संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्रह्मरूप हैं। देव! आपने अपने तेजसे सम्पूर्ण आकाशका अन्तराल परिपूर्ण कर रखा है, इससे क्षणभरमें ऐसी स्थिति हो जानेकी सम्भावना है जिससे यह पूछना पड़ेगा कि देवताओंका निवासस्थान कहाँ था— समस्त देवलोक भस्म हो जाना चाहता है। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, देवता और महर्षि आपके तेजसे संतप्त हो आकाशमें न तो ठहर पाते हैं और न कहीं आने-जानेके लिये मार्ग ही पाते हैं। आपके उग्र तेजसे तपती हुई यह समूची पृथ्वी अब चराचर जगत्को उत्पन्न करनेमें समर्थ न होगी। अतः समस्त संसारपर अनुग्रह करनेके लिये आप इस तेजको समेटकर 'अरुणाचल' नामसे स्थावरलिंग हो जाइये। जो मनुष्य आपके अरुणाचल नामक इस ज्योतिर्मय स्वरूपको भक्तिपूर्वक नमस्कार करेंगे, वे देवताओंसे भी अधिक सम्मानित होंगे। अरुणाचल! आपकी शरण लेकर सब लोग ऐश्वर्य, सौभाग्य, महत्त्व तथा कालपर भी विजय प्राप्त करें।'
यह स्तुति सुनकर भगवान् शंकरने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही वर दिया। उस समय कमलाकान्त भगवान् विष्णुने अरुणाचलपति शिवजीसे प्रार्थना करते हुए पुनः कहा— 'करुणानिधान! अरुणाचलेश्वर! प्रसन्न होइये। प्रभो! महेश्वर! आपका प्राकट्य समस्त लोकोंके हितके लिये हुआ है। आपके इस परम अद्भुत स्वरूपकी उपासना थोड़े पुण्यवाले लोगोंको सुलभ नहीं है। मैंने और ब्रह्माजीने वेदोक्त स्तोत्रद्वारा आपका स्तवन किया है। जो मनुष्य आपका पूजन करेंगे, वे निष्पाप एवं कृतार्थ होंगे। जो लोग नाना प्रकारके उपहारों और पूजन-सामग्रियोंद्वारा आपकी पूजा करें, वे अवश्य चक्रवर्ती राजा हों तथा सब पापोंसे तत्काल मुक्त होकर शुद्धचित्त हो जायँ। आपके समीप आये हुए सब मनुष्योंको अहंता और ममताका परित्याग करके निरन्तर आपके चरणकमलोंका ध्यान करना चाहिये।'
तब भगवान् चन्द्रशेखरने 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भगवान् विष्णुको वरदान दिया और अरुणाचलरूपसे भी स्थावरलिंग हो गये। समस्त लोकोंका एकमात्र कारण यह तैजसलिंग अरुणाचल नामसे विख्यात हो इस भूतलपर दृष्टिगोचर हो रहा है। प्रलयकालमें सम्पूर्ण लोकोंको अपने भीतर डुबो देनेवाले चारों समुद्र भी इस अरुणाचलके निकटकी भूमिका स्पर्शतक नहीं कर पाते।
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शिवके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा
ब्रह्माजी बोले—हे सनक! अरुणाचलरूपसे स्थित हुए भगवान् शंकरके स्वरूपका जो लोग दर्शन और नमस्कार करते हैं, वे निश्चय ही कृतार्थ हो जाते हैं। अरुणाचलका दर्शन समस्त तीर्थोंमें स्नान और सम्पूर्ण यज्ञोंके अनुष्ठानका फल देनेवाला है; उससे भगवान् सदाशिवकी प्रसन्नता प्राप्त होती है। जो लोग प्रदक्षिणा, नमस्कार, तपस्या और नियमोंद्वारा अरुणाचलेश्वरका पूजन करते हैं, भगवान् शिव उनके अधीन हो जाते हैं। तपस्या, योग और दानसे भी भगवान् शंकर वैसे प्रसन्न नहीं होते, जैसे कि एक बार भी अरुणाचलके दर्शनसे होते हैं। जिसके द्वारा अरुणाचल-लिंगकी पूजा होती है, उसे कलियुगका दोष नहीं प्राप्त होता तथा उसकी आधि-व्याधि भी नहीं बढ़ने पाती।
नैमिषारण्यतीर्थमें निवास करनेवाले मुनियोंने सूतजीसे कहा—सब स्थानोंमें जो शिवजीका परम उत्तम स्थान हो उसका हमसे वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले—मुनियो! पूर्वकालमें नन्दीश्वरके मुखसे मार्कण्डेयजीने जो कुछ सुना था, उसका वर्णन करता हूँ, आदरपूर्वक सुनो।
मार्कण्डेयजी बोले—नन्दीश्वर! इस त्रिलोकीमें