संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १८३
हैं। उनपर ऐश्वर्यका मद तो रहता ही है, मदिरापानके मदसे भी वे अत्यन्त मतवाले हो उठते हैं। वास्तवमें जो धनके मदसे उन्मत्त होता है, वह पतित होकर विवेक खो बैठता है। अतः सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों)-को अपना स्वरूप मानकर उनके प्रति अपने ही जैसा बर्ताव करना चाहिये। जिसकी सर्वत्र आत्मदृष्टि है, वह ऐश्वर्यसे मतवाला नहीं होता। जो सबके शरीरमें अपने ही जैसे सुख-दुःखका अनुभव करता हो, ऐसा ऐश्वर्यशाली पुरुष आज कहाँ है? इसलिये नन्दभद्रने ऐश्वर्यका जो सार ग्रहण किया था, वह भी सुनो। वे अपनी शक्तिके अनुसार सभी प्राणियोंकी सेवा करते थे, किसीकी भी सेवासे विमुख नहीं होते थे।
इस प्रकार इधर-उधर प्रकट हुए सारभूत सदाचारका संग्रह करके बुद्धिमान् नन्दभद्र उसीका पालन करते थे। इस आचरणसे रहनेवाले साधु-शिरोमणि नन्दभद्रके सद्व्यवहारकी देवतालोग भी स्पृहा रखते थे। इन्द्र आदि सब देवताओंको उनकी स्थिति देखकर बड़ा विस्मय होता था। इसी स्थानमें एक शूद्र भी रहता था, जो नन्दभद्रका पड़ोसी था। उसका नाम तो था सत्यव्रत, किंतु वह बड़ा भारी नास्तिक और दुराचारी था। धर्मपरायण नन्दभद्रपर बारंबार दोषारोपण किया करता था और सदा उनके दोष ही ढूँढ़ता रहता था। उसकी इच्छा थी, यदि इनका कोई छिद्र देख पाऊँ तो इन्हें धर्मसे गिरा दूँ। खोटे हृदयवाले क्रूर नास्तिकोंका यह स्वभाव ही होता है कि वे अपनेको तो नीचे गिराते ही हैं, दूसरोंको भी गिरानेकी चेष्टा करते हैं।
धार्मिक वृत्तिसे रहनेवाले बुद्धिमान् नन्दभद्रके वृद्धावस्थामें बड़े कष्टसे एक पुत्र हुआ, किंतु वह चल बसा। इसे प्रारब्धका फल मानकर उन महामति वैश्यने शोक नहीं किया। देवता हो या मनुष्य, प्रारब्धके विधानसे कौन छूट पाता है। तदनन्तर नन्दभद्रकी प्यारी पत्नी कनका, जो अरुन्धतीकी भाँति साध्वी स्त्रियोंके समस्त सद्गुणोंसे विभूषित तथा गृहस्थधर्मकी साक्षात् मूर्ति थी, सहसा मृत्युको प्राप्त हो गयी। नन्दभद्र जितेन्द्रिय थे; फिर भी पत्नीके न रहनेसे गृहस्थ-धर्मका नाश होगा, यह सोचकर उन्हें शोक हुआ।
नन्दभद्रका यह अन्तर देखकर सत्यव्रतको बहुत दिनोंके बाद बड़ी प्रसन्नता हुई। वह 'हाय-हाय! बड़े कष्टकी बात हुई' ऐसा कहता हुआ शीघ्र ही नन्दभद्रके पास आया और मित्रकी भाँति मिलकर उनसे बोला—'हा नन्दभद्र! यदि तुम-जैसे धर्मात्माको भी ऐसा फल मिला तो इससे मेरे मनमें यही आता है कि यह धर्म-कर्म व्यर्थ ही है। भाई नन्दभद्र! मैं सदा तुमसे कुछ कहना चाहता था, किंतु तुम्हारी ओरसे कोई प्रस्ताव न होनेके कारण मैंने कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि बिना किसी प्रस्तावके बृहस्पतिजी भी कोई बात कहें, तो उनकी बुद्धिकी अवहेलना होती है और उन्हें नीच पुरुषकी भाँति अपमान प्राप्त होता है। मैं वाणीके अठारह और बुद्धिके नौ दोषोंसे रहित सर्वथा निर्दोष वाक्य बोलूँगा। सूक्ष्मता, संख्या, क्रम, निर्णय और प्रयोजन—ये पाँच अर्थ जिसमें उपलब्ध होते हैं, उसे 'वाक्य' कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके उद्देश्यसे जो कुछ कहा जाता है, वह 'प्रयोजन' नामक वाक्य कहा गया है। यह वाक्यका प्रथम लक्षण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें प्रतिज्ञा करके वाक्यके उपसंहारमें 'यही वह है' ऐसा कहकर जो विशेषरूपसे सिद्धान्त बताया जाता है, वह 'निर्णय' नामक वाक्य है। 'यह पहले और यह पीछे कहना चाहिये'—इस प्रकार क्रमविभागपूर्वक जो प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन किया जाता है, उसे वाक्यतत्त्वके ज्ञाता विद्वान् 'क्रमयोग' कहते हैं। जहाँ दोषों और गुणोंका