'

इसलिये ओ दुराचारी! तुम शीघ्र जलसे बाहर निकल आओ। यदि तुम्हारी इन्द्रियाँ तुम्हारे काबूमें नहीं हैं, तो तुम तीर्थोंमें किसलिये घूमते हो? नादान! जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें हों और जिसके द्वारा समस्त क्रियाएँ निर्विकार भावसे की जाती हों, वही तीर्थका फल पाता है।२ मनुष्य पुण्यकर्मके द्वारा यदि दो


१- स्नातव्यं तीर्थमुख्येषु सत्यमेतन्न संशयः। चरेषु किंतु संविश्य स्थावरेषु बहिः स्थितैः॥
स्थावरेष्वपि संविश्य तत्र स्नानं विधीयते। न यत्र देवस्नानार्थं भक्तैः संगृह्यते जलम्॥
यच्च हस्तशतादूर्ध्वं सरस्तत्र विधीयते। संवेशेऽपि क्रमश्चायं पादौ प्रक्षाल्य यद्वहिः॥
ततः स्नानं प्रकर्तव्यमन्यथा दोष उच्यते।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। २०–२३)

२- यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। निर्विकाराः क्रियाः सर्वाः स हि तीर्थफलं लभेत्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। २६)

* माहे‍श्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *२३१

घड़ी भी जीवित रहे, तो वह उत्तम है। परंतु उभय लोकविरोधी पापकर्मके साथ एक कल्पकी भी आयु मिले, तो उसे न स्वीकार करे।

भीमसेन बोले—कौवोंकी तरह तेरी कायँ-कायँकी कर्कश ध्वनिसे मेरे तो कान बहरे हो गये। अब तू अपनी इच्छाके अनुसार यहाँ विलाप कर या चिन्ताके मारे सूख जा; मैं तो जल पीकर ही रहूँगा।

सुहृदयने कहा—मैं धर्मकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, अतः किसी प्रकार भी तुम्हें पाप न करने दूँगा। हमारे इस कुण्डसे तो तुम शीघ्र ही बाहर निकल आओ नहीं तो इन ईंटोंके टुकड़ोंसे तुम्हारा मस्तक चूर-चूर कर दूँगा।

यों कहकर बर्बरीकने ईंटें उठा लिये और भीमके मस्तकको लक्ष्य करके फेंकना आरम्भ किया। भीमसेन उसके प्रहारको बचाकर उछले और सरोवरसे बाहर आ गये। फिर तो दोनों भयंकर पराक्रमी वीर एक-दूसरेको घुड़कते हुए आपसमें गुथ गये। दोनों ही युद्धविद्यामें पारंगत थे। अतः अपनी विशाल भुजाओंसे युद्ध करने लगे। दो ही घड़ीमें उस राक्षसके सामने पाण्डव भीमसेन दुर्बल पड़ने लगे। अन्तमें बर्बरीकने भीमसेनको उठा लिया और जलमें फेंकनेके लिये समुद्रकी ओर चल दिया। समुद्रके किनारे पहुँचनेपर भगवान् शंकरने आकाशमें स्थित हो बर्बरीकसे कहा—'राक्षसोंमें श्रेष्ठ महाबली बर्बरीक! ये भरतकुलके रत्न और तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं, इन्हें छोड़ दो। ये तीर्थयात्राके प्रसंगसे अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ विचरते हुए इस तीर्थमें भी स्नान करनेके लिये ही आये हैं। अतः तुम्हारे द्वारा सर्वथा सम्मान पानेके ही योग्य हैं।'

भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सुहृदय सहसा भीमसेनको छोड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ा और बोल उठा—'हाय! मुझे धिक्कार है। यह बड़े कष्टकी बात है, बड़े कष्टकी बात है, पितामह! मुझे क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये।' उसे इस प्रकार शोक करते और बार-बार मोहित होते देख भीमसेनने छातीसे लगा लिया और स्नेहसे मस्तक सूँघकर कहा—'वत्स! जन्मकालसे ही न तो हम तुम्हें पहचानते हैं न तुम हमको। केवल घटोत्कच तथा भगवान् श्रीकृष्णसे यह सुन रखा है कि तुम इसी तीर्थमें निवास करते हो। किंतु यह सब बात भी हमें भूल गयी थी, क्योंकि जो लोग अनेक प्रकारके दुःखोंसे दुःखी और मोहित होते हैं, उनकी सारी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। अतः हमपर जो यह दुःख आया है, वह सब कालकी प्रेरणासे प्राप्त हुआ है। बेटा! तुम शोक न करो। तुम्हारा इसमें तनिक भी दोष नहीं है, क्योंकि कुमार्गपर चलनेवाला कोई भी क्यों न हो, क्षत्रियके

