भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

२३८

* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अरुणाचल-माहात्म्यखण्ड

भगवान् शंकरका 'अरुणाचल' रूपसे प्रकट होना तथा ब्रह्मा और विष्णुका उनकी स्तुति करना

नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंने कहा—सूतजी! अब हमलोग आपसे अरुणाचल-माहात्म्य सुनना चाहते हैं।

श्रीसूतजी बोले—महर्षियो! प्राचीन कालकी बात है, ब्रह्माजी सत्यलोकमें कमलके आसनपर विराजमान थे। उस समय महात्मा सनकने उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर पूछा—'भगवन्! आप सम्पूर्ण भुवनके आधार तथा वेदवेद्य पुरुष हैं। चतुर्मुख! आपकी कृपासे मुझे सम्पूर्ण विज्ञान प्राप्त है। दयानिधे! भूमण्डलके समस्त शिवलिंगोंमें जो परम निर्मल, दिव्य तथा अपरिच्छिन्न महिमासे युक्त है, जिसके नाम-स्मरणमात्रसे समस्त पातकोंका विनाश हो जाता है, जो मनुष्योंको सदा भगवान् शिवका सारूप्य प्रदान करनेवाला है, जिसका आदि नहीं है, जो समस्त जगत्का आधार तथा भगवान् शंकरका अविनाशी तेज है और जिसका दर्शन करके जीव कृतार्थ हो जाता है, उसकी महिमाका मुझे उपदेश कीजिये।'

ब्रह्माजीने कहा—बेटा! तुमने मेरे अन्तःकरणमें पुरातन शिवयोगकी स्मृति दिलायी है। तुम्हारे प्रति आदरका भाव होनेसे मैंने चिन्तन करके उस योगको स्मरण कर लिया है। तुम्हारी अधिक तपस्याके प्रभावसे मेरे चित्तमें परम उत्तम शिवभक्तिका उदय हुआ है, जिसने मेरे हृदयको क्षणभरमें अपनी ओर आकृष्ट-सा कर लिया है। जिन पुरुषोंकी सदा आकुलतारहित (परम शान्त) भगवान् सदाशिवके प्रति भक्ति बढ़ती है, वे अपने चरित्रोंसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देते हैं। शिवभक्तोंके साथ वार्तालाप, निवास, मेल-जोल, उनका दर्शन तथा स्मरण—ये सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। पूर्वकालमें सबकी पापराशिको दूर करनेवाला, अविनाशी, करुणासे भरा हुआ और अद्भुत शैव तेज जिस प्रकार प्रकट हुआ था, वह वृत्तान्त सुनो। एक समय मेरे और भगवान् विष्णुके समक्ष एक अग्निमय स्तम्भ प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण लोकोंको लाँघकर ऊपरसे नीचेतक फैला था और सब ओरसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था। उसका कहीं भी आदि-अन्त न होनेके कारण वह सम्पूर्ण दिगन्तोंमें व्याप्त जान पड़ता था। भगवान् शिवके उस तेजोमय स्वरूपको देखकर मैंने भक्तिपूर्ण चित्तसे उसका मानसिक पूजन किया और अपने चारों मुखोंसे वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शिवकी इस प्रकार स्तुति की—

'जो सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके एकमात्र हेतु हैं, उन परम महान् भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रभो! जिनसे सब कुछ प्रकाशित होता है, उन्हीं आपको सादर नमस्कार है। शम्भो! आपका यह विश्वव्यापी तेज सब ओर प्रकाश फैला रहा है; किंतु जो लोग आपकी कृपासे वंचित हैं, वे इसका दर्शन नहीं कर पाते। ठीक वैसे ही, जैसे जन्मके अन्धे सूर्यको नहीं देख पाते। अपने-आप प्रकट हुआ यह निर्मल लिंग अध्यात्म-दृष्टिसे देखनेयोग्य है। यह भीतर और बाहर सर्वत्र विराजमान है, ऐसा आपके भक्त अनुभव करते हैं। देवेश्वर! जैसे दर्पण अपनेमें प्रतिबिम्ब धारण करता है, उसी प्रकार योगीजन अपने अन्तरात्मामें आपके इस प्रज्वलित तेज—अपरिच्छेद्य विग्रहका दर्शन करते हैं। अथवा भगवान् शंकरकी नित्यशक्ति सूक्ष्मसे भी अतिशय सूक्ष्म है, वह शक्ति मुझमें भी विलीन होती है; अतः मुझसे बढ़कर दूसरा