भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 23

२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


लोमशजी बोले—अठारह पुराणोंमें परम पुरुष भगवान् शिवकी महिमाका गान किया गया है; अतः शिवजीके माहात्म्यका पूर्णतया वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। जो लोग 'शिव' इस दो अक्षरके नामका उच्चारण करेंगे, उन्हें स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।* महादेवजी देवताओंके पालक और सबका शासन करनेवाले हैं, वे बड़े उदार (औढरदानी) हैं, उन्होंने अपना सब कुछ दूसरोंको दे डाला है, इसीलिये वे 'सर्व' (या शर्व) कहे गये हैं। जो सदा कल्याण करनेवाले भगवान् शिवका भजन करते हैं, वे धन्य हैं! जिन्होंने (दूसरोंकी रक्षाके लिये) विष-भक्षण किया, दक्ष-यज्ञका विनाश किया, कालको दग्ध कर डाला और राजा श्वेतको संकटसे छुड़ाया, उन महादेवजीकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है।

मुनियोंने पूछा—मुने! भगवान् शिवने कैसे विष-भक्षण किया तथा कैसे दक्ष-यज्ञका विनाश किया, वे सब बातें हमें बताइये। हमारे मनमें वह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है।

लोमशजी बोले—विप्रगण! पूर्वकालकी बात है, प्रजापति दक्षने परमेष्ठी ब्रह्माजीके कहनेसे अपनी पुत्री सतीका विवाह महात्मा शंकरजीके साथ कर दिया था। एक दिन वे ही दक्ष स्वेच्छानुसार घूमते हुए नैमिषारण्यमें आये। वहाँके ऋषि-मुनियोंने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने भी स्तुति और नमस्कारके द्वारा दक्षका सम्मान किया; किंतु भगवान् शंकरने उनको प्रणाम नहीं किया। दक्षने जब इस बातकी ओर लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। वे प्रजापति ठहरे, यह अपमान कैसे सहते; उन्होंने तुरंत भगवान् शिवके प्रति कटु वचनोंकी बौछार आरम्भ कर दी—'अहो! ये सम्पूर्ण देवता और असुर भी मेरे चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मण भी अत्यन्त उत्सुक होकर मुझे प्रणाम करते हैं; परन्तु वह शंकर दुष्ट पुरुषोंकी भाँति मेरे सामने शीश क्यों नहीं झुकाता? वह भूत-प्रेतोंका स्वामी है और सदा प्रेत-पिशाचोंसे घिरा रहता है; फिर भी अपनेको महान् समझता है! इसलिये आज मैं उसे शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मेरी बात सुनो और इसका पालन करो, आजसे इस रुद्रको मैंने यज्ञोंसे बहिष्कृत कर दिया।'

दक्षका यह कठोर वचन सुनकर नन्दीको बड़ा क्रोध हुआ। वे बोले—'अहो! मेरे स्वामी महेश्वर यज्ञभागसे वंचित किये गये। यज्ञ, दान, तप तथा नाना प्रकारके तीर्थ जिनके नामसे ही पवित्र हुए हैं, उन्हीं भगवान् शिवको शाप क्यों दिया गया? खोटी बुद्धिवाले दक्ष! वह यज्ञ, जिसमें शंकरजीका भाग न हो, व्यर्थ ही होगा; दुर्बुद्धे! तू उस यज्ञकी रक्षा कर। अरे! जिन महात्मा शिवने इस सम्पूर्ण विश्वका पालन किया है, उन्हींको तूने शाप दे डाला!'

तब महादेवजीने नन्दीसे कहा—महामते! तुम्हें ब्राह्मणोंके प्रति कभी क्रोध नहीं करना चाहिये। मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञ करनेवाला यजमान और आचार्य हूँ, सम्पूर्ण यज्ञांग भी मैं ही हूँ; इसलिये मैं सदा यज्ञमें रत हूँ। (मुझे कोई शाप देकर यज्ञ-बहिष्कृत नहीं कर सकता।) इसी प्रकार सर्वव्यापी होनेके कारण मैं किसीके भीतर नहीं हूँ—किसी भी सीमासे आबद्ध नहीं हूँ; इस दृष्टिसे देखनेपर मैं सदा ही सब यज्ञोंसे बाह्य हूँ।

भगवान् शंकरके इस प्रकार समझानेपर महातपस्वी नन्दीने विवेकका आश्रय लिया। शिवजीका सत्संग पाकर वे परमानन्दमें निमग्न हो गये। उधर मुनियोंसे घिरे हुए दक्ष भी अत्यन्त रोषमें भरकर अपने स्थानको चले गये। वे प्रणाम


* शिवेति द्वयक्षरं नाम व्याहरिष्यन्ति ये जनाः। तेषां स्वर्गश्च मोक्षश्च भविष्यति न चान्यथा॥
(स्क० पु०, मा० के० १।१६)