२३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


लिये दण्डनीय ही है। साधु क्षत्रियको उचित है कि यदि कुमार्गपर चले तो अपनी आत्माको भी दण्ड दे। फिर पिता, माता, सुहृद्, भ्राता और पुत्र आदिके लिये तो कहना ही क्या है? मुझे आज बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ है। मैं और मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनका पुत्र ऐसा धर्मज्ञ और धर्मपालक है। तुम वर पानेके योग्य हो, मेरे तथा दूसरे सत्पुरुषोंके द्वारा प्रशंसा पानेके अधिकारी हो। अतः यह शोक छोड़कर तुम्हें स्वस्थ हो जाना चाहिये।'

**बर्बरीक बोला—**पितामह! मैं पापी हूँ, ब्रह्महत्यारेसे भी अधिक घृणाका पात्र हूँ। प्रशंसाके योग्य कदापि नहीं हूँ। प्रभो! न तो आप मेरी ओर देखें और न मेरा स्पर्श ही करें। ब्राह्मणलोग सभी पापोंका प्रायश्चित्त बतलाते हैं; परंतु जो पिता-माताका भक्त नहीं है, उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं।^१ अतः जिस शरीरसे मैंने पितामहको पीड़ा पहुँचायी है, उस अपने शरीरको आज मैं महीसागरसंगममें त्याग दूँगा; जिससे अन्य जन्मोंमें भी ऐसा ही पातकी न होऊँ।

यों कहकर बलवान् बर्बरीक उछलकर समुद्रके भीतर चला गया। समुद्र भी यह सोचकर काँप उठा कि 'मैं कैसे इसका वध करूँ'। तदनन्तर सिद्धाम्बिका तथा चारों दिशाओंकी देवियाँ रुद्रके साथ वहाँ आयीं और उसे हृदयसे लगाकर बोलीं—'वीरेन्द्र! अनजानमें किये हुए पापसे दोष नहीं लगता, यह बात शास्त्रोंमें बतायी गयी है। अतः तुम्हें इसके विपरीत कोई बर्ताव नहीं करना चाहिये।^२ देखो, तुम्हारे पितामह भीम पुत्र-पुत्र पुकारते हुए तुम्हारे पीछे लगे हुए चले आ रहे हैं। तुम्हारी मृत्यु हो जानेपर वे स्वयं भी प्राण त्याग देनेको उत्सुक हैं। वीर! यदि इस समय तुम शरीर छोड़ोगे तो भीमसेन भी शरीरको त्याग देंगे। उस दशामें तुम्हें बड़ा भारी पातक लगेगा। अतः महामते! तुम ऐसा जानकर अपने शरीरको धारण करो। थोड़े ही समयमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारे शरीरका नाश होगा, ऐसा बताया गया है। वत्स! वे साक्षात् भगवान् विष्णु हैं और उनके हाथसे शरीरका नाश होना बहुत उत्तम (मुक्तिदायक) है। इसलिये तुम उस समयकी प्रतीक्षा करो और हमारी बात मानो।' देवियोंके ऐसा कहनेपर बर्बरीक उदास मनसे लौट आया। 'बर्बरीक चण्डिकाके कार्यकी सिद्धिके लिये बड़ा भारी युद्ध करेगा, इसलिये संसारमें चण्डिल नामसे प्रसिद्ध और समस्त विश्वके लिये पूजनीय होगा।' यों कहकर वहाँ आयी हुई सब देवियाँ अन्तर्धान हो गयीं। भीमसेन भी बर्बरीकको साथ लेकर आये और अन्य पाण्डवोंसे भी यह सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सब पाण्डवोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। सबने बार-बार उसकी प्रशंसा की और आलस्य त्यागकर विधिके अनुसार तीर्थ-स्नान किया।


१- सर्वेषामेव पापानां निष्कृतिः प्रोच्यते द्विजैः। पित्रोर्भक्तस्य पुनर्निष्कृतिर्नैव विद्यते ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। ५५-५६)

२- अज्ञातविहिते पापे नास्ति वीरेन्द्र कल्मषम्। शास्त्रेषूक्तमिदं वाक्यं नान्यथा कर्तुमर्हसि ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। ६१)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २३३

