भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 259

२३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पाण्डवोंने अपनी गठरी आदि वहीं खोल दी और प्याससे पीड़ित होकर जलकी ओर देखा। तब भीमसेन कुण्डमें पानी पीनेके लिये घुसे। उस समय युधिष्ठिरने उनसे कहा—'भीमसेन! तुम कुण्डसे पानी निकालकर बाहर ही हाथ-पैर धो लो, उसके बाद जल पीना; अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा।' भीमसेनके नेत्र प्याससे व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिरकी बातें बिना सुने ही जल पीनेकी इच्छासे कुण्डमें प्रवेश किया। जल देखकर उन्होंने वहीं पीनेका निश्चय किया और शुद्धिके लिये मुख, दोनों हाथ और दोनों पैर धोये। भीमसेन जब इस प्रकार पैर धो रहे थे, उस समय सुहृदयने ऊपरसे यह सत्य वचन कहा—'ओ दुर्मते! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारा विचार तो बड़ा पापपूर्ण है। अहो! तुम देवीके कुण्डमें हाथ, पैर और मुँह धो रहे हो। मैं देवीको सदा इसी जलसे स्नान कराता हूँ। मलसे दूषित जलको तो मनुष्य भी नहीं छूते, फिर देवता उसका स्पर्श कैसे कर सकते हैं? जब तुम इतने बड़े मूढ़ हो, तब तीर्थोंमें क्यों घूम रहे हो?'

भीमसेनने कहा—क्रूर राक्षसाधम! तू क्यों ऐसी कठोर बातें कहता है? जलका दूसरा उपयोग ही क्या है? वह प्राणियोंके भोगके लिये ही तो होता है? बड़े-बड़े मुनीश्वरोंने भी तीर्थोंमें स्नानका विधान किया है। अंगोंको धोना ही तो स्नान कहा गया है। फिर तू मेरी निन्दा क्यों करता है? यदि स्नान और अंग-प्रक्षालन न किया जाय तो धर्मात्मा पुरुष किसलिये पूर्त धर्मका अनुष्ठान करते हैं? क्यों बावड़ी, कूप और तड़ाग आदि बनवाते हैं?

सुहृदय बोला—निःसन्देह तुम्हारा यह कथन सत्य है कि मुख्य-मुख्य तीर्थोंमें स्नान करना चाहिये। ऐसी विधि है भी, परंतु जो नदी आदि चर तीर्थ हैं—जिनके जल बहते रहते हैं, उन्हींमें भीतर प्रवेश करके स्नान आदि करना चाहिये। कूप-सरोवर आदि स्थावर तीर्थोंमें तो बाहर खड़े होकर ही स्नानादि करना उचित है। स्थावर तीर्थोंमें भी वहीं भीतर प्रवेश करके स्नान करनेका विधान है, जहाँ भक्त पुरुष देवताको स्नान करानेके लिये जल न लेते हों तथा जो सरोवर देवस्थानसे सौ हाथसे भी अधिक दूर बनाया गया हो। उसके भीतर प्रवेश करनेका भी यह एक क्रम है कि पहले बाहर ही दोनों पैर धोकर फिर कुण्डमें स्नान किया जाय, अन्यथा दोष बताया गया है।१ क्या तुमने ब्रह्माजीका कहा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है?—

मलं मूत्रं पुरीषं च श्लेष्मनिष्ठिवितं तथा।
गण्डूषमप्सु मुञ्चन्ति ये ते ब्रह्महभिः समाः॥

'जो जलमें मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, थूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्महत्यारोंके समान हैं।'

इसलिये ओ दुराचारी! तुम शीघ्र जलसे बाहर निकल आओ। यदि तुम्हारी इन्द्रियाँ तुम्हारे काबूमें नहीं हैं, तो तुम तीर्थोंमें किसलिये घूमते हो? नादान! जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें हों और जिसके द्वारा समस्त क्रियाएँ निर्विकार भावसे की जाती हों, वही तीर्थका फल पाता है।२ मनुष्य पुण्यकर्मके द्वारा यदि दो


१- स्नातव्यं तीर्थमुख्येषु सत्यमेतन्न संशयः। चरेषु किंतु संविश्य स्थावरेषु बहिः स्थितैः॥
स्थावरेष्वपि संविश्य तत्र स्नानं विधीयते। न यत्र देवस्नानार्थं भक्तैः संगृह्यते जलम्॥
यच्च हस्तशतादूर्ध्वं सरस्तत्र विधीयते। संवेशेऽपि क्रमश्चायं पादौ प्रक्षाल्य यद्वहिः॥
ततः स्नानं प्रकर्तव्यमन्यथा दोष उच्यते।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। २०–२३)

२- यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। निर्विकाराः क्रियाः सर्वाः स हि तीर्थफलं लभेत्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। २६)