संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 226, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९७
दीर्घकालतक उस योनिमें रहते हुए महात्मा पुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, उपभोग और समीप बैठने आदिसे स्थावर शरीरसे मुक्त होकर वह मनुष्य होता है। मनुष्य होनेपर भी वह दुःखी, दरिद्रता आदिसे घिरा हुआ तथा विकलेन्द्रिय (अन्धा, बहरा, काना, कुबड़ा, लँगड़ा, लूला आदि) होता है। यह सब लोगोंके प्रत्यक्ष है। यह सब पापका ही लक्षण है। जो पाप और पुण्य दोनोंसे मिश्रित कर्मवाला पुरुष है, वह पशु-पक्षी आदिकी योनिको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह इस संसारमें मनुष्य होता है। जिसका पुण्य अधिक और पाप थोड़ा होता है, वह पहले दुःखी होकर पीछे सुखी होता है। जिसका पाप बहुत अधिक और पुण्य बहुत कम हो, वह पहले सुखी और पीछे दुःखी होता है; यह मिश्रित कर्मका लक्षण है। इनमेंसे पहले मनुष्यकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनिये।
पुरुष और स्त्रीके वीर्य तथा रजका संगम होनेपर सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा शुभाशुभ कर्मसंस्कारके साथ जीव गर्भमें प्रवेश करके रजोवीर्यमय कललमें स्थित होता है। उस समय वह मूर्च्छित अवस्थामें रहकर एक मासतक कललमें ही पड़ा रहता है। दूसरा महीना आनेपर वह कललाकार जीव घनीभावको प्राप्त हो जाता है। तीसरे महीनेमें उसके अवयवोंका निर्माण होने लगता है। (इस प्रकार होते हुए) सातवें महीनेमें वह माताके खाये-पीये हुए अन्न और जलका सार अंश ग्रहण करने लगता है। आठवें और नवें महीनेमें उस बालकको गर्भमें बड़ा उद्वेग प्राप्त होता है। उसके सब अंग झिल्लीमें लपेटे हुए होते हैं और हाथोंकी अंगुलियाँ मुखसे बँधी होती हैं। यदि गर्भका बालक अधिकतर उदरके मध्यभागमें रहता है तब वह नपुंसक है, यदि वाम भागमें ठहरता है तो कन्या है, और यदि दक्षिण भागमें रहा करता है तो पुरुष है। इस प्रकार वह उदरके किसी एक भागमें स्थित होता है। जिन योनियोंमें वह जन्म लेता है उनका ज्ञान उस समय उसे होता है। इतना ही नहीं, उसे पहलेके अनेक जन्मोंकी बातोंका भी स्मरण हो आता है। वह गाढ़ अन्धकारमें अदृश्य होकर पड़ा रहता है। वहाँकी दुर्गन्धसे वह अत्यन्त मोहको प्राप्त होता है। यदि माता ठंडा जल पीती है तो उसे सर्दी मालूम होती है। यदि गरम जल पीती है तो उसे गरमीका अनुभव होता है। माताके मैथुन या परिश्रम करनेपर उसको क्लेश होता है। यदि माताको कोई रोग है तो उससे गर्भके बालकको भी पीड़ा होती है। इसके सिवा इस बालकको स्वयं भी ऐसे रोग होते हैं, जिन्हें पिता-माता नहीं देख पाते। अधिक सुकुमारता होनेसे वे रोग गर्भस्थ शिशुके अंगोंमें तीव्र वेदना उत्पन्न करते हैं। उस अवस्थामें थोड़े-से समयको भी वह सौ वर्षोंके समान दुःसह मानता है। अपने प्राचीन कर्मोंसे भी गर्भमें बालकको बड़ा सन्ताप होता है। वहाँ वह बार-बार पुण्य करनेके मनसूबे बाँधता है। 'यदि मैं मनुष्य-शरीरमें जन्म और जीवन पा जाऊँ तो ऐसा कार्य करूँगा, जिससे निश्चय ही मेरा मोक्ष हो जाय।' सीमन्तोन्नयन-संस्कारके बाद उपर्युक्त चिन्तामें पड़े हुए बालकके शेष दो मास अधिक पीड़ाके कारण तीन युगोंके समान बीतते हैं। तत्पश्चात् जन्मका समय आनेपर प्रसूति वायुसे प्रेरित होकर नीचे मुखवाला वह बालक बड़ी पीड़ाका अनुभव करता है तथा योनिके संकीर्ण द्वारसे कष्टपूर्वक निकलने लगता है। उस समय उसे ऐसी पीड़ा होती है, मानो कोई उसकी चमड़ी नोंच रहा हो। किसीके हाथका स्पर्श आदि भी उसे आरेकी धारके स्पर्श-सा जान पड़ता है। जन्म लेनेके पश्चात् वह अचेत बालक केवल माताके स्तनमात्रको जानता है। पूर्वकर्मोंके अधीन होनेके कारण उसका गर्भगत ज्ञान नष्ट हो जाता है। फिर तो वह पूर्ववत् काले, लाल और सफेद