बर्बरीकका वध तथा उसके पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन और ग्रन्थका उपसंहार

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर पाण्डवोंके वनवासका तेरहवाँ वर्ष व्यतीत हो जानेपर जब 'उपप्लव्य' नामक स्थानमें सब राजा युद्धके लिये एकत्र हो गये, तब महारथी पाण्डव भी युद्ध करनेके लिये कुरुक्षेत्रमें आकर स्थित हुए। दुर्योधन आदि कौरव भी वहाँ पहलेसे ही टिके हुए थे। उस समय भीष्मजीने रथियों और अतिरथियोंकी गणना की थी। उसका सब समाचार गुप्तचरोंद्वारा सुनकर राजा युधिष्ठिरने अपने पक्षके राजाओंके बीच भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'देवकीनन्दन! पितामह भीष्मने रथियों और अतिरथियोंका वर्णन किया है, उसे सुनकर दुर्योधनने अपने पक्षके महारथियोंसे पूछा है कि 'कौन वीर कितने समयमें सेनासहित पाण्डवोंका वध कर सकता है?' इसके उत्तरमें पितामह भीष्म तथा कृपाचार्यने एक मासमें हम सबको मारनेकी प्रतिज्ञा की है। द्रोणाचार्यने पन्द्रह दिनोंमें, अश्वत्थामाने दस दिनमें तथा सदा मुझे भयभीत करनेवाले कर्णने छः दिनमें सेनासहित पाण्डवोंको मारनेकी घोषणा की है। अतः यही प्रश्न मैं अपने पक्षके महारथियोंके सामने रखता हूँ—'कौन कितने समयमें सेनासहित कौरवोंको मार सकता है?'

राजा युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अर्जुन बोले—महाराज! भीष्म आदि महारथियोंने जो प्रतिज्ञा या घोषणा की है वह सर्वथा असंगत है; क्योंकि विजय और पराजयमें पहलेसे किया हुआ निश्चय झूठा होता है। आपके पक्षमें भी जो वीर राजा हैं, वे युद्धके लिये कमर कसकर रणभूमिमें डटे हुए हैं। देखिये—ये नरश्रेष्ठ कालके समान दुर्धर्ष हैं—द्रुपद, विराट, कैकेय, सहदेव, सात्यकि, दुर्जय वीर चेकितान, धृष्टद्युम्न, पुत्रसहित महापराक्रमी घटोत्कच, महाधनुर्धर भीमसेन आदि तथा कभी किसीसे परास्त न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण—ये सब आपके पक्षमें हैं। मैं तो समझता हूँ, इनमेंसे एक-एक वीर सारी कौरवसेनाका संहार कर सकता है। इनके डरसे कौरव इस प्रकार भागेंगे जैसे सिंहसे डरे हुए मृग। बूढ़े भीष्मसे, बूढ़े बाबा द्रोण और कृपसे तथा अश्वत्थामासे अपनेको क्या भय है? अथवा यदि चित्तकी शान्तिके लिये आप जानना ही चाहते हैं, तो मेरी बात सुनिये—मैं अकेला ही युद्धमें सेनासहित समस्त कौरवोंको एक दिनमें नष्ट कर सकता हूँ।

अर्जुनकी यह बात सुनकर घटोत्कचके पुत्रने हँसते हुए कहा—महात्मा अर्जुनने जो प्रतिज्ञा की है, वह मुझे नहीं सही जाती, क्योंकि इनके द्वारा दूसरे वीरोंपर महान् आक्षेप हो रहा है। अतः अर्जुन और श्रीकृष्णसहित आप सब लोग चुपचाप खड़े रहें, मैं एक ही मुहूर्तमें भीष्म आदि सबको यमलोकमें पहुँचा दूँगा। मेरे भयंकर धनुषको, इन दोनों अक्षय तूणीरोंको तथा भगवती सिद्धाम्बिकाके दिये हुए इस खड्गको भी आपलोग देखें। ऐसी दिव्य वस्तुएँ मेरे पास हैं। तभी मैं इस प्रकार सबको जीतनेकी बात कहता हूँ। बर्बरीकका यह वचन सुनकर सब क्षत्रिय बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। अर्जुनने भी आक्षेप करनेके कारण लज्जित हो श्रीकृष्णकी ओर देखा। तब श्रीकृष्णने कहा—'पार्थ! घटोत्कचके इस पुत्रने अपनी शक्तिके अनुरूप ही बात कही है। इसके विषयमें बड़ी अद्भुत बातें सुनी जाती हैं। पूर्वकालमें इसने पातालमें जाकर नौ करोड़

