संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तब ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र धर्मने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर इस प्रकार कहा—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, इस तीर्थराज महीसागरसंगमने मोहवश बड़ी कुत्सित बात कह डाली है। साधु पुरुषोंको उचित है कि वे अपनेमें अच्छे गुण होते हुए भी उनका अपने ही मुखसे बखान न करें। जो भरी सभामें दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपने गुणोंका वर्णन करता है, वह रजोगुणी, अहंकारी तथा निन्दित है। इसलिये यह तीर्थ इन सब गुणोंके रहते हुए भी अपने अहंकारके कारण विख्यात न होगा। इसका स्वरूप विध्वस्त-सा हो जायगा।'
धर्मदेवके ऐसा कहनेपर सब ओर हाहाकारका शब्द गूँज उठा। तब योगीश्वर स्कन्दजी तथा मैं दोनों शीघ्रतापूर्वक वहाँ जा पहुँचे। कार्तिकेयने उस देवसमाजमें धर्मसे इस प्रकार कहा—'धर्म! तुमने धृष्टताके कारण जो यह शाप दे डाला है, वह अनुचित ही हुआ है। कोई भी बतावे तो सही कि तीनों लोकोंमें विद्यमान समस्त तीर्थोंमेंसे कौन-सा ऐसा तीर्थ है, जिससे यह महीसागरसंगम अर्घ्य पानेका अधिकारी नहीं है? इस तीर्थराजने अपने जिस गुणका वर्णन किया है, वह सब इसमें मौजूद है। ऐसी दशामें कौन-सी बुराई हो गयी? क्योंकि अवगुण तो झूठ बोलनेमें है, सत्य कहनेमें नहीं! अहो! जो सबका पालन करनेवाले हैं, उनके द्वारा ऐसा बर्ताव होना कदापि उचित नहीं है। यदि वे भी विचार न करके ऐसे कार्य करेंगे तब प्रजा किसकी शरणमें जायगी।'
स्कन्द स्वामीके ऐसा कहनेपर धर्मने इस प्रकार उत्तर दिया—'आपका यह कहना ठीक है कि यह महीसागरसंगम सब तीर्थोंमें प्रधान होने और ब्रह्माजीसे अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य है, किंतु साधु पुरुषोंका यह सनातन नियम है कि अपने ही मुँहसे अपने गुणोंका बखान नहीं करना चाहिये। दूसरोंका किया हुआ आक्षेप और अपनी प्रशंसा—ये दो दोष ब्रह्माजीको भी अपने पदसे विचलित कर सकते हैं। दूसरोंपर आक्षेप करते हुए अपनी प्रशंसा करनेवाले राजा ययाति क्या स्वर्गसे नीचे नहीं गिर गये थे? बुद्धिमान् ईश्वरने पूर्वकालमें जो-जो बातें प्रमाणित कर दी हैं, उन सबका भलीभाँति पालन करना चाहिये। कौन विद्वान् उनका उल्लंघन कर सकता है? कार्तिकेयजी! आपके पिताने आदेश देकर जिस कार्यके लिये हमें नियुक्त किया है, हम सदा उसीका पालन करते हैं। आपको भी उसका पालन करना चाहिये।'
यों कहकर धर्म जब अपनी मुद्रा त्याग देनेको तैयार हो गये, तब मैंने उस प्रस्तावपर विचार करके यह बात कही—'विश्वको धारण करनेवाले परम महान् महात्मा धर्मको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी प्रतिदिन पूजा करते हैं, उन पापनाशी धर्मको नमस्कार है। धर्म! यदि कदाचित् आप मुद्रा त्याग देंगे तो हमलोगोंकी सत्ता कैसे रह सकती है? प्रभो! आप इस विश्वका नाश न कीजिये। योगीश्वर कार्तिकेयको आप सम्मान देने योग्य हैं। ये साक्षात् भगवान् शंकरके पुत्र हैं; अतः उन्हींकी भाँति हम सबके लिये