भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 236
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०७

मेरी स्तुति करेगा, उसके लिये इस पृथ्वीपर कुछ भी दुर्लभ न होगा। विशेषतः रविवारको मेरी पूजा करके जो इसका पाठ करेगा, उसके रोग और दरिद्रताका नाश होगा। वत्स! तुमने मुझे बहुत सन्तुष्ट किया है, अतः तुम्हें यह वर देता हूँ कि इस पृथ्वीपर सर्वज्ञ होकर तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे। तुम्हारे पिता कभी स्मृतिकार होंगे। वत्स! मैं इस स्थानका कभी त्याग नहीं करूँगा।'

भगवान् सूर्यने जब ऐसा कहा, तब ब्राह्मणोंने पुनः उनका पूजन और स्तवन किया। तत्पश्चात् उन द्विजेन्द्रसे आज्ञा लेकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। कुन्तीनन्दन! इस प्रकार इस भूतलपर आश्विनमासमें जयादित्यका प्रादुर्भाव हुआ, इसलिये वह मास वहाँ अति विशेष पर्व माना जाता है। आश्विनमासमें रविवारको कोटितीर्थमें नहाकर जो जयादित्यका पूजन करता है, वह बड़े भारी पुण्यफलको प्राप्त होता है। जयादित्यको लाल फूलमाला चढ़ाने, लाल चन्दन और रोलीका लेप करने, गन्ध-धूप आदि देने तथा घृतपक्व नैवेद्य समर्पण करनेसे ब्रह्मघाती, शराबी, सुवर्णचोर तथा गुरुपत्नीगामी भी अपने समस्त पातकोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको जाता है। इस लोकमें पुत्र, स्त्री, धन और आयु आदि संसारी सुखको पाकर अभीष्ट भोगोंसे सम्पन्न हो सूर्यलोकमें चिरकालतक निवास करता है। प्रत्येक रविवारको जयादित्यका दर्शन, कीर्तन और स्मरण भी सब रोगोंकी शान्ति करनेवाला है। जो अनादि, अनन्त, तेजोनिधि एवं अव्यक्तदेव भगवान् सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, वे रोग-शोकसे रहित सूर्यधाममें लीन होते हैं। अर्जुन ! जो लोग सूर्यग्रहण प्राप्त होनेपर एकाग्रचित्त हो सूर्यकूपमें स्नान करते, प्रयत्नपूर्वक आहुति देते तथा जयादित्यके आगे यथाशक्ति दान देते हैं, उनके पुण्यकी कैसी महिमा है, यह एकाग्रचित्त होकर सुनो। कुरुक्षेत्र, प्रभास, पुष्कर, काशी, प्रयाग अथवा नैमिषारण्यमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य जयादित्यके प्रसादसे वे लोग वहाँ भी पा लेते हैं।


नारदजीके गुणोंका वर्णन तथा गौतमेश्वरकी महिमाके प्रसंगमें योगका निरूपण

अर्जुन बोले— देवर्षे! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखनेवाले, जितेन्द्रिय तथा राग-द्वेषरहित हैं। तथापि आपमें जो कलह करानेकी प्रवृत्ति है, उसके कारण कई हजार देवता, गन्धर्व, राक्षस, दैत्य तथा मुनि नष्ट हो गये। विप्रवर! आपकी ऐसी चेष्टा क्यों होती है? मेरे इस सन्देहका निवारण कीजिये।

सूतजी कहते हैं— शौनक! अर्जुनके मुखसे यह बात सुनकर नारदमुनि हँसते हुए-से बाभ्रव्य मुनिके मुखकी ओर देखने लगे। बाभ्रव्यका जन्म हारीतके कुलमें हुआ था। वे उस समय नारदजीके पास ही उपस्थित थे। बाभ्रव्य बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने नारदजीका मनोभाव समझ लिया और हँसते हुए स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें अर्जुनसे इस प्रकार कहा।

बाभ्रव्य बोले— पाण्डुनन्दन! आपने नारदजीसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है। प्रत्येक मनुष्यके मनमें ऐसा सन्देह हो जाता है। इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे जो बात सुनी है, वही मैं आपको बताऊँगा। आजसे कुछ काल पहलेकी बात है, सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण महीसागरसंगमकी यात्रामें इधर आये थे। उनके साथ उग्रसेन, वसुदेव तथा बभ्रु, प्रद्युम्न आदि भी थे। भगवान्‌ने कुटुम्बिजनोंके साथ महीसागरसंगममें स्नान करके बहुत दान किये। पिण्डदान आदि करके देवपूजनके