संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्राह्मण देवताकी ओर दौड़ पड़े। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। नये आये हुए उन श्रेष्ठ द्विजको नमस्कार करके वे सब-के-सब प्रसन्नतापूर्वक बोले—'विप्रवर! आज हमारा दिन बड़ा ही पुण्यजनक है, आज यह स्थान परम उत्तम है; क्योंकि आपने स्वयं कृपा करके यहाँ पदार्पण किया है। इसमें सन्देह नहीं कि उत्तम ब्राह्मण कृपा करके ही किसी धन्य गृहस्थको पवित्र करनेके लिये उसके घर अतिथिके रूपमें पधारते हैं। अतः आप इन पैरोंसे चल-फिरकर आज हमारे गृहोंको पवित्र कीजिये। साथ ही दर्शन, भोजन और विश्राम आदिके द्वारा हमारेसहित इस स्थानको भी पावन बनाइये।'
अतिथि बोले—ब्राह्मणो! भोजन दो प्रकारका होता है—एक प्राकृत और दूसरा परम। अतः मैं आपलोगोंका दिया हुआ उत्तम परम भोजन प्राप्त करना चाहता हूँ।
अतिथिकी यह बात सुनकर हारीतने अपने आठ वर्षके बालकसे कहा—'बेटा कमठ! क्या तुम ब्राह्मणके बताये हुए भोजनको जानते हो?'
कमठने कहा—पिताजी! मैं आपको प्रणाम करके वैसे परम भोजनका परिचय दूँगा तथा ब्राह्मणदेवताको वह भोजन देकर तृप्त करूँगा। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्वोंके समुदायको जो तृप्त करता है, वही प्राकृत भोजन कहलाता है। वह छः^१ रसों और पाँच^२ भेदोंवाला बताया गया है। उसके भोजन करनेसे शरीररूपी क्षेत्रकी तृप्ति होती है। दूसरा जो परम भोजन कहा गया है, उसकी व्याख्या इस प्रकार है—परम कहते हैं आत्माको, उसका जो भोजन है वही परम भोजन है। अतः नाना प्रकारके धर्मका जो श्रवण है, उसे अन्न कहा गया है। क्षेत्रज्ञ आत्मा उस अन्नका भोक्ता है और दोनों कान उस अन्नको ग्रहण करनेके लिये मुख हैं। पिताजी! वही परम भोजन आज मैं इन ब्राह्मणदेवताको दूँगा। 'विप्रवर! आपकी जो इच्छा हो पूछिये, विद्वान् ब्राह्मणोंकी इस सभामें अपनी शक्तिके अनुसार मैं आपको सन्तुष्ट करूँगा।'
कमठकी यह महत्त्वपूर्ण बात सुनकर अतिथि ब्राह्मणने मन-ही-मन उसकी सराहना की और यह प्रश्न उपस्थित किया—'जीव कैसे उत्पन्न होता है?'
कमठने कहा—ब्रह्मन्! पहले गुरुको, उसके बाद धर्मको नमस्कार करके मैं इस वेदवर्णित प्रश्नका यथाशक्ति समाधान करूँगा! जीवके जन्म लेनेमें तीन प्रकारका कर्म कारण होता है—पुण्य, पाप और उभय मिश्रित। अर्थात् कर्म तीन प्रकारके हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। इन कर्मोंके अनुसार जो सात्त्विक पुरुष है, वह स्वर्गमें जाता है। फिर समयानुसार जब स्वर्गसे नीचे गिरता है, तब संसारमें धनी, धर्मी और सुखी होता है। जो तमोगुणी पुरुष है, वह नरकमें पड़ता है और वहाँ नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगनेके पश्चात् यहाँ आकर स्थावरयोनिमें जन्म लेता है। तदनन्तर
१- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त—ये छः रस हैं।
२- भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य तथा चोष्य—ये भोजनके पाँच भेद हैं।