संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २३७
जानते नहीं हैं। मेरे, आपके या किसी भी अन्य वीरके द्वारा शत्रुका वध नहीं किया गया है। युद्धके समय मैं सदा देखता था कि मेरे आगे-आगे कोई एक पुरुष शत्रुओंको मारता हुआ चला करता था। मुझे पता नहीं, वह कौन था।'
अर्जुनकी बात सुनकर भीमसेन बोले—'अर्जुन! तुम निश्चय ही बड़े भ्रममें पड़े हो। भला, युद्धमें दूसरा कौन शत्रुओंको मारता। तथापि यदि तुम्हें विश्वास न हो तो चलो, पर्वतशिखरपर स्थित पौत्र बर्बरीकके मस्तकसे पूछ लें, उसने तो सारा युद्ध देखा ही है। इतना कहकर भीमने वहाँ जाकर बर्बरीकसे पूछा—'बेटा! बताओ, इस युद्धमें कौरवोंको किसने मारा है?' बर्बरीकने कहा—'मैंने तो शत्रुओंके साथ केवल एक पुरुषको युद्ध करते देखा है। उस पुरुषके बायीं ओर पाँच मुख थे और दस हाथ थे, जिनमें वह शूल आदि आयुध धारण किये हुए था। उसके दाहिनी ओर एक मुख और चार भुजाएँ थीं, जो चक्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थीं। उसके बायीं ओरके मस्तक जटाओंसे सुशोभित थे और दाहिनी ओर मस्तकपर मुकुट झलमला रहा था। उसने बायीं ओर भस्म धारण कर रखी थी तथा दायीं ओर चन्दन लगा रखा था। बायीं ओर चन्द्रकला शोभा पा रही थी और दायीं ओर कौस्तुभमणिकी छटा छा रही थी। उस पुरुषके अतिरिक्त कौरववाहिनीका विनाश करनेवाले किसी अन्य पुरुषको मैंने नहीं देखा।' बर्बरीकके ऐसा कहते ही आकाश-मण्डल उद्भासित हो उठा। उससे पुष्पवृष्टि होने लगी। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और 'साधु-साधु' की ध्वनिसे आकाश भर गया। इससे भीमसेन लज्जित होकर लंबी साँस लेने लगे। तदनन्तर भीमसेनने तन, मन, वचनसे भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके कहा—'केशव! मैंने जन्मसे लेकर अबतक जितने भी अपराध किये हैं, उन सबके लिये तुम मुझे क्षमा करो। हे पुरुषोत्तम! हे नाथ! मैं मूर्ख हूँ, तुम मेरे प्रति प्रसन्न होओ।' भगवान्ने हँसकर कहा—'अच्छी बात है, सब क्षमा किये।' तदनन्तर भीमको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्णने बर्बरीकके समीप जाकर कहा—'तुमको इस क्षेत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोगोंसे जो अपराध हो गये हों, उन्हें क्षमा करना।' भगवान्के ऐसा कहनेपर बर्बरीकने उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक वह अपने अभीष्ट स्थानको चला गया। भगवान् वासुदेव भी अवतारसम्बन्धी सब कार्य पूर्ण करके परमधामको पधारे। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम्हें बर्बरीकके जन्मका वृत्तान्त बतलाया है और गुप्तक्षेत्रका भी संक्षेपसे वर्णन किया है। इस क्षेत्रका प्रमाण ब्रह्माजीने सात कोसका बताया है। यह सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। इस प्रकार परम पवित्र महीसागर-संगमका वर्णन किया गया। जो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह प्रसंग बहुत ही पवित्र, पुण्यदायक, यशकी वृद्धि करनेवाला तथा पापको हर लेनेवाला है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह पुण्यका भागी होता है और प्राणनाशके पश्चात् भगवान् शिवके परम-धाममें जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पवित्र हो इस परम धन्य, यशोदायक, निश्चय पुण्यप्रद, मनुष्यमात्रके पापहारक तथा उत्तम मोक्षदायक पुराणका प्रतिदिन श्रवण करता है, वह सूर्यमण्डलको वेधकर भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होता है।