भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 233

२०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मार्गमें कष्ट भोगता है। सभामें पक्षपात करनेवालेको गलगण्डका रोग होता है। सदा क्रोध करनेवाला चाण्डाल होता है। चुगली खानेवाले मनुष्यके मुँहसे सदा दुर्गन्ध आती है। बकरी बेचनेवाला मनुष्य बहेलिया होता है। कुण्ड (पतिके जीते-जी जार पुरुषसे उत्पन्न पुत्र)-का अन्न भोजन करनेवाला मनुष्य सेवक होता है। नास्तिक पुरुष तेली होता है और श्रद्धाहीन मनुष्य मुर्दाके समान बना रहता है। अभक्ष्य भक्षण करनेवाले मनुष्यको गण्डमालाका रोग होता है। सबको दुःख देनेवाला मनुष्य सदा शोकमें डूबा रहता है। अन्यायसे ज्ञान ग्रहण करनेवाला मनुष्य मूर्ख होता है। शास्त्र चुरानेवाला राक्षस होता है। जो पवित्र कथासे द्वेष करता है, वह कीटमुख होता है। नरकसे लौटे हुए पुरुषकी बुद्धि अत्यन्त खोटी होती है। तालाब और बगीचेको नष्ट करनेवाला पुरुष बिना हाथका होता है। व्यवहारमें छलका सहारा लेनेवाला मनुष्य अपने सेवकोंसे मारा जाता है। परायी स्त्रीसे रति करनेवाला पुरुष सदा प्रमेहरोगसे पीड़ित रहता है। खोटा वैद्य वातका रोगी होता है। गुरुपत्नीगामी मनुष्य कोढ़ी होता है। पशुओंसे मैथुन करनेवाला भी प्रमेही होता है। अपने गोत्रकी स्त्रीसे मैथुन करनेवाला सन्तानहीन होता है। माता, बहिन और पतोहूसे सम्भोग करनेवाला मनुष्य नपुंसक होता है। कृतघ्न मनुष्यको समस्त कार्योंमें असफलता प्राप्त होती है।

ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे पापियोंका लक्षण संक्षेपसे बताया है। सम्पूर्ण लक्षणोंका वर्णन करनेमें तो चित्रगुप्त भी मोहित हो सकते हैं। ये नरकोंसे भ्रष्ट हुए पापात्मा सहस्रों योनियोंकी यातनाएँ भोगकर अन्तमें उपर्युक्त चिह्नोंसे युक्त मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं। जो धर्मको नहीं मानते हैं तथा जो दुर्व्यसनोंसे पराजित हैं, उन शेष पापियोंको अनुमानसे ही जानना चाहिये। जिनका पाप नष्ट हो गया है अथवा जो स्वर्गसे लौटे हैं, वे समस्त दुर्व्यसनोंसे मुक्त होकर एकमात्र धर्मका आश्रय लेते हैं। इस विषयमें ये श्लोक स्मरणीय हैं—

धर्मदानकृतं सौख्यमधर्माद् दुःखसम्भवम्।
तस्माद्धर्मं सुखार्थाय कुर्यात् पापं विवर्जयेत्॥
लोकद्वयेऽपि यत्सौख्यं तद्धर्मात्प्रोच्यते यतः।
धर्म एव मतिं कुर्यात् सर्वकार्यार्थसिद्धये॥
मुहूर्तंमपि जीवेद्धि नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि जीवेच्च लोकद्वयविरोधिना॥

'धर्म और दानसे सुख प्राप्त होता है और अधर्मसे दुःखकी उत्पत्ति होती है, अतः सुखके लिये धर्मका आचरण करे और पापको सर्वथा त्याग दे। इस लोक और परलोक दोनों लोकोंमें जो सुख है, उसकी प्राप्ति धर्मसे ही बतायी जाती है; अतः समस्त कार्यों और मनोरथोंकी सिद्धिके लिये धर्ममें ही मन लगावे। मनुष्य दो घड़ी भी पुण्यकर्म करते हुए ही जीवे। उभयलोकविरोधी कर्मके साथ कल्पभर भी जीनेकी इच्छा न रखे।'

विप्रवर! आपने जो कुछ पूछा है उसका मैंने अपनी शक्तिके अनुसार वर्णन किया है। यह अच्छा कहा गया हो या नहीं, उसके लिये आप क्षमा करें। अब और क्या कहूँ।

नारदजी कहते हैं—आठ वर्षके बालक कर्मठका यह भाषण सुनकर भगवान् सूर्य अत्यन्त विस्मित एवं बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस समय हारीत आदि ब्राह्मणोंकी इस प्रकार प्रशंसा की—'अहो! ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंसे यह पृथ्वी धन्य है। भगवान् प्रजापति भी धन्य हैं, जिनकी मर्यादाका इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा पालन हो रहा है। इस समय इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे चारों वेद भी धन्य हो गये हैं। जिन ब्राह्मणोंमेंसे एक बालककी बुद्धि इतनी तीव्र और स्पष्ट है, उन हारीत आदि ब्राह्मणोंकी बुद्धि कैसी होगी? निश्चय ही त्रिलोकीमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो इन ब्राह्मणोंको विदित न हो। नारदने इनके