२३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पलाशी नामक दैत्योंको क्षणभरमें मौतके घाट उतार दिया था।'

तत्पश्चात् यादवेन्द्र श्रीकृष्णने घटोत्कचके पुत्रसे कहा—वत्स! भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण और दुर्योधन आदि महारथियोंके द्वारा सुरक्षित कौरवसेनाको, जिसपर विजय पाना महादेवजीके लिये भी कठिन है, तुम इतना शीघ्र कैसे मार सकते हो? तुम्हारे पास ऐसा कौन-सा उपाय है? समस्त प्राणियोंके अधीश्वर भगवान् वासुदेवके इस प्रकार पूछनेपर सिंहके समान वक्षःस्थल, पर्वताकार शरीर तथा अतुलित बलसे सम्पन्न एवं नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित बर्बरीकने तुरंत ही धनुष चढ़ाया और उसपर बाण सन्धान किया। फिर उस बाणको उसने लाल रंगके भस्मसे भर दिया और कानतक खींचकर छोड़ दिया। उस बाणके मुखसे जो भस्म उड़ा, वह दोनों सेनाओंमें सैनिकोंके मर्मस्थलोंपर गिरा। केवल पाँच पाण्डव, कृपाचार्य और अश्वत्थामाके शरीरसे उसका स्पर्श नहीं हुआ। यह कर्म करके बर्बरीकने पुनः सब लोगोंसे कहा—'आपलोगोंने देखा, इस क्रियाके द्वारा मैंने मरनेवाले वीरोंके मर्मस्थानका निरीक्षण किया है। अब उन्हीं मर्मस्थानोंमें देवीके दिये हुए तीक्ष्ण और अमोघ बाण मारूँगा, जिनसे ये सभी योद्धा क्षणभरमें मृत्युको प्राप्त हो जायँगे। आप सब लोगोंको अपने-अपने धर्मकी सौगन्ध है, कदापि शस्त्र ग्रहण न करें। मैं दो ही घड़ीमें इन सब शत्रुओंको तीखे बाणोंसे मार गिराऊँगा।'

यह सुनकर युधिष्ठिर आदिके चित्तमें बड़ा विस्मय हुआ। वे सब लोग बर्बरीकको साधुवाद देने लगे, जिससे महान् कोलाहल छा गया। बर्बरीकने ज्यों ही उपर्युक्त बात कही त्यों ही श्रीकृष्णने कुपित होकर अपने तीखे चक्रसे बर्बरीकका मस्तक काट गिराया। यह देख सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। सब एक-दूसरेसे कहने लगे—'अहो! यह क्या हुआ? घटोत्कचका पुत्र कैसे मारा गया?' पाण्डव भी अन्य सब राजाओंके साथ आँसू बहाने लगे! घटोत्कच तो 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहता हुआ शोकसे मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। इसी समय सिद्धाम्बिका आदि चौदह देवियाँ वहाँ आ पहुँचीं। श्रीचण्डिकाने घटोत्कचको सान्त्वना देकर उच्चस्वरसे कहा—'सब राजा सुनें। विदितात्मा भगवान् श्रीकृष्णने महाबली बर्बरीकका वध किस कारणसे किया है, वह मैं बतलाती हूँ। पूर्वकालकी बात है, मेरुपर्वतके शिखरपर सब देवता एकत्र हुए थे। उस समय भारसे पीड़ित हुई यह पृथ्वी वहाँ गयी और सब देवताओंसे बोली—'आपलोग मेरा भार उतारें।' तब ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे कहा—'भगवन्! आप मेरी प्रार्थना सुनें। आप ही पृथ्वीका भार उतारें, इस कार्यमें देवता आपका अनुसरण करेंगे।' तब भगवान् विष्णुने 'तथास्तु' कहकर ब्रह्माजीकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी समय 'सूर्यवर्चा' नामक यक्षराजने

बर्बरीकका बलप्रदर्शन

२३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अपनी भुजा ऊपर उठाकर कहा—‘आपलोग मेरे रहते हुए मनुष्यलोकमें क्यों जन्म धारण करते हैं? मैं अकेला ही अवतार लेकर पृथ्वीके भारभूत सब दैत्योंका संहार करूँगा।’

