भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रूई, नमक और सप्तधान्य दान करके मनुष्य सुखपूर्वक परलोककी यात्रा करते हैं।

चित्रगुप्त यमलोकमें गये हुए पापी और पुण्यात्मा पुरुषोंकी सूचना यमराजको देते हैं। फिर वह एक वर्षतक प्रेतलोकमें निवास करता है। उसी वर्षमें उसे भोगदेहकी प्राप्ति होती है। भाई-बन्धु जो जलयुक्त कुम्भदान और अन्न आदि दान करते हैं, उसे ही वह प्रतिदिन खाकर पुष्ट होता है। उसने पहले भी जो अन्न आदिका दान कर रखा है, वह भी यमलोकमें उसके पास स्वयं उपस्थित हो जाता है। जिसने स्वयं कुछ दान नहीं किया तथा जिसके लिये दूसरा कोई अन्नदाता और जलदाता नहीं है, वह यमलोकमें भूख और प्याससे पीड़ित होता है। भाई-बन्धुओंद्वारा किया हुआ जलदान उसके पास नदी होकर पहुँचता है। जिसके लिये यहाँ षोडश श्राद्धपूर्वक प्रतिमास मासिक श्राद्ध नहीं किया जाता, वह प्रेतयोनिसे मुक्त नहीं होता है। प्रेतलोकमें मनुष्यके दिनके बराबर ही दिन होता है। इसलिये प्रेतको प्रतिदिन एक वर्षतक अन्न देना चाहिये। यमलोकमें सर्दी, आँधी और धूपके कष्टसे युक्त पापात्मा पुरुषकी रक्षा श्माशानिक नामवाले भयंकर यमदूत करते हैं। जैसे इस लोकमें भी कठोर पुरुष बन्धनमें पड़े हुए किसी कैदीकी रक्षा करते हैं। जिसके लिये षोडश श्राद्धपूर्वक प्रेतपिण्ड नहीं दिये जाते, उसका कई युगोंके बाद भी प्रेतयोनिसे उद्धार नहीं होता। प्रेतपिण्ड देनेके पश्चात् जब भाई-बन्धु एक वर्ष पूरा होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्धका अनुष्ठान भलीभाँति कर देते हैं, तब जीवका भोगशरीर पूर्णताको प्राप्त हो जाता है। पापात्मा जीव भयंकर शरीर प्राप्त करता है और धार्मिक पुरुषको परम उत्तम दिव्य रूपकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर जीव अपने कर्मके अनुसार स्वर्ग या नरकमें जाता है। रौरव आदि नरक पातालतलमें स्थित हैं, देवता आदि पुण्यात्मा स्वर्गलोकके ऊपर सत्यलोकतक निवास करते हैं। इतिहास, पुराण, वेद तथा स्मृतियोंमें जो पुण्यकर्म विहित है, उससे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। उसके विपरीत पाप करनेसे नरक होता है। स्वर्ग हो या नरक, वहाँ भी मनुष्य अपने कर्मोंके अनुरूप नियत समयतक ही निवास करता है। वर्षके पहले ही जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध कर दिया जाता है, उसका भी प्रेतत्व एक वर्षतक अवश्य रहता है। जिन्होंने अश्वमेध आदि तीन यज्ञोंद्वारा यजन किया हो अथवा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवताओंकी पूजा की हो, या जो सम्मुख युद्धमें मारे गये हों, वे कभी प्रेतलोकमें नहीं जाते। केवल पुण्यसे एकमात्र स्वर्गकी प्राप्ति होती है और केवल पापसे एकमात्र अन्धकारपूर्ण नरकमें जाना पड़ता है। पाप और पुण्य दोनोंके अनुष्ठानसे मानव स्वर्ग और नरक दोनोंमें जाता है और उसीके अनुसार उसको शरीर भी प्राप्त हो जाता है। विप्रवर! जन्म, मृत्यु और परलोकवास आपके इन तीन प्रश्नोंको लेकर, जैसी कि मेरे पिताने मुझे शिक्षा दी है, आपसे निवेदन किया। अब और आप क्या सुनना चाहते हैं? उसे भी कहूँगा।

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पापकर्मोंके फल, जयादित्यकी स्तुति और महिमा

**अतिथि बोले—**कमठ! तुमने शास्त्रीय मतका आश्रय लेकर परलोकका जो यह स्वरूप बतलाया है, वह वैसा ही है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है; तथापि इस विषयमें नास्तिक, पापाचारी तथा मन्दबुद्धि मनुष्य सन्देह करते हैं। उनका सन्देह दूर करनेके लिये तुम कर्मोंके फलका निरूपण करो। किस-किस पापकर्मका कौन-सा फल यहीं प्राप्त हो जाता है तथा किस पापके प्रभावसे