संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * २०३
मनुष्य किस रूपमें जन्म लेता है? इन सब बातोंको यदि तुम जानते हो तो बताओ।
कमठने कहा—विप्रवर! इस विषयमें मेरे पिताने जो उपदेश दिया है और मेरे चित्तमें जो विचार स्थित है, वह सब आपको बताऊँगा। आप स्थिर होकर सुनिये। ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले मनुष्यको क्षयका रोग होता है, शराबीके दाँत काले होते हैं, सोनेकी चोरी करनेवालेका नख खराब होता है, गुरुपत्नीगामीके शरीरका चमड़ा खराब हो जाता है, इन सबके साथ संसर्ग रखनेवाले पुरुषको वे सभी रोग होते हैं। ये पाँच प्रकारके लोग महापातकी कहलाते हैं। जो साधु पुरुषोंकी निन्दा सुनता है, वह बहरा होता है; आप ही अपनी कीर्तिका बखान करनेवाला पापी गूँगा होता है; गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला मनुष्य मिरगीके रोगसे पीड़ित होता है। जो गुरुजनोंका अपमान करता है, वह कीड़ा होता है। पूजनीय पुरुषोंके कार्यकी उपेक्षा करनेवाले पुरुषकी बुद्धि दूषित होती है। साधुजनोंके द्रव्यकी चोरी करनेको जो जितने पग आगे बढ़ाता है, वह नराधम उतने ही वर्षोंतक पंगु होता है। जो दान देकर फिर छीन लेता है, वह गिरगिटकी योनिमें उत्पन्न होता है। जो क्रोधमें भरे हुए पूजनीय पुरुषोंको प्रसन्न नहीं करता उसे सिरदर्दका रोग होता है। रजस्वला स्त्रीसे समागम करनेवाला मनुष्य चाण्डाल होता है। कपड़ा चुरानेवाला सफेद कोढ़से लांछित होता है। आग लगानेवाला काली कोढ़के रोगसे पीड़ित होता है। चाँदी चुरानेवाला मेढक तथा झूठी गवाही देनेवाला मुखका रोगी होता है। परायी स्त्रियोंको काम-भावसे देखनेवाला नेत्ररोगसे कष्ट पाता है। कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके जो नहीं देता है वह अल्पायु होता है। ब्राह्मणकी वृत्तिका अपहरण करनेवाला सदा अजीर्णरोगका रोगी और अधम होता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारीको भोजन करानेसे मुँह मोड़नेवाला गृहस्थ सदा रोगी होता है। बहुत-सी पत्नियोंके होनेपर किसी एकहीमें अनुराग रखनेवाला पुरुष मेदाके क्षयरोगसे युक्त होता है। स्वामीने जिसे किसी धर्मके कार्यमें लगा दिया हो, वह यदि अन्यायपूर्वक आचरण करता है, अथवा मालिकके धनको स्वयं ही खा जाता है, तो उसे जलोदर रोग होता है। जो बलवान् होकर भी किसीके द्वारा सताये जाते हुए दुर्बलकी उपेक्षा करता है—उसे बचानेकी चेष्टा नहीं करता, वह अंगहीन होता है। अन्न चुरानेवाला भूखसे पीड़ित रहता है। व्यवहारमें पक्षपात करनेवाला मनुष्य जिह्वाके रोगसे युक्त होता है। जो धर्मके कार्यमें लगे हुए मनुष्यको उससे मना कर देता है, वह पत्नीवियोगी होता है। जो अपनी ही बनायी हुई रसोईमें सबसे पहले स्वयं भोजन करता है, उसके गलेमें रोग होता है। पंचयज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना ही भोजन करनेवाला मनुष्य गाँवका सूअर होता है। पर्वोंके दिन मैथुन करनेवालेको प्रमेहका रोग होता है। अर्थसंकटमें पड़े हुए मित्र, बन्धु, स्वामी तथा प्रिय सेवकोंका परित्याग करके उनकी ओरसे मनको हटा लेनेवाला निर्दय मनुष्य सदा जीविकाके लिये कष्ट पाता रहता है। जो माता-पिता, गुरु और स्वामीकी छलसे सेवा करता है, वह बड़े कष्टसे धन पाकर भी उससे वंचित हो जाता है। जो विश्वास करनेवाले पुरुषके धनको हड़प लेता है, वह सदा दुःखोंका भागी होता है। जो धार्मिक पुरुषके प्रति क्षुद्रतापूर्ण बर्ताव करता है, वह बौना होता है। जो दुबले बैलको हल या गाड़ीमें जोतता है, उसकी कमरमें लूता (मकरी)- का रोग होता है। गायकी हत्या करनेवाला जन्मसे ही अन्धा होता है। गौओंको दुःख देनेवाला मनुष्य पशुसे रहित होता है। जो मारने आदिके द्वारा गौओंके प्रति निर्दयताका परिचय देता है, वह