सूर्यवर्चाके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुपित होकर बोले—दुर्मते! पृथ्वीका यह महान् भार समस्त देवताओंके लिये भी दुःसह है, उसे तू मोहवश केवल अपने ही द्वारा साध्य बतलाता है। मूर्ख! पृथ्वीका भार उतारते समय जब युद्धका आरम्भ होगा, उस समय श्रीकृष्णके हाथसे तेरे शरीरका नाश होगा। इसमें संशय नहीं है। ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा शाप प्राप्त होनेपर सूर्यवर्चाने भगवान् विष्णुसे यह याचना की—‘भगवन्! यदि इस प्रकार मेरे शरीरका नाश होनेवाला है, तो मैं एक प्रार्थना करता हूँ—‘जन्मसे ही मुझे ऐसी बुद्धि दीजिये, जो सब अर्थोंको सिद्ध करनेवाली हो।’ यह सुनकर भगवान् विष्णुने देवसभामें कहा—‘ऐसा ही होगा। देवियाँ तुम्हारे मस्तककी पूजा करेंगी। तुम पूज्य हो जाओगे।’ भगवान्‌के ऐसा कहनेपर सूर्यवर्चा तथा आप सब देवता भी इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। सूर्यवर्चा ही, यह घटोत्कचका पुत्र था, जो मारा गया है। अतः समस्त राजाओंको श्रीकृष्णमें दोष नहीं देखना चाहिये।’

श्रीभगवान् बोले—राजाओ! देवीने जो कुछ कहा है, वह निःसन्देह वैसा ही है। मैंने देवसमाजमें सूर्यवर्चाको जो वर दिया था, उसका स्मरण करके ही गुप्तक्षेत्रमें देवीकी आराधनाके लिये मैंने इसे नियुक्त कर दिया था।

राजाओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण फिर चण्डिकासे बोले—देवि! यह भक्तका मस्तक है। इसे अमृतसे सींचो और राहुके सिरकी भाँति अजर-अमर बना दो। देवीने वैसा ही किया। जीवित होनेपर उस मस्तकने भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और कहा—‘मैं युद्ध देखना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे अनुमति मिले।’ तब भगवान् श्रीकृष्णने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—‘वत्स! जबतक यह पृथ्वी, नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य रहेंगे, तबतक तुम सब लोगोंके द्वारा पूजनीय होओगे। अब तुम इस पर्वतशिखरपर चढ़कर वहाँ रहो। वहींसे होनेवाले युद्धको देखना।’ भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर समस्त देवियाँ आकाशमें जाकर अन्तर्धान हो गयीं। बर्बरीकका मस्तक पर्वतके शिखरपर स्थित हो गया। उसका शरीर जमीनपर था, उसका यथाविधि संस्कार कर दिया गया। मस्तकका कोई संस्कार नहीं हुआ। तत्पश्चात् कौरव और पाण्डवोंकी सेनामें भयानक संग्राम छिड़ गया जो लगातार अठारह दिनोंतक चला। युद्धमें द्रोण और कर्ण आदि सब वीर मारे गये। अठारह दिनों बाद निर्दयी दुर्योधन भी मारा गया। तब अपने बन्धु-बान्धवोंके बीचमें धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीगोविन्दसे कहा—‘पुरुषोत्तम! इस महान् संग्राम-सागरसे आपने ही हमलोगोंको पार उतारा है। हे नाथ! हे हरे! हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।’ भीमसेन बहुत भोले थे। उन्हें धर्मराजकी यह बात कुछ भारी लगी और उन्होंने तनिक असहिष्णुताके साथ युधिष्ठिरसे कहा—‘राजन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारनेवाला तो यह मैं भीम हूँ। आप मेरा तिरस्कार करके ‘पुरुषोत्तम’, ‘पुरुषोत्तम’ कहकर कृष्णकी इतनी बड़ाई क्यों कर रहे हैं? धृष्टद्युम्न, अर्जुन, सात्यकि और मैं, जिन लोगोंने युद्धमें पराक्रम दिखाकर विजय पायी, उन्हें छोड़कर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’ भीमसेनकी यह अनुचित बात सुनकर अर्जुनसे नहीं रहा गया। अर्जुन बोले—‘भाई भीमसेनजी! राम! राम! आप ऐसा बिलकुल न कहिये, आप जनार्दन श्रीकृष्णको यथार्थतः