संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २३९
नहीं है। अणु (छोटे-से-छोटा जीव या पदार्थ) भी आपकी कृपाका पात्र बन जानेपर निश्चय ही महत्त्वको प्राप्त होता है। आपसे बढ़कर तो कोई है ही नहीं, किन्तु आपका ही आश्रय लेनेके कारण मुझसे बढ़कर भी दूसरा कोई नहीं है। भगवन्! आपमें लगाया हुआ मन आपसे एक क्षणके लिये भी वियोग नहीं चाहता, फिर किसकी प्रेरणासे मेरी वाणी आपकी महिमाके वर्णनमें प्रवृत्त हो। ईश! महादेव! आप समस्त भुवनोंमें सबसे उत्कृष्ट हैं; अतः स्वयं ही कृपा करके मुझपर प्रसन्न होइये। नाथ! आपके चरणोंमें पड़े हुए इस भक्तको अपेक्षित कार्योंमें नियुक्त होनेके लिये आज्ञा दीजिये।'
विनयपूर्वक यह निवेदन करके मैंने हाथ जोड़कर देव-देवेश्वर भगवान्को बारंबार प्रणाम किया और उन्हींके समीप बैठ गया। तत्पश्चात् नूतन जलधरके समान गम्भीर ध्वनिवाले श्रीविष्णुने शंकरजीकी महिमाके कीर्तनद्वारा अपनी विशुद्ध वाणीको और भी कृतार्थ करते हुए कहा—'तीनों लोकोंके अधीश्वर! प्रभो! गंगाधर! जगन्नाथ! विरूपाक्ष चन्द्रार्धशेखर! आपकी जय हो। शम्भो! आपकी दया असीम है और वह भक्तजनोंपर सदा अकारण बढ़ती रहती है, जिससे उन भक्तोंमें स्वच्छ एवं पूर्ण ज्ञानका आधान होता है। प्रायः सम्पूर्ण विद्याओंका पालन और समस्त ऐश्वर्योंका संग्रह भी आपकी कृपासे ही सम्भव है। आपको जाननेमें आप ही समर्थ हैं, अथवा जिसको आपका कृपाप्रसाद प्राप्त है, वह समर्थ हो सकता है। क्या भ्रमर किसी कीटको आकृष्ट करके उसे अपने स्वरूपकी प्राप्ति नहीं करा देता? उसी प्रकार आप भी अपने तुच्छ भक्तको अपनाकर अपने समान बना लेते हैं। देवता आपके अंशसे उत्पन्न हुए हैं, इसीलिये क्या वे प्रभावशाली नहीं हैं? क्या तपाये लोहेमें जो अग्निदेवता स्थित हैं, उनमें जलानेकी शक्ति नहीं होती? देव! शंकर! सर्वाधार! आप कृपा करके हमारे नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाली अपनी दिव्य मूर्तिका दर्शन कराइये।'
श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार श्रद्धा और भक्तिके साथ प्रणाम और स्तुति करनेवाले ब्रह्मा और भगवान् विष्णुके ऊपर भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए तथा उस तेजोमय स्तम्भसे गौर वर्ण, नीलकण्ठ पुरुषरूपसे प्रकट हुए। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट शोभा पा रहा था। हाथोंमें परशु, बालमृग तथा अभय और विश्रामकी मुद्राएँ थीं। वे ब्रह्मा और विष्णुसे बोले—'मुझमें चित्त लगानेवाले तुम दोनोंकी भक्तिसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम मुझसे कोई वर माँगो।'
भगवान् शंकरके इस वचनसे उन दोनोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हाथ जोड़कर अपना-अपना पृथक् प्रयोजन निवेदन किया और कभी परास्त न होनेवाले त्रिभुवनविधाता भगवान् शिवका वैदिक मन्त्रोंसे स्तवन करते हुए इस प्रकार कहा—'भगवन्! आपके इस दिव्यस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं। आप सतत वर देनेवाले ईश्वर हैं, तेजोमय हैं, देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ महादेव हैं तथा योगियोंके ध्यान करनेयोग्य निरंजन