संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २२९
हम सब आपकी दासियाँ हैं और पतिरूपमें आपका वरण करती हैं। आप हमारे साथ यहाँके विविध स्थानोंमें क्रीडा कीजिये।
बर्बरीकने कहा—देवियो! मेरा जन्म कुरुवंशमें हुआ है। मैं पाण्डुनन्दन भीमसेनका पौत्र हूँ। बर्बरीक मेरा नाम है। मैं उस दैत्यको मारनेके लिये आया था। वह पापी दैत्य मारा गया; अतः अब पृथ्वीपर लौटा जा रहा हूँ। आप लोगोंसे किसी प्रकार मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैंने सदा ब्रह्मचारी रहनेका व्रत लिया है।
यों कहकर बर्बरीकने उस शिवलिंगका पूजन और साष्टांग प्रणाम किया। फिर उन सब कन्याओंके देखते-देखते ऊपरके मार्गसे चल दिया। बिलसे बाहर आकर उसने पूर्वदिशाके मुखको प्रकाशयुक्त देखा, फिर बड़े हर्षके साथ वह विजयसे मिला। उस समयतक विजय अपना सब कार्य पूरा कर चुके थे। उन्होंने बर्बरीकसे कहा—'वीरेन्द्र! तुम्हारे प्रसादसे मैंने अनुपम सिद्धि प्राप्त की है। तुम दीर्घकालतक जीओ, आनन्द करो, दान दो और विजयी बनो। इसीलिये साधु पुरुष साधुओंका ही संग करना चाहते हैं, क्योंकि सत्पुरुषोंका संग सब दोषोंको दूर करनेकी दवा है। मेरे होमकुण्डमें सिन्दूरके समान लाल रंगका सात्त्विक एवं अत्यन्त पवित्र भस्म है, उसे हाथमें भरकर ले लो। युद्धभूमिमें इसे पहले छोड़ देनेपर शत्रुके स्थानपर मृत्यु भी हो, (साक्षात् मृत्यु ही शत्रु बन कर आ जाय) तो उसके शरीरको भी यह नष्ट कर देगा। इस प्रकार शत्रुओंपर तुम्हें सुखपूर्वक विजय प्राप्त होगी।'
बर्बरीक बोला—जो निष्काम भावसे किसीका उपकार करता है, वही साधु कहलाता है। जो किसी वस्तुकी इच्छा रखकर उपकार करता है, उसकी साधुतामें कौन गुण है।* अतः यह भस्म किसी दूसरेको दे दीजिये। मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपको प्रसन्नमुख देखना चाहता हूँ, इसके सिवा और कुछ नहीं।
तदनन्तर देवियोंसहित देवताओंने विजयका सम्मान करके उन्हें सिद्धैश्वर्य प्रदान किया और उनका नाम 'सिद्धसेन' रखा। इस प्रकार विजयने अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की।
तत्पश्चात् कुछ काल बीतनेपर पाण्डवलोग जूएममें हार गये और विभिन्न तीर्थोंमें घूमते हुए उस शुभ तीर्थमें भी स्नानके लिये आये। वहाँ चण्डिका देवीका दर्शन करके मार्गके थके-माँदे होनेके कारण कहीं बैठ गये। पाँचों पाण्डवोंके साथ द्रौपदी भी थी। उस समय चण्डिकाका गण भी वहीं विराजमान था। बर्बरीकने वहाँ पधारे हुए पाण्डव वीरोंको देखा, परंतु वह उन्हें पहचानता नहीं था। पाण्डव भी उसे नहीं पहचानते थे; क्योंकि जन्मसे लेकर अबतक पाण्डवोंके साथ उसकी भेंट ही नहीं हुई थी।
* उपकुर्यान्निराकाङ्क्षो यः स साधुरितीर्यते। साकाङ्क्षमुपकुर्याद्यः साधुत्वे तस्य को गुणः॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ५९।८०)