संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३
न करनेवाले रुद्रको भूल न सके। बारंबार उनका स्मरण करके क्रोधसे जलने लगे। भगवान् शिवकी ओरसे उन्होंने श्रद्धा हटा ली और वे शिवके उपासकोंकी निन्दामें संलग्न रहने लगे।
एक समय दक्षने स्वयं ही एक महान् यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने बड़े-बड़े तपस्वी ऋषि-मुनियोंको बुलाया। वसिष्ठ आदि अनेक महर्षि उस महायज्ञमें पधारे। अगस्त्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृगु, दधीचि, भगवान् व्यास, भरद्वाज और गौतम—ये तथा और भी बहुत-से महर्षि वहाँ आये। सभी देवगण, समस्त लोकपाल, विद्याधर, गन्धर्व तथा किन्नरोंका भी आगमन हुआ। उस यज्ञमें सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्माजी तथा वैकुण्ठ-धामसे भगवान् विष्णु भी बुलाये गये थे। इन्द्राणीके साथ देवराज इन्द्र, रोहिणीके साथ चन्द्रमा तथा अपनी प्रियाके साथ वरुणदेव भी आये थे। कुबेर पुष्पक विमानपर, वायुदेव मृगपर तथा अग्निदेव बकरेकी सवारीपर चढ़कर पधारे थे। नैर्ऋत्य कोणके अधिपति निर्ऋति प्रेतके कंधेपर बैठकर आये थे। इस प्रकार सब लोग दक्षकी यज्ञशालामें उपस्थित हुए। दक्षने सबका सत्कार किया। उनके यहाँ विश्वकर्माके बनाये हुए अनेक दिव्य भवन थे। वे सभी बहुमूल्य उपकरणोंसे सजे हुए तथा अत्यन्त प्रकाशमान थे। उन्हीं भवनोंमें दक्षने अपने समागत अतिथियोंको यथायोग्य स्थान देकर ठहराया।
दक्षका वह महायज्ञ कनखल तीर्थमें आरम्भ हुआ। उसमें उन्होंने भृगु आदि तपोधनोंको ऋत्विज् बनाया। अनेक प्रकारके कौतुक और मंगलाचार सम्पन्न करके दक्षने उस यज्ञकी दीक्षा ली। साथमें उनकी धर्मपत्नी भी बैठीं। ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया। उस समय अपने सुहृदोंसे घिरे हुए दक्ष अपना महत्त्व बढ़ जानेके कारण अधिक सुशोभित हो रहे थे। इसी समय महर्षि दधीचिने वहाँ दक्षसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'प्रजापते! ये देवेश्वरगण, ये बड़े-बड़े महर्षि तथा लोकपाल भी तुम्हारे यज्ञ-मण्डपमें पधारे हैं, तो भी पिनाकपाणि महात्मा शंकरके बिना यह यज्ञ अधिक शोभा नहीं पा रहा है। जिनके बिना मंगल भी अमंगल रूपमें ही परिणत हो जाते हैं तथा जिन त्रिनेत्रधारी भगवान्के अधिकारमें आनेपर अमङ्गल भी तत्काल मंगलके रूपमें बदल जाते हैं, वे अबतक यहाँ क्यों नहीं दर्शन दे रहे हैं? दक्ष! अब तुम्हें ही भगवान् विष्णु और इन्द्रके साथ जाकर परमेष्ठी भगवान् महेश्वरको बुला ले आना चाहिये। उन योगी शंकरकी उपस्थितिसे यहाँ सब कुछ पवित्र हो जायगा, जिनके स्मरण तथा नामोच्चारणसे सब पुण्यमय हो जाता है।'
दधीचिका यह वचन सुनकर दक्ष क्रोधमें भर गये और बड़ी उतावलीके साथ उत्तर देने लगे। उनका भीतरी भाव तो दूषित था, किंतु ऊपरसे वे हँसते हुए-से बोल रहे थे। उन्होंने कहा—'सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं— भगवान् विष्णु। जिनमें सनातन-धर्मकी स्थिति है, जिनमें सम्पूर्ण वेद, यज्ञ और नाना प्रकारके सत्कर्म भी प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् विष्णु तो यहाँ पधारे हुए हैं ही। सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्माजी भी आ गये हैं। उनके साथ समस्त वेद, उपनिषद् और नाना प्रकारके आगम भी हैं। इसी प्रकार आप-जैसे निष्पाप महर्षिगण भी आ ही गये हैं। जो-जो यज्ञ-कर्मके योग्य हैं, शान्तचित्त और सुपात्र हैं, वे सब महात्मा यहाँ पदार्पण कर चुके हैं। आप सब महर्षिगण वेदके वाक्य तथा उसके अर्थके भी तत्त्वज्ञ हैं। दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं। आपके होते हुए अब हमें रुद्रसे क्या प्रयोजन है? ब्रह्मन्! आप सब लोग मिलकर मेरे इस महान् यज्ञको सफल बनावें।'
दक्षकी बात सुनकर दधीचिने कहा—पवित्र अन्तःकरणवाले समस्त श्रेष्ठ महर्षियों और देवताओंके समुदायमें यह बड़ा भारी अन्याय हुआ है कि भगवान् शिवको आमन्त्रित नहीं किया गया। महात्मा शंकरके बिना इस यज्ञमें शीघ्र ही महान् विघ्न होनेवाला है।