संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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लिये दण्डनीय ही है। साधु क्षत्रियको उचित है कि यदि कुमार्गपर चले तो अपनी आत्माको भी दण्ड दे। फिर पिता, माता, सुहृद्, भ्राता और पुत्र आदिके लिये तो कहना ही क्या है? मुझे आज बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ है। मैं और मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनका पुत्र ऐसा धर्मज्ञ और धर्मपालक है। तुम वर पानेके योग्य हो, मेरे तथा दूसरे सत्पुरुषोंके द्वारा प्रशंसा पानेके अधिकारी हो। अतः यह शोक छोड़कर तुम्हें स्वस्थ हो जाना चाहिये।'
**बर्बरीक बोला—**पितामह! मैं पापी हूँ, ब्रह्महत्यारेसे भी अधिक घृणाका पात्र हूँ। प्रशंसाके योग्य कदापि नहीं हूँ। प्रभो! न तो आप मेरी ओर देखें और न मेरा स्पर्श ही करें। ब्राह्मणलोग सभी पापोंका प्रायश्चित्त बतलाते हैं; परंतु जो पिता-माताका भक्त नहीं है, उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं।^१ अतः जिस शरीरसे मैंने पितामहको पीड़ा पहुँचायी है, उस अपने शरीरको आज मैं महीसागरसंगममें त्याग दूँगा; जिससे अन्य जन्मोंमें भी ऐसा ही पातकी न होऊँ।
यों कहकर बलवान् बर्बरीक उछलकर समुद्रके भीतर चला गया। समुद्र भी यह सोचकर काँप उठा कि 'मैं कैसे इसका वध करूँ'। तदनन्तर सिद्धाम्बिका तथा चारों दिशाओंकी देवियाँ रुद्रके साथ वहाँ आयीं और उसे हृदयसे लगाकर बोलीं—'वीरेन्द्र! अनजानमें किये हुए पापसे दोष नहीं लगता, यह बात शास्त्रोंमें बतायी गयी है। अतः तुम्हें इसके विपरीत कोई बर्ताव नहीं करना चाहिये।^२ देखो, तुम्हारे पितामह भीम पुत्र-पुत्र पुकारते हुए तुम्हारे पीछे लगे हुए चले आ रहे हैं। तुम्हारी मृत्यु हो जानेपर वे स्वयं भी प्राण त्याग देनेको उत्सुक हैं। वीर! यदि इस समय तुम शरीर छोड़ोगे तो भीमसेन भी शरीरको त्याग देंगे। उस दशामें तुम्हें बड़ा भारी पातक लगेगा। अतः महामते! तुम ऐसा जानकर अपने शरीरको धारण करो। थोड़े ही समयमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारे शरीरका नाश होगा, ऐसा बताया गया है। वत्स! वे साक्षात् भगवान् विष्णु हैं और उनके हाथसे शरीरका नाश होना बहुत उत्तम (मुक्तिदायक) है। इसलिये तुम उस समयकी प्रतीक्षा करो और हमारी बात मानो।' देवियोंके ऐसा कहनेपर बर्बरीक उदास मनसे लौट आया। 'बर्बरीक चण्डिकाके कार्यकी सिद्धिके लिये बड़ा भारी युद्ध करेगा, इसलिये संसारमें चण्डिल नामसे प्रसिद्ध और समस्त विश्वके लिये पूजनीय होगा।' यों कहकर वहाँ आयी हुई सब देवियाँ अन्तर्धान हो गयीं। भीमसेन भी बर्बरीकको साथ लेकर आये और अन्य पाण्डवोंसे भी यह सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सब पाण्डवोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। सबने बार-बार उसकी प्रशंसा की और आलस्य त्यागकर विधिके अनुसार तीर्थ-स्नान किया।
१- सर्वेषामेव पापानां निष्कृतिः प्रोच्यते द्विजैः। पित्रोर्भक्तस्य पुनर्निष्कृतिर्नैव विद्यते ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। ५५-५६)
२- अज्ञातविहिते पापे नास्ति वीरेन्द्र कल्मषम्। शास्त्रेषूक्तमिदं वाक्यं नान्यथा कर्तुमर्हसि ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ६०। ६१)