भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 230
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *२०१

उत्पन्न होता है, यह बात बता दी गयी। अब किस प्रकार उसकी मृत्यु होती है, यह सुनिये। कर्मके अनुसार आयु क्षीण होनेपर जब मनुष्योंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय अपने कर्मोंके अधीन रहनेवाले जीवको यमराजके दूत शरीरसे बाहर खींचते हैं। तब पुण्य और पापके बन्धनमें बँधा हुआ जीव पंचतन्मात्राओंको तथा मन, बुद्धि और अहंकारको साथ लेकर शरीरको त्याग देता है। पुण्यात्मा पुरुषोंके प्राण मुखमण्डलमें स्थित सात छिद्रोंके द्वारा बाहर निकलते हैं। पापियोंके प्राण गुदा-मार्गसे बाहर होते हैं और योगी पुरुषोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर ऊर्ध्वलोकमें गमन करते हैं।

मृत्यु होनेपर जीव उसी क्षणमें आतिवाहिक शरीर धारण करता है; वह अँगूठेकी पोरके बराबर होता है। उस शरीरका निर्माण अपने ही प्राणोंसे किया जाता है। उस आतिवाहिक शरीरमें जब जीव स्थित हो जाता है, तब यमराजके दूत उस देहको बाँधकर बलपूर्वक यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं। वह मार्ग तपे हुए भाड़के समान, गरम किये हुए लोहेके गोलेके सदृश, तपी हुई बालूवाले स्थानकी भाँति तथा जलते हुए ताम्रपत्रके समान होता है। पृथ्वीसे छियासी हजार योजन दूर यमराजकी पुरी है, जहाँ यमदूत पापी जीवको घसीटकर ले जाते हैं। मार्गमें कहीं अत्यन्त सर्दी पड़ती है, कहीं अत्यन्त दुर्गम स्थान लाँघना पड़ता है, कहीं भारी अन्धकार छाया रहता है तथा कहीं अग्निके समान मुखवाले काक, कंक, जम्बुक, मक्खी, डाँस, मच्छर तथा साँप और बिच्छू आदि जीव काट खाते हैं। उनके काटनेपर जीव चीखता और चिल्लाता है, परंतु मरता नहीं है। कहीं-कहीं भयंकर राक्षस उसे खाते, घसीटते और इधर-उधर फेंकते हैं। कहीं तपी हुई बालूवाले अत्यन्त भयंकर मार्गसे जलता हुआ पापी जीव ले जाया जाता है। यमपुरीके उस अत्यन्त दुस्तर मार्गको वह केवल दस मुहूर्त (चार घंटे)-में पार करता है; परंतु उतना ही समय वह एक वर्षके बराबर बड़ा भारी समझता है। उस मार्गमें पापी जीवको पीब और रक्तकी धारा बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है, जिसमें बाल ही शैवालका काम देते हैं।

यमलोकमें पहुँचनेपर यमदूत पापी मनुष्यको ले जाकर यमराजके सामने खड़ा कर देते हैं। पापात्मा जीव काल और अन्तक आदिसे घिरे हुए यमराजको बड़े भयंकर रूपमें देखता है तथा पुण्यात्मा पुरुष यमराजका परम शान्त सौम्य रूपमें दर्शन पाता है। मनुष्य ही यमलोकमें जाते हैं, दूसरे प्राणी नहीं। अन्य प्राणियोंकी मृत्यु होनेपर शीघ्र ही किसी-न-किसी योनिमें उनका जन्म हो जाता है। इस प्रकार उनकी योनिपूर्ति मात्र की जाती है। केवल मनुष्य ही प्रेत होते सुने जाते हैं, अन्य प्राणी नहीं। धर्मात्मा पुरुष यमलोकमें जानेपर वहाँ पूजित होता है और पापी जीव बन्धनमें डाला जाता है।

विप्रवर! धर्मात्मा पुरुष जिस प्रकार परलोकमें जाते हैं, उस मार्गका वर्णन करता हूँ। जो इस लोकमें बगीचा और वृक्षका दान करते हैं, वे फल और फूलवाले वृक्षोंकी छायासे होकर सुखपूर्वक यात्रा करते हैं। इसी प्रकार जो छत्र दान करनेवाले मनुष्य हैं, वे भी छायामें ही सुखसे जाते हैं। उपानह (जूता आदि) दान करनेवाले सवारीसे यात्रा करते हैं। कुआँ और पोखरा खुदानेवाले प्यासकी पीड़ासे रहित होकर जाते हैं। सवारी, शय्या और आसन देनेवाले लोग विमानोंपर बैठकर जाते हैं। जो लोग भोजन-दान करनेवाले हैं, वे लोग भक्ष्य-भोज्यसे भलीभाँति तृप्त होकर यात्रा करते हैं। दीप-दान करनेवाले उजालेमें जाते हैं, गोदान करनेवाले वैतरणी नदीको सुखसे पार करते हैं। जो जन्मसे ही लेकर जीवनभर भगवान् सूर्य, भगवान् शिव अथवा भगवान् विष्णुकी पूजा करते हैं, वे यमदूतोंसे पूजित होकर भगवान्‌के धाममें जाते हैं। भूमि, गौ, सोना, लोहा, तेल,