भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 229
२००* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और मांस—इन चार धातुओंसे युक्त बताये गये हैं। समस्त प्राणियोंकी जिह्वा रक्त-मांसमयी ही होती है। दोनों हाथ, दोनों ओठ, लिंग और गला—इन छः स्थानोंमें चर्मप्रधान मांस और रक्त होते हैं। इस प्रकार इन सात धातुओंके बने हुए पचीस तत्त्वयुक्त शरीरमें जीव निवास करता है। त्वचा, रक्त और मांस—ये तीनों माताके अंशसे तथा मेदा, मज्जा और अस्थि—ये पिताके अंशसे उत्पन्न बताये गये हैं। इन्हीं छः कोषोंसे इस शरीरका संगठन हुआ है।

यह पांचभौतिक शरीर पाँच भूतोंसे उत्पन्न होनेवाले अन्नद्वारा जिस प्रकार पुष्टिको प्राप्त होता है, उसका वर्णन करता हूँ। देहधारी जीव पिण्ड, कौर तथा ग्रासके रूपमें जो अन्न खाते हैं, उसे प्राणवायु पहले स्थूलाशयमें एकत्र करती है; फिर उस अन्नमें प्रवेश करके अन्न और जलको पृथक्-पृथक् कर देती है। जलको अग्निके ऊपर रखकर अन्नको उसके ऊपर रखती है और स्वयं जलके नीचे स्थित हो धीरे-धीरे अग्निको उद्दीप्त करती है। वायुसे उद्दीप्त हुई अग्नि जलको अत्यन्त गरम कर देती है; फिर उस उष्ण जलसे वह अन्न सब ओरसे पकने लगता है। पकनेपर उसके दो भाग हो जाते हैं; मैल अलग छँट जाती है और रस पृथक् हो जाता है। मल निकलनेके बारह मार्गोंसे वह छँटी हुई मैल शरीरसे बाहर हो जाती है। दो कान, दो आँख, दो नाक, जिह्वा, दाँत, लिंग, गुदा, नख और रोमकूप—ये बारह मलके आश्रय हैं। शरीरकी सब नाड़ियाँ सब ओरसे हृदय-कमलमें बँधी हुई हैं। व्यान वायु पूर्वोक्त अन्न-रसको उन नाड़ियोंके मुखमें रख देती है; तब समान वायु सभी नाड़ियोंको उस रससे परिपूर्ण करती है। तत्पश्चात् वे रसपूर्ण नाड़ियाँ देहमें सब ओर उस रसको पहुँचा देती हैं। नाड़ियोंमें स्थित हुआ वह रस रंजक अग्निकी उष्णतासे पकने लगता है और पकते-पकते रुधिररूपमें परिणत हो जाता है। तदनन्तर त्वचा, रोम, केश, मांस, स्नायु, शिरा, अस्थि, नख, मज्जा, इन्द्रियोंकी शुद्धि तथा वीर्यकी वृद्धि—ये कार्य क्रमशः होते हैं। इस प्रकार अन्नका बारह रूपोंमें परिणाम बताया जाता है। इन सबसे बना हुआ यह शरीर पुण्यके लिये प्राप्त हुआ है, जैसे सुन्दर रथ भार ढोनेके लिये ही होता है। यदि वह भार न ढो सके तो, केवल तेल लगाने आदि नाना प्रकारके यत्नोंद्वारा रथकी रक्षा करनेसे क्या कार्य सिद्ध हो सकता है? इसी प्रकार उत्तम-उत्तम भोजनोंसे पुष्ट किये हुए इस शरीरके द्वारा पुण्य-सम्पादनके सिवा और क्या लाभ है? यदि यह पुण्य नहीं करता, तो पशुके तुल्य है। इस विषयमें ये श्लोक स्मरण रखने योग्य हैं—

यस्मिन्काले च देशे च वयसा यादृशेन च।
कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते॥
तस्मात् सदा शुभं कार्यमविच्छिन्नसुखार्थिभिः।
विच्छिद्यन्तेऽन्यथा भोगा ग्रीष्मे कुसरितो यथा॥
यस्मात्पापेन दुःखानि तीव्रानि सुबहून्यपि।
तस्मात्पापं न कर्तव्यमात्मपीडाकरं हि तत्॥

'जिस समय जिस देशमें और जिस आयुसे शुभ तथा अशुभ कर्म किये जाते हैं उसी देश, काल और आयुमें कर्ताको उनका फल भोगना पड़ता है। इसलिये अक्षय सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। अन्यथा गरमीमें सूख जानेवाली छोटी-छोटी नदियोंकी भाँति समस्त सुख-भोग छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। क्योंकि पापसे बहुत तीव्र दुःख प्राप्त होते हैं, अतः पाप-कर्मका आचरण कदापि नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह अपनेको पीड़ा देनेवाला है।'

महात्मन्! इस प्रकार मैंने आपके प्रश्नका यथाशक्ति उत्तर दिया है। प्राणी किस प्रकार