भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 227

१९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


(तामस, राजस और सात्त्विक) कर्म करने लगता है। मनुष्यका शरीर एक घरके समान है। इसमें हड्डियाँ ही प्रधान स्तम्भ हैं, नस-नाड़ियोंके बन्धनसे ही यह बँधा हुआ है, रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे यह लिपा हुआ है, विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्यका पात्र है। सात धातुरूपी सात दीवारोंसे यह अत्यन्त दृढ़ बना हुआ है, केश और रोमरूपी घास-फूससे इसे छाया गया है, मुख ही इस घरका प्रधान दरवाजा है। शेष दो आँख, दो कान, दो नाक, लिंग और गुदा—ये आठ खिड़कियाँ इस घरकी शोभा बढ़ा रही हैं। दोनों ओठ मुखरूपी द्वारके किवाड़ हैं, दाँतोंकी अर्गलासे इस द्वारको बंद किया गया है। नाड़ी ही इसकी नाली और पसीने आदि ही इसके गंदे जलके प्रवाह हैं। यह देह-गेह कफ और पित्तमें डूबा हुआ है। जरावस्था और शोकसे व्याप्त है, कालकी मुखाग्निमें इसकी स्थिति है, राग और द्वेष आदिसे यह सदा ग्रस्त रहता है तथा यह नाना प्रकारके शोककी उत्पत्तिका स्थान है। इस प्रकार मनुष्योंका यह देहरूपी गेह उत्पन्न होता है, जिसमें क्षेत्रज्ञ आत्मा गृहस्थके रूपमें निवास करता है और बुद्धि उसकी गृहिणी है। इस शरीरमें रहकर जीव नाना प्रकारके साधनोंमें संलग्न हो नरक, स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त करता है।

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कमठद्वारा शरीरकी उत्पत्ति, विनाश तथा जीवके परलोकवासका वर्णन

अतिथि बोले—वत्स कमठ! तुम्हारी बुद्धि तो वृद्धोंकी-सी है। तुम बहुत अच्छा प्रतिपादन कर रहे हो। अब मैं तुमसे शरीरका लक्षण सुनना चाहता हूँ; उसे बताओ।

कमठने कहा—विप्रवर! जैसा यह ब्रह्माण्ड है, वैसा ही यह शरीर भी बताया जाता है। पैरोंका मूल (तलवा) पाताल है, पैरोंका ऊपरी भाग रसातल है, दोनों गुल्फ तलातल हैं, दोनों पिण्डलियोंको महातल कहा गया है, दोनों घुटने सुतल, दोनों ऊरु (जाँघ) तथा कटिभाग अतललोक हैं। नाभिको भूलोक, उदरको भुवर्लोक, वक्षःस्थलको स्वर्गलोक, ग्रीवाको महर्लोक और मुखको जनलोक कहते हैं। दोनों नेत्र तपोलोक हैं तथा मस्तकको सत्यलोक कहा गया है। जैसे पृथ्वीपर सात द्वीप स्थित हैं, उसी प्रकार इस शरीरमें सात धातुएँ हैं, उनके नाम सुनिये। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा और वीर्य—ये सात धातुएँ हैं। शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ हैं तथा तीस लाख छप्पन हज़ार नौ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जैसे नदियाँ इस पृथ्वीपर जल बहाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ शरीरमें रसका संचार करती हैं। यह शरीर साढ़े तीन करोड़ स्थूल एवं सूक्ष्म रोएँसे आच्छादित है। स्थूल रोएँ तो दिखायी देते हैं और सूक्ष्म नहीं दिखायी देते। शरीरमें छः अंग प्रधान बताये जाते हैं—दो बाँह, दो जाँघें, मस्तक और उदर। देहके भीतर साढ़े तीन-तीन व्याम* पुरुषकी तीन आँतें हैं। स्त्रियोंकी आँतें तीन-तीन व्यामकी ही होती हैं; वेदवेत्ता द्विज ऐसा ही कहते हैं। हृदयमें एक कमल बताया जाता है, जिसकी नाल तो है ऊपरकी ओर और मुख है नीचेकी ओर। उस हृदय-कमलके वामभागमें प्लीहा है और दक्षिण-भागमें यकृत्। शरीरमें मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, कफ, विष्ठा, रक्त तथा रसके गड्ढे हैं; इनका माप दो-दो अंजलि माना गया है। उन्हीं


* यह लम्बाईकी एक माप है। दोनों हाथोंको जहाँतक हो सके, दोनों बगलमें फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेपर जितनी दूरी होती है, वह व्याम कहलाती है।