भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228
  • माहे‍श्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९९

गड्ढोंसे प्रवृत्त होकर वे मज्जा, मेदा आदि धातु इस शरीरको धारण करते हैं। इन गड्ढोंके सिवा शरीरमें सात सीवनी (विशेष नाड़ी) हैं। इनमेंसे पाँच तो मस्तककी ओर गयी हैं, एक नाड़ी लिंगतक तथा एक जिह्वातक गयी है। सब नाड़ियाँ नाभि-कमलसे ही सब ओर गयी हैं। इन सबमें मस्तककी ओर गयी हुई तीन नाड़ियाँ प्रधान हैं—सुषुम्ना, इडा और पिंगला। इडा और पिंगला नाड़ी नासिकाके द्वारतक पहुँची हुई है। ये ही दोनों शरीरकी वृद्धि एवं पुष्टि करनेवाली हैं। शरीरमें वायु, अग्नि तथा चन्द्रमा—ये पाँच-पाँच भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—ये वायुके पाँच भेद माने गये हैं। उच्छ्वास (ऊपरकी ओर श्वास खींचना), निःश्वास (श्वासको बाहर निकालना) तथा अन्न और जलको शरीरके भीतर पहुँचाना—ये तीन प्राणवायुके कर्म हैं। कण्ठसे लेकर मस्तकतक इसका निवासस्थान है। मल, मूत्र तथा वीर्यका त्याग और गर्भको योनिसे बाहर निकालना यह अपान वायुका कर्म बताया गया है। इसका स्थान गुदाके ऊपर है। समान वायु खाये हुए अन्नको धारण करती, उसके विभिन्न अंशोंको बिलगाती तथा सम्पूर्ण शरीरमें रस-संचार करती हुई बेरोक-टोक विचरती है। वाक्य बोलना, उद्गार (कण्ठके भीतरसे कुछ निकालना) तथा कर्मोंके लिये सब प्रकारके प्रयत्न करना—ये उदान वायुके कार्य हैं। इसका स्थान कण्ठसे लेकर मुखतक है। व्यान वायु सदा हृदयमें स्थित रहती है और सम्पूर्ण देहका भरण-पोषण करती है। धातुको बढ़ाना, पसीना, लार आदिको निकालना तथा आँखके खोलने-मीचनेकी क्रिया करना—ये सब व्यान वायुके कार्य हैं।

पाचक, रंजक, साधक, आलोचक तथा भ्राजक—इन पाँच रूपोंमें अग्नि इस शरीरके भीतर स्थित है। पाचक अग्नि सदा पक्वाशयमें स्थित होकर खाये हुए अन्नको पचाती है। रंजक अग्नि आमाशयमें स्थित होकर अन्नके रसको रँगकर रक्तके रूपमें परिणत कर देती है। साधक अग्नि हृदयमें रहकर बुद्धि और उत्साह आदिको बढ़ाती है। आलोचक अग्नि नेत्रोंमें निवास करके रूप देखनेकी शक्ति बढ़ाती है तथा भ्राजक अग्नि त्वचामें स्थित हो शरीरको निर्मल एवं कान्तिमान् बनाती है। क्लेदक, बोधक, तर्पण, श्लेषण तथा आलम्बक—इन पाँच रूपोंमें चन्द्रमाका शरीरके भीतर निवास है। क्लेदक चन्द्रमा पक्वाशयमें स्थित होकर प्रतिदिन खाये हुए अन्नको गलाता है। बोधक रसनेन्द्रियमें रहकर मधुर आदि रसोंका अनुभव कराता है। तर्पण चन्द्रमा मस्तकमें स्थित होकर नेत्र आदि इन्द्रियोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करता है। इसीलिये उसका नाम तर्पण है। श्लेषण सब सन्धियोंमें व्याप्त होकर उन्हें परस्पर मिलाये रखता है तथा आलम्बक चन्द्रमा हृदयमें स्थित हो शरीरके सब अंगोंको परस्पर अवलम्बित रखता है। इस प्रकार वायु, अग्नि तथा चन्द्रमाने इस शरीरको धारण कर रखा है। इन्द्रियोंके छिद्र, रोमकूप तथा उदरका अवकाश-भाग—ये सब आकाशजनित हैं। नासिका, केश, नख, हड्डी, धीरता, भारीपन, त्वचा, मांस, हृदय, गुदा, नाभि, मेदा, यकृत्, मज्जा, आँत, आमाशय, शिरा, स्नायु तथा पक्वाशय—इन सबको वेदवेत्ता विद्वानोंने पृथ्वीका अंश बताया है। नेत्रोंमें जो श्वेत भाग है, वह कफसे उत्पन्न होता है और काला भाग वायुसे पैदा होता है। श्वेत भाग पिताका तथा काला भाग माताका अंश है। नेत्रमें पाँच मण्डल होते हैं। पहला पक्ष्म-मण्डल, दूसरा चर्म-मण्डल, तीसरा शुक्ल-मण्डल, चौथा कृष्ण-मण्डल तथा पाँचवाँ दृङ्-मण्डल है। नेत्रके दो भाग और हैं—उपांग और अपांग। नेत्रोंका जो अन्तिम किनारा है, उसे उपांग कहते हैं और नासिकाके मूल भागसे मिला हुआ जो नेत्रका अंश है, उसका नाम अपांग है। दोनों अण्डकोष मेदा, रक्त, कफ

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 228, कुल 1406 में से · BharatKosha