संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मन्त्रमें श्रवण हुआ है। ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—यह चार प्रकारकी वाणी सदा आपसे दूर-ही-दूर रहती है—आपतक पहुँच नहीं पाती। तथापि मैं इतना धृष्ट हूँ कि स्वार्थकी कामना लेकर आपका स्तवन करता हूँ। प्रभो! मेरे इस अपराधको क्षमा करें। देव! मार्तण्ड, सूर्य, अंशु, रवि, इन्द्र, भानु, भग, अर्यमा, स्वर्णरेता, दिवाकर, मित्र तथा विष्णु—इन बारह नामोंसे आप विख्यात हैं। द्वादशात्मन्! आपको नमस्कार है। त्रिलोकी आपका गर्भ-गृह है, सम्पूर्ण आकाश जलाधार (अर्घ्य) है, नक्षत्रसमूह पुष्पमाला हैं तथा आप आकाशमें स्थापित ज्योतिर्मय लिंग हैं; आपको नमस्कार है। आप देवताओंके देवता, अनाथोंके नाथ, पालनीय जनोंके पालक तथा दीनोंपर दया करनेवाले हैं। नेत्रोंके भी नेत्र (दृष्टिशक्ति-प्रदाता), मनुष्योंकी बुद्धिकी भी बुद्धि, बुद्धिसे परे तथा जीवके भी जीवन हैं। आपकी जय हो। आप दरिद्रताकी दरिद्रता, निधिकी निधि, रोगके रोग पृथ्वीमें प्रसिद्ध हैं। अप्रमेय जयादित्य! आपकी दीर्घकालतक जय हो। जो नाना प्रकारकी व्याधियोंसे ग्रस्त है, कोढ़के रोगसे पीड़ित है, जिसकी नाक गल गयी है, शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो गया है तथा जो अपनी चेतना भी खो बैठा है, ऐसे मनुष्यको उसके बन्धु-बान्धव, माता-पिता भी छोड़ देते हैं, परंतु सबके ठुकराये हुए उस अनाथ जीवका भी आप पालन करते हैं। हे देव! हे विवस्वान्! आपके सिवा दूसरा कौन इतना दयालु श्रेष्ठ देवता है? आप मेरे पिता हैं, आप ही मेरी माता हैं, आप ही गुरु तथा आप ही बन्धु-बान्धव हैं। आप ही मेरे धर्म तथा आप ही मोक्षके मार्ग हैं। देव! मैं आपका दास हूँ। त्यागिये या उबारिये। मैं पापी हूँ, मूढ़ हूँ, अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाला एवं भयानक हूँ। इतना ही नहीं, मैं पापोंकी निधि हूँ। तथापि प्रतिदिन आपके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करके आपका भजन करता हूँ। हे श्रीजयादित्य! आप अपने भक्तोंका पालन कीजिये।'*
**नारदजी कहते हैं—**महात्मा कमठके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् जयादित्यने हँसते हुए स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें उनसे कहा—'कमठ! तुमने जो यह जयादित्याष्टक सुनाया है, इससे जो
* त्वं नैव दृष्टः केवलसंश्रुतश्च यजुष्येवं व्याहरन्त्यादिदेव।
चतुर्विधा भारती दूरदूरं धृष्टः स्तौमि स्वार्थकामः क्षमैतत्॥
मार्त्तण्डसूर्यांrequestवस्तथेन्द्रो भानुर्भगश्चार्यमा स्वर्णरेताः।
दिवाकरो मित्रविष्णुश्च देव ख्यातस्त्वं वै द्वादशात्मा नमस्ते॥
लोकत्रयं वै तव गर्भगेहं जलाधारः प्रोच्यते खं समग्रम्।
नक्षत्रमाला कुसुमाभिमाला तस्मै नमो व्योमलिंगाय तुभ्यम्॥
त्वं देवदेवस्त्वमनाथनाथस्त्वं पाल्यपालः कृपणे कृपालुः।
त्वं नेत्रनेत्रं जनबुद्धिबुद्धिर्बुद्धेः परस्त्वं जय जीवजीव॥
दारिद्र्यदारिद्र्य निधे निधीनां रोगप्ररोगः प्रथितः पृथिव्याम्।
चिरञ्जयादित्य जयाप्रमेय व्याधिग्रस्तं कुष्ठरोगाभिभूतम्॥
भग्नघ्राणं शीर्णदेहं विसंज्ञं माता पिता बान्धवाः सन्त्यजन्ति।
सर्वैस्त्यक्तं पासि देव विवस्वंस्त्वत्तो देवः कोऽस्ति श्रेष्ठस्त्वदन्यः॥
त्वं मे पिता त्वं जननी त्वमेव त्वं मे गुरुर्बान्धवाश्च त्वमेव।
त्वं मे धर्मस्त्वं च मे मोक्षमार्गो दासस्तुभ्यं त्यज वा रक्ष देव॥
पापोऽस्मि मूढोऽस्मि महोग्रकर्मा रौद्रोऽस्मि पापस्य निधानमस्मि।
तथापि नित्यं प्रणिपत्य पादयोर्भजामि भक्तान् पालय श्रीजयार्क॥