संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २१९
माननीय हैं। मानद! आपने इस तीर्थराजको विख्यात न होनेका जो शाप दे दिया है, उसका निवारण करनेके लिये अनुग्रह कीजिये।'
मेरे ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा—धर्म! नारदने अच्छी बात कही है, तुम इनकी बात मानो। तब धर्मने कार्तिकेयजीसे कहा—'हमलोग जिसके किंकर हैं, उन परम सिद्ध कार्तिकेयजीको नमस्कार है। स्कन्द! मेरे नाथ! मेरी यह विनय ध्यान देकर सुनिये। स्तम्भ अर्थात् गर्वके कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध होगा तथापि शनिवारकी अमावास्याको महीसागरकी यात्रा करनेसे जो फल मिलेगा, उसपर ध्यान दीजिये—प्रभासकी दस बार, पुष्करकी सात बार और प्रयागकी आठ बार यात्रा करनेसे जो फल होता है वही फल इसकी एक बारकी यात्रासे प्राप्त होगा।'
इस प्रकार वरदान देनेपर कार्तिकेयजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजीने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भ तीर्थको अर्घ्य दिया और उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठता प्रदान की। फिर सब तीर्थों और स्कन्द स्वामीको सम्मान देकर विदा किया। इस तीर्थके गुप्त होनेका यही प्राचीन वृत्तान्त है। इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण तीर्थके महान् फलका वर्णन किया। यह सब आदिसे ही सुनकर पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सूतजी कहते हैं—यह सब सुनकर विस्मयमें पड़े हुए अर्जुनने उस तीर्थकी बड़ी प्रशंसा की और नारद आदिसे विदा लेकर द्वारकाको प्रस्थान किया।
घटोत्कचका विवाह और बर्बरीकका जन्म
शौनकजी बोले—सूतजी! आपने गुप्तक्षेत्रके इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन, अनुपम तथा हर्षवर्धक माहात्म्यका वर्णन किया। यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्धमाताकी कृपासे उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की? यह सब यथार्थरूपसे कहिये।
उग्रश्रवा (सूतजी)-ने कहा—ब्रह्मन्! इस विषयमें मैं श्रीव्यासजीके मुखसे सुनी हुई कथा कहूँगा। पहलेकी बात है, पाण्डवोंने राजा द्रुपदकी पुत्री द्रौपदीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेवसे सुरक्षित होकर रहते थे। एक समय पाण्डव अपनी राजसभामें बैठकर नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे, इतनेहीमें भीमका पुत्र घटोत्कच वहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासनसे उठे और बड़ी प्रसन्नताके साथ सबने घटोत्कचको हृदयसे लगाया। भीमनन्दन घटोत्कचने भी अत्यन्त विनीतभावसे उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उसे अपनी गोदमें बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूँघते हुए सभामें इस प्रकार पूछा—'बेटा! कहाँसे आते हो? इतने दिनोंतक कहाँ विचरते रहे? हिडिम्बाकुमार! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओंका कोई अपराध तो नहीं करते हो? भगवान् श्रीकृष्णमें और हमलोगोंमें तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करनेवाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न?'
धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमारने कहा—महाराज! मेरे मामाके मारे जानेपर मैं उसीके राज्यसिंहासनपर बिठाया गया हूँ और दुष्टोंका दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशलसे हैं, वे इस समय दिव्य तपस्यामें लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है—'बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवोंमें भक्ति रखनेवाले बनो।' माताकी यह बात सुनकर