भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०५

विषयमें जितना कहा है, उससे भी ये बहुत बढ़कर हैं।' इस प्रकार उन विप्रोंकी प्रशंसा करके हर्षमें भरे हुए सूर्यदेवने कहा—'श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं सूर्य हूँ, आपका दर्शन करनेके लिये सूर्यलोकसे यहाँ आया हूँ। आज मेरे नेत्र सफल हो गये। आप-जैसे उत्तम ब्राह्मणोंके साथ वार्तालाप करने और बैठनेसे चाण्डाल भी पवित्र होते हैं। देवर्षि नारद भी सर्वथा धन्य हैं, जो त्रिलोकीके तत्त्वको जानते हैं। जिनका श्रेय आपके द्वारा उसी प्रकार बढ़ रहा है, जैसे वैधृति योगमें किये हुए दानका पुण्य बढ़ता है। मैं अपने मन और बुद्धिको एकाग्र करके आप सब लोगोंको प्रणाम करता हूँ; क्योंकि तप, विद्या और सदाचार ही बड़प्पनका प्रधान कारण है। देवताओंका संसर्ग निष्फल नहीं होता, इसलिये मुझसे कोई वर माँगिये; मैं उसे आपलोगोंको दूँगा।'

भगवान् सूर्यकी यह बात सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, स्तुति और चन्दनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका पूजन किया और मण्डलब्राह्मण आदि जपनीय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उनकी इस प्रकार स्तुति की—'आदित्य! आपकी जय हो। स्वामिन्! आपकी जय हो। भानो! आपकी जय हो। निर्मल प्रकाशस्वरूप! आपकी जय हो। वेदोंके पालक! दिवानाथ! सूर्यदेव! आपकी जय हो। आप हमारा उद्धार करें। ब्राह्मणोंके सबसे प्रधान देवता आप ही हैं। ब्राह्मण-सृष्टि सूर्यमयी ही है। आपकी कृपादृष्टि पड़नेसे हमारा यह स्थान अत्यन्त पवित्र हो गया। आज हमारे वेदाध्ययन सफल हो गये। आज हमें अपने समस्त पुण्यकर्मोंका फल मिल गया। गोपते! आपका संग पाकर आज हमारा यह गृह सफल हो गया। यदि आप हमें वर देना चाहते हैं, तो हम यही माँगते हैं कि आप हमारे इस स्थानका कभी परित्याग न करें।'

भगवान् सूर्य बोले—क्योंकि आपलोगोंने पहले 'जयादित्य' कहकर मेरा स्तवन किया है, इसलिये मैं 'जयादित्य' नामसे विख्यात होकर सदा इस स्थानमें निवास करूँगा। हे विप्रगण! जबतक पृथ्वी, समुद्र, पर्वत और नगर विद्यमान हैं, तबतक मैं इस स्थानमें अवश्य रहूँगा; कभी इसका त्याग नहीं करूँगा। यहाँ रहकर मैं अपने भक्तोंके दारिद्र्य, रोगसमूह, दाद-खुजली, कोढ़, चकता तथा अन्य प्रकारकी कोढ़ आदिका नाश करता रहूँगा। जो मानव यहाँ प्रतिष्ठित हुए मेरे श्रीविग्रहका पूजन करेगा, उसकी उस पूजाको मैं ग्रहण करूँगा।

भगवान् सूर्यके ऐसा कहनेपर हारीत आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने वेदोक्त विधिसे उनकी मूर्ति स्थापित की। तत्पश्चात् सब द्विजोंने कहा—'कमठ! तुम्हारे कारण ही भगवान् सूर्य यहाँ विराजमान हुए हैं, अतः पहले तुम्हीं इनका गुणगान करो।' ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ कमठने जयादित्यको प्रणाम करके इस महास्तोत्रका गान किया—'आदिदेव! आपके यथार्थरूपका साक्षात्कार नहीं, केवल यजुर्वेदके