संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पश्चात् नारदजीकी भी पूजा की। तदनन्तर यादवोंकी सभामें महाराज उग्रसेन इस प्रकार बोले— 'जगदीश्वर श्रीकृष्ण ! मैं एक सन्देह पूछता हूँ, आप उसका समाधान करें। ये जो महाबुद्धिमान् नारदजी हैं, समस्त संसारमें इनकी ख्याति है। मैं जानना चाहता हूँ, ये अत्यन्त चपल क्यों हैं? क्यों वायुकी भाँति समस्त जगत्में चक्कर लगाया करते हैं? इन्हें कलह कराना इतना प्रिय क्यों है? तथा आपमें इनका अत्यन्त प्रेम कैसे है?'
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन् ! आपने जो पूछा है, वह सत्य है। मैं इसका कारण बतलाता हूँ। पूर्वकालमें प्रजापति दक्षने मुनिश्रेष्ठ नारदको शाप दिया था। ऐसा इसलिये हुआ कि सृष्टि-मार्गमें लगे हुए दक्षके कुछ पुत्रोंको नारदजीने अपने वैराग्यपूर्ण उपदेशोंसे विरक्त बनाकर वहाँसे अन्यत्र भेज दिया। यह घटना एक ही बार नहीं, दो बार हुई। यह सब देखकर दूसरे पुत्रोंके भी विचलित होनेसे रुष्ट होकर दक्षने शाप दिया— 'नारद ! तुम सदा संसारमें भ्रमण करते रहोगे, कहीं भी तुम्हारे ठहरनेके लिये स्थान न मिलेगा तथा तुम इधर-उधरकी चुगली खानेवाले होओगे।'
ये दो शाप प्राप्त करके उन्हें दूर करनेमें समर्थ होकर भी नारद मुनिने ज्यों-के-त्यों स्वीकार कर लिये। यही साधुता है कि स्वयं समर्थ होकर भी दूसरोंके अपराध क्षमा कर दे। नारदजी पहले यह देख लेते हैं कि अमुक दैत्य या राक्षस आदिका विनाशकाल आ पहुँचा है, तब वे उसकी कलह-भावना बढ़ाते हैं और चुगलीके लिये झूठ न बोलकर सच्ची बात बताया करते हैं, इसलिये वे पापसे लिप्त नहीं होते। सर्वत्र भ्रमण करते रहनेपर भी इनका मन ध्येयसे विचलित नहीं होता, अतः भ्रमदोषसे ये भ्रान्त नहीं होते तथा मुझमें जो इनका अधिक प्रेम है, उसका भी कारण सुनिये। मैं देवराज इन्द्रद्वारा किये गये स्तोत्रसे दिव्यदृष्टिसम्पन्न श्रीनारदजीकी सदा स्तुति करता हूँ। वह स्तोत्र श्रवण कीजिये—
'जो ब्रह्माजीकी गोदसे प्रकट हुए हैं, जिनके मनमें अहंकार नहीं है, जिनका विश्वविख्यात चरित्र किसीसे छिपा नहीं है, उन देवर्षि नारदको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनमें अरति (उद्वेग), क्रोध, चपलता और भयका सर्वथा अभाव है, जो धीर होते हुए भी दीर्घसूत्री (किसी कार्यमें अधिक विलम्ब करनेवाले) नहीं हैं, उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो कामना अथवा लोभवश झूठी बात मुँहसे नहीं निकालते और समस्त प्राणी जिनकी उपासना करते हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अध्यात्मगतिके तत्त्वको जाननेवाले, ज्ञानशक्तिसम्पन्न तथा जितेन्द्रिय हैं, जिनमें सरलता भरी है तथा जो यथार्थ बात कहनेवाले हैं, उन नारदजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेज, यश, बुद्धि, नय, विनय, जन्म तथा तपस्या सभी दृष्टियोंसे बढ़े हुए हैं, उन नारदजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वभाव सुखमय, वेष सुन्दर तथा भोजन उत्तम है; जो प्रकाशमान, पवित्र, शुभदृष्टिसम्पन्न तथा सुन्दर वचन बोलनेवाले