संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अपनी भुजा ऊपर उठाकर कहा—‘आपलोग मेरे रहते हुए मनुष्यलोकमें क्यों जन्म धारण करते हैं? मैं अकेला ही अवतार लेकर पृथ्वीके भारभूत सब दैत्योंका संहार करूँगा।’
सूर्यवर्चाके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुपित होकर बोले—दुर्मते! पृथ्वीका यह महान् भार समस्त देवताओंके लिये भी दुःसह है, उसे तू मोहवश केवल अपने ही द्वारा साध्य बतलाता है। मूर्ख! पृथ्वीका भार उतारते समय जब युद्धका आरम्भ होगा, उस समय श्रीकृष्णके हाथसे तेरे शरीरका नाश होगा। इसमें संशय नहीं है। ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा शाप प्राप्त होनेपर सूर्यवर्चाने भगवान् विष्णुसे यह याचना की—‘भगवन्! यदि इस प्रकार मेरे शरीरका नाश होनेवाला है, तो मैं एक प्रार्थना करता हूँ—‘जन्मसे ही मुझे ऐसी बुद्धि दीजिये, जो सब अर्थोंको सिद्ध करनेवाली हो।’ यह सुनकर भगवान् विष्णुने देवसभामें कहा—‘ऐसा ही होगा। देवियाँ तुम्हारे मस्तककी पूजा करेंगी। तुम पूज्य हो जाओगे।’ भगवान्के ऐसा कहनेपर सूर्यवर्चा तथा आप सब देवता भी इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। सूर्यवर्चा ही, यह घटोत्कचका पुत्र था, जो मारा गया है। अतः समस्त राजाओंको श्रीकृष्णमें दोष नहीं देखना चाहिये।’
श्रीभगवान् बोले—राजाओ! देवीने जो कुछ कहा है, वह निःसन्देह वैसा ही है। मैंने देवसमाजमें सूर्यवर्चाको जो वर दिया था, उसका स्मरण करके ही गुप्तक्षेत्रमें देवीकी आराधनाके लिये मैंने इसे नियुक्त कर दिया था।
राजाओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण फिर चण्डिकासे बोले—देवि! यह भक्तका मस्तक है। इसे अमृतसे सींचो और राहुके सिरकी भाँति अजर-अमर बना दो। देवीने वैसा ही किया। जीवित होनेपर उस मस्तकने भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और कहा—‘मैं युद्ध देखना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे अनुमति मिले।’ तब भगवान् श्रीकृष्णने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—‘वत्स! जबतक यह पृथ्वी, नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य रहेंगे, तबतक तुम सब लोगोंके द्वारा पूजनीय होओगे। अब तुम इस पर्वतशिखरपर चढ़कर वहाँ रहो। वहींसे होनेवाले युद्धको देखना।’ भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर समस्त देवियाँ आकाशमें जाकर अन्तर्धान हो गयीं। बर्बरीकका मस्तक पर्वतके शिखरपर स्थित हो गया। उसका शरीर जमीनपर था, उसका यथाविधि संस्कार कर दिया गया। मस्तकका कोई संस्कार नहीं हुआ। तत्पश्चात् कौरव और पाण्डवोंकी सेनामें भयानक संग्राम छिड़ गया जो लगातार अठारह दिनोंतक चला। युद्धमें द्रोण और कर्ण आदि सब वीर मारे गये। अठारह दिनों बाद निर्दयी दुर्योधन भी मारा गया। तब अपने बन्धु-बान्धवोंके बीचमें धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीगोविन्दसे कहा—‘पुरुषोत्तम! इस महान् संग्राम-सागरसे आपने ही हमलोगोंको पार उतारा है। हे नाथ! हे हरे! हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।’ भीमसेन बहुत भोले थे। उन्हें धर्मराजकी यह बात कुछ भारी लगी और उन्होंने तनिक असहिष्णुताके साथ युधिष्ठिरसे कहा—‘राजन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारनेवाला तो यह मैं भीम हूँ। आप मेरा तिरस्कार करके ‘पुरुषोत्तम’, ‘पुरुषोत्तम’ कहकर कृष्णकी इतनी बड़ाई क्यों कर रहे हैं? धृष्टद्युम्न, अर्जुन, सात्यकि और मैं, जिन लोगोंने युद्धमें पराक्रम दिखाकर विजय पायी, उन्हें छोड़कर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’ भीमसेनकी यह अनुचित बात सुनकर अर्जुनसे नहीं रहा गया। अर्जुन बोले—‘भाई भीमसेनजी! राम! राम! आप ऐसा बिलकुल न कहिये, आप जनार्दन श्रीकृष्णको यथार